Thursday, August 28, 2008

वोट और सत्ता के चक्रव्यूह में फँसी हिंदी

हिंदी दिवस के कार्यक्रमों के शुरु होने से पहले डा0 मान्धाता सिंह ने हिंदी को लेकर कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं। पेशे से पत्रकार मान्धाता ने सवाल उठाया है कि आंकड़ों में हिंदी कब तक पूरी दुनिया में दूसरे नंबर की सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा बनी रहेगी? क्या रोजी रोटी भी दे सकेगी हिंदी? सरकारी ठेके पर कब तलक चलेगी हिंदी? देश की अनिवार्य संपर्क व शिक्षा की भाषा कब बन पाएगी हिंदी। आ रहा है चौदह सितंबर को हिंदी दिवस मनाने का दिन। आप भी हिंदी के इन ठेकेदारों से यही सवाल पूछिए। हो सकता है कि हम और आप सभी तर्कों से सहमत न हों लेकिन यह सही है कि आज जरूरत है हिंदी को लेकर सही दिशा में एक स्वस्थ परिचर्चा की। आप भी इसमें शरीक होकर अपना मत देंगे। इसी विश्वास के साथ ये आलेख पोस्ट कर रहा हूं।

अभी कुछ दिन पहले बनारस के पास अपने गांव मैं गया था। पता चला कि वहां तमाम कानवेंट स्कूल खुल गए हैं। गांव का सरकारी प्राइमरी स्कूल, जिसमें खांटी हिंदी में पढ़ाई होती, अब वीरान सा दिखता है। लोगों का तर्क है कि आगे जाकर नौकरी तो अंग्रेजी पढ़नेवालों को मिलती है तो फिर हम हिंदी में ही पढ़कर क्या करेंगे। यह चिंताजनक है और देश की शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामी भी है।
जब रोजगार हासिल करने की बुनियादी जरूरतों में परिवर्तन हो रहा है तो बेसिक शिक्षा प्रणाली में भी वही परिवर्तन कब लाए जाएंगे। सही यह है कि वोट के चक्रव्यूह में फंसी भारतीय राजनीति हिंदी को न तो छोड़ पा रही है नही पूरी तरह से आत्मसात ही कर पा रही है। इसी राजनीतिक पैंतरेबाजी के कारण तो हिंदी पूरी तरह से अभी भी पूरे देश की संपर्क भाषा नहीं बन पाई है। अब वैश्वीकरण की आंधी में अंग्रेजी ही शिक्षा व बोलचाल का भाषा बन गई है। हिदी जैसा संकट दूसरी हिंदी भाषाओं के सामने भी मुंह बाए खड़ा है मगर अहिंदी क्षेत्रों में अपनी भाषा के प्रति क्षेत्रीय राजनीति के कारण थोड़ी जागरूकता है। तभी तो पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में अंग्रेजी को प्राथमिक शिक्षा में तरजीह दी जाने लगी है। दक्षिण के राज्य तो इसमें सबसे आगे हैं। कुल मिलाकर हिंदी हासिए पर जा रही है।
अब तो हिंदी की और भी शामत आने वाली है। नामवर सिंह जैसे हिंदी के नामचीन साहित्यकार तक स्थानीय बोलियों में शिक्षा की वकालत करने लगे हैं। (देखिए संलग्न JPEG फाइल- रजनी सिसोदिया का २७ जुलाई को जनसत्ता में छपा लेख -- जब माझी नाव डुबोए) अगर सचमुच ऐसा हो जाता है तो सोचिये कि जिन राज्यों में अब तक हिंदी ही प्रमुख भाषा थी वहीं से भी उसे बेदखल होना पड़ेगा। यह हिंदी का उज्ज्वल भविष्य देखने वालों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। अगर यही हाल रहा तो आंकड़ों में हिंदी कब तक पूरी दुनिया में दूलरे नंबर की सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा रह जाएगी। क्या रोजी रोटी भी दे सकेगी हिंदी ? सरकारी ठेके पर कब तलक चलेगी हिंदी ? देश की अनिवार्य संपर्क व शिक्षा की भाषा कब बनपाएगी हिंदी। आ रहा है हिंदी दिवस मनाने का दिन। आप भी हिंदी के इन ठेकेदारों से यही सवाल पूछिए।

विश्व की दस प्रमुख भाषाएं
१- चीनी लोगों की भाषा मंदरीन को बोलने वाले एक बिलियन लोग हैं। मंदरीन बहुत कठिन भाषा है। किसी शब्द का उच्चारण चार तरह से किया जाता है। शुरू में एक से दूसरे उच्चारण में विभेद करना मुश्किल होता है। मगर एक बिलियन लोग आसानी से मंदरीन का उपयोग करते हैं। मंदरीन में हलो को नि हाओ कहा जाता है। यह शब्द आसानी से लिख दिया मगर उच्चारण तो सीखना पड़ेगा।
२-अंग्रेजी बोलने वाले पूरी दुनिया में ५०८ मिलियन हैं और यह विश्व की दूसरे नंबर की भाषा है। दुनिया की सबसे लोकप्रिय भाषा भी अंग्रेजी ही है। मूलतः यह अमेरिका आस्ट्रेलिया, इग्लैंड, जिम्बाब्वे, कैरेबियन, हांगकांग, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा में बोली जाती है। हलो अंग्रेजी का ही शब्द है।
३- भारत की राजभाषा हिंदी को बोलने वाले पूरी दुनियां में ४९७ मिलियन हैं। इनमें कई बोलियां भी हैं जो हिंदी ही हैं। ऐसा माना जा रहा है कि बढ़ती आबादी के हिसाब से भारत कभी चीन को पछाड़ सकता है। इस हालत में नंबर एक पर काबिज चीनी भाषा मंदरीन को हिंदी पीछे छोड़ देगी। फिलहाल हिंदी अभी विश्व की तीसरे नंबर की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी में हलो को नमस्ते कहते है।
४- स्पेनी भाषा बोलने वालों की तादाद ३९२ मिलियन है। यह दक्षिणी अमेरिकी और मध्य अमेरिकी देशों के अलावा स्पेन और क्यूबा वगैरह में बोली जाती है। अंग्रेजी के तमाम शब्द मसलन टारनाडो, बोनान्जा वगैरह स्पेनी भाषा ले लिए गए हैं। स्पेनी में हलो को होला कहते हैं।
५- रूसी बोलने वाले दुनियाभर में २७७ मिलियन हैं। और यह दुनियां की पांचवें नंबर की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। संयुक्तराष्ट्र की मान्यता प्राप्त छह भाषाओं में से एक है। यह रूस के अलावा बेलारूस, कजाकस्तान वगैरह में बोली जाती है। रूसी में हलो को जेद्रावस्तूवूइते कहा जाता है।
६-दुनिया की पुरानी भाषाओं में से एक अरबी भाषा बोलने वाले २४६ मिलियन लोग हैं। सऊदू अरब, कुवैत, इराक, सीरिया, जार्डन, लेबनान, मिस्र में इसके बोलने वाले हैं। इसके अलावा मुसलमानों के धार्मिक ग्रन्थ कुरान की भाणा होने के कारण दूसरे देशों में भी अरबी बोली और समझी जाती है। १९७४ में संयुक्त राष्ट्र ने भी अरबी को मान्यता प्रदान कर दी। अरबी में हलो को अलसलामवालेकुम कहा जाता है।
७- पूरी दुनिया में २११ मिलियन लोग बांग्ला भाषा बोलते हैं। यह दुनिया की सातवें नंबर की भाषा है। इनमें से १२० मिलियन लोग तो बांग्लादेश में ही रहते है। चारो तरफ से भारत से घिरा हुआ है बांग्लादेश । बांग्ला बोलने वालों की बाकी जमात भारत के पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा व पूर्वी भारत के असम वगैरह में भी है। बांग्ला में हलो को एईजे कहा जाता है।
८- १२वीं शताब्दी बहुत कम लोगों के बीच बोली जानेवाली भाषा पुर्तगीज आज १९१ मिलियन लोगों की दुनिया का आठवें नंबर की भाषा है। स्पेन से आजाद होने के बाद पुर्तगाल ने पूरी दुनिया में अपने उपनिवेशों का विस्तार किया। वास्कोडिगामा से आप भी परिचित होंगे जिसने भारत की खोज की। फिलहाल ब्राजील, मकाउ, अंगोला, वेनेजुएला और मोजांबिक में इस भाषा के बोलने वाले ज्यादा है। पुर्तगीज में हलो को बोमदिया कहते हैं।
९- मलय-इंडोनेशियन दुनिया की नौंवें नंबर की भाषा है। दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी के लिहाज से मलेशिया का छठां नंबर है। मलय-इंडोनेशियिन मलेशिया और इंडोनेशिया दोनों में बोली जाती है। १३००० द्वीपों में अवस्थित मलेशिया और इन्डोनेशिया की भाषा एक ही मूल भाषा से विकसित हुई है। इंडोनेशियन में हलो को सेलामतपागी कहा जाता है।
१०- फ्रेंच यानी फ्रांसीसी १२९ मिलियन लोग बोलते हैं। इस लिहाज से यह दुनियां में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में दसवें नंबर पर है। यह फ्रांस के अलावा बेल्जियम, कनाडा, रवांडा, कैमरून और हैती में बोली जाती है। फ्रेंच में हलो को बोनजूर कहते हैं।

वादा आज तक पूरा नहीं हो पाया "संविधान के अनुसार २६ जनवरी १९६५ से भारतीय संघ की राजभाषा देव नागरी लिपि में हिन्दी हो गई है और सरकारी कामकाज के लिए हिन्दी अंतरराष्टीय अंकों का प्रयोग होगा " इस देश के संविधान ने इस देश की आत्मा अर्थात "हिन्दी" से एक वादा किया था और वह आज तक पूरा नहीं हो पाया और हिन्दी अपने इस अधिकार के लिए आज तक संविधान के सामने अपने हाथ फैला ये आंसू बहा रही है
क्या वास्तव में हिन्दी इतनी बुरी है कि हम उसे अपनाना नहीं चाहते? (विजयराज चौहान (गजब) के प्रकाशित उपन्यास "भारत/INDIA" के पेज १५६-१५८ पर उपन्यास के पात्र इसी तरह से चिंता जाहिर करते हैं। मुख्य पात्र भारत द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर स्कूल समारोह में हिंदी के संदर्भ में ये बातें कही जातीं है। आगे इस उपन्यास के पात्र यह भी कहते हैं कि- नहीं वह इतनी बुरी चीज नहीं है वह इस दुनिया कि सबसे अधिक बोलीजाने वाली तीसरे नम्बर कि भाषा है।
इसकी महत्ता को भारत के अनेक महापुरुषों ने भी स्वीकार किया है। इसकी इस महत्ता को देखकर ही एक ऐसे व्यक्ति "अमीर खुसरो" जिसकी मूल भाषा अरबी ,फारसी और उर्दू थी उसने कहा था- "मैं हिन्दुस्तान कि तूती हूँ ,यदि तुम वास्तव में मुझे जानना चाहते हो हिन्दवी(हिन्दी) में पूछो में तुम्हें अनुपम बातें बता सकता हूँ" हिन्दी का महत्व समझते हुए ही उर्दू के एक शायर मुहम्मद इकबाल ने बड़े गर्व से कहा था कि --"हिन्दी है हम वतन है हिन्दोंस्ता हमारा" हिन्दी के इसी महत्व को जान कर भारत के एक युगपुरूष महर्षि दया-नंद सरस्वती जिनकी मूल भाषा गुजराती थी, ने कहा था- "हिन्दी के द्वारा ही भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।" लौह पुरुष सरदार वल्बभाई पटेल ने और आजादी के बाद कहा था-"हिन्दी अब सारे राष्ट्र की भाषा बन गई है इसके अध्ययन एवं इसे सर्वोतम बनाने में हमें गर्व होना चाहिए" गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर ने जिनकी मूल भाषा बांग्ला थी उन्होंने कहा था कि- "यदि हम प्रत्येक भारतीय नैसर्गिक अधिकारों के सिद्धांत को स्वीकार करते है तो हमें राष्ट्र भाषा के रूप में उस भाषा को स्वीकार करना चाहिए जो देश में सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और वों भाषा हिन्दी है" नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने और कहा था कि- हिन्दी के विरोध का कोई भी आन्दोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है

तस्वीर का दूसरा पहलू
आज हिंदी देश को जोड़ने की बजाए विरोध की भाषा बन गई है। राजनीति ने इसे उस मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां अहिंदी क्षेत्रों में हिंदी विरोध पर ही पूरी राजनीति टिक रई है। पूरे भारत को एक भाषा से जोड़ने की आजाद भारत की कोशिश अब राजनीतिक विरोध के कारण कहने को त्रिभाषा फार्मूले में तब्दील हो गई है मगर अप्रत्क्ष तौर पर सभी जगह हिंदी का विरोध ही दिखता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है कि हिंदी राज्य स्तर पर हिंदी को सर्वमान्य का सम्मान नहीं मिल पाया है। जिस देश में प्राथमिक शिक्षा तक का भी राष्ट्रीयकरण सिर्फ हिंदी को अपनाने के विरोध के कारण नहीं हो पाया तो उस देश की एकता का सूत्र कैसे बन सकती है हिंदी।
अब वैश्वीकरण के दौर में कम से कम शिक्षा के स्तर पर अंग्रेजी ज्यादा कामयाब होती दिख रही है। कानून हिंदी को सब दर्जा हासिल है मगर व्यवहारिक स्तर पर सिर्फ उपेक्षा ही हिंदी के हाथ लगी है। क्षेत्रीय राजनीति का बोलबाला होने के बाद से तो बोलचाल व शिक्षा सभी के स्तर पर क्षेत्रीय भाषाओं को मिली तरजीह ने एक राष्ट्र-एक भाषा की योजना को धूल में मिला दिया है। अगर हिंदी को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में अपनाया नहीं गया तो निश्चित तौर पर इसकी जगह अंग्रेजी ले लेगी और तब क्षेत्रीय भाषाओँ के भी वजूद का संकट खड़ा हो जाएगा। अगर हिंदी बचती है तो क्षेत्रीय भाषाओं का भी वजूद बच पाएगा अन्यथा अंग्रेजी इन सभी को निगल जाएगी। और अंग्रेजी ने तो अब शिक्षा और रोजगार के जरिए यह करना शुरू भी कर दिया है।



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16 comments:

Anonymous said...

हिंदी का रोना भी एक फैशन है।

शोभा said...

बहुत ही सही एवं सशक्त विषय उठाया है आपने। मैं चाहती हूँ कि ब्लाग जगत में भी इस विषय पर चर्चा हो तथा हिन्दी लिखने वाले एकमत होकर इस विषय पर सार्थक चर्चा करें। सस्नेह

ARVIND KUMAR SINGH said...

joshi ji,
shobhaji ki bat ka main samarthan kartaa hooon. is par charcha honi chahie aur hindi patrkaron aur lekhko ko bhi atmchintan karna chahie.vote aur satta ko kosne se hi bat nahi banni hai
sadar
arvind kuar singh

Udan Tashtari said...

विचारणीय मुद्दा!!

Manvinder said...

apne sahi vishay uthaya hai...
shobha ji ki baat se mai puri tarha se sahamat hu....blog per ise uthane ke liya meri shubhkamnye

राज भाटिय़ा said...

बिलकुल सही लिखा हे आप ने , हिन्दी हमारी पहचान हे , इन अनामी जी को पता नही क्यो गोरो को बाप कहने मे मजा आ रहा हे या फ़िर इन्हे गुलामी ही विरासत मे मिली हे, जो हिन्दी का रोना ... कह रहे हे, शायद इन्हे पता नही की आजादी किसे कहते हे
धन्यवाद

मुकुंद said...

मेरे एक मित्र श्रीप्रकाश हैं. वह आपके भी मित्र हैं. वह आपका नबंर मांग रहे थे. मेरे पास नहीं है. मैं उनका नंबर दे रहा हूं-09871880686. और सब ठीक है. आपका लिखा-पढ़ा देखकर अच्छा लगता है.

आलोक कुमार said...

इस लेख पर आपने बहुत अच्छा कार्य किया है ... ये बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख था, मगर हताश होने की जरुरत ही नहीं है अगर हमसब ऐसे ही विचार प्रकट करते रहें तो सिक्का जरूर पलटेगा और हो सकता है कि कल ये रोजी-रोटी की भी भाषा बन जाए. तब कान्वेंट स्कूल हिंदी को लेकर मारा-मारी करेंगे :))

Dr. Chandra Kumar Jain said...

विचार पूर्ण.....विचारणीय
और विचारोत्तेजक भी है यह पोस्ट.
मँझा हुआ चिंतन सामने आ रहा है.
जानकारी की दृष्टि से भी उपयोगी.
हिन्दी पर और हिन्दी में सतत लिखना जरूरी है.
====================================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

योगेन्द्र मौदगिल said...

विश्वस्त जानकारीयों से परिपूर्ण आपका आलेख चिंतन को विवश करता है....

Pawan Nishant said...

sarthak bahas ho aur hindi ke bloger ekmat hon.

अनुराग said...

एक जबरदस्त आलेख...जिससे कई सवाल खड़े होते है ओर कई विचार मन में उमड़ते है.......

हिंदी-लेखक said...

आपका चिठ्ठा पड़कर अच्छा लगा | आप मेरठ से लिखती है ये जानकर और भी खुशी हुई | मेरठ मेरी जन्मभूमि है | आपने मेरे प्रकाशित उपन्याश के अंशो को गम्भीरतासे लिया और अपने चिठ्ठे पर स्थान दिया इसके लिए आपका शुक्रया !

आपसे अनुरोध है सम्पर्क बनाये रखे |

विजयराज चौहान
http://hindibharat.wordpress.com/
फोन -9412900005

Anonymous said...

Richa ji aapka blog achha laga. Maaf kare main hindi typing nahi janta. Aapne hindi ke liye achhe prayas ki shuruwat ki hai, jaisa maine puralekh me pada.
Nimish Kapoor
Sr. Scientist
Vigyan Prasar

aahang said...

हिन्दी हो या अंग्रेज़ी चलेगी वो ही जिसके बोलने या लिखने से रोज़गार् मिले और रोज़गार globalization के इस दौर में मिलेगा उसी को जो भाषा से चिपक कर ना बैठे.
बंट्वारे की राजनीति और सरकारी सनकीपन की बैसाखी हिंदी को कभी उसका उचित स्थान नहीं दिला सकती जब तक कि जनता खुद उसे ना अपनाये.
इसके लिये हमें अपनें बच्चों में मत्रभाषा के प्रति प्रेम जगाना होगा.
और कोइ रास्ता है ही नहीं

हरि जोशी said...

थोपी हुई कोई चीज नहीं चलती लेकिन अंग्रेजी चल गई हमारे मुल्‍क में। आज वह सत्‍ता के गलियारों की भाषा है। व्‍यापार और नौकरी की भाषा है।

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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