Wednesday, February 4, 2009

प्रेम के तमाशे में फंसी औरत

करीब साठ दिन से एक (अ)प्रेम कहानी सुर्खियों में है। मीडिया के लिए मुंबइया फिल्‍मों या एकता कपूर के सीरियलों से भी हिट मसाला। राष्‍ट्र की सबसे गंभीर समस्‍या। जी हां! हरियाणा के दिग्‍गज नेता भजनलाल के साहबजादे और पूर्व उपमुख्‍यमंत्री चंद्रमोहन के चांद मौहम्‍मद और चंडीगढ़ की एडवोकेट अनुराधा वाली के फिजा बनकर निकाह करने और फिर चांद के छिप जाने से आहत फिजा की दास्‍तान कई हफ्तों से सुर्खियां बनी हुई है। भले ही इस कहानी को चटखारे लेकर परोसा जा रहा हो लेकिन इस प्रसंग ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे सवाल जो मौकापरस्‍ती के लिए धर्म का ही नहीं बल्कि कानून का भी मजाक उड़ाते हैं और हमारा समाज, धर्म और कानून अभिशप्‍त होकर मूकदर्शक बना रहता है। एक मुद्दा महज चटखारेदार खबर बनकर रह जाता है।
ये कहानी एक ऐसे पुरुष और स्‍त्री की है जो सुसंस्‍कृत परिवार और समाज से हैं। पढ़े-लिखे हैं। समझदार हैं। या कहिए कि जरूरत से ज्‍यादा समझदार हैं। इस कहानी का एक पात्र चंद्रमोहन है। हरियाणा के दिग्‍गज राजनेता भजनलाल का पुत्र और सूबे का उपमुख्‍यमंत्री चंद्रमोहन एक दिन अचानक गायब हो गया। कुर्सी छोड़कर। यहां तक कि अपने बीबी-बच्‍चों को बिलखते हुए छोड़ गया। तलाश हुई लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला लेकिन एक दिन वह एक युवती के साथ दुनिया के सामने आया। इस युवती का नाम था अनुराधा वाली। पेशे से एडवोकेट अनुराधा भी गायब थी। लेकिन प्रकट हुए चंद्रमोहन अब चांद मौहम्‍मद बन चुके थे और अनुराधा वाली नए अवतार में फिजां बनकर सामने आई थी। दोनों ने ऐलान किया कि उन्‍होंने निकाह कर लिया है। यानी कानून को धोखा देने के लिए चंद्रमोहन ने धर्म का सहारा लिया और अपनी प्रेयसी का भी धर्म परिवर्तन करा शादी कर ली। दोनों ने हीर-रांझा टाइप प्रेम कहानियों पर बनी मुंबइया फिल्‍मों की तरह डायलोग बोले। चांद मौहम्‍मद बन गए चंद्रमोहन ने कहा कि उनकी दोस्‍ती पुरानी थी और जब प्‍यार में बदली तो उन्‍होंने साथ रहने का फैसला किया क्‍योंकि वह दोनों एक दूसरे के बगैर रह नहीं सकते थे। फिजा ने चांद को हीरा कहा और दोनों ने एक-दूसरे को तारीफ के चंदन लगाए और साथ जीने-मरने का ऐलान कर दिया।
अगर ये हरकत हमारे देश के किसी आम चेहरे ने की होती तो उसका उपचार समाज और उसके रखवालों ने कर दिया होता। अगर 'रामू' या 'मुन्‍ना' ऐसा करते तो इलाके के दरोगा जी ही चार लाठियों में मामला सुलटा देते लेकिन मामला अपमार्केट था। एक राजघराने से जुड़ा था। लिहाजा कई हफ्तों तक चांद और फिजा के पीछे-पीछे कैमरे चलते रहे। सुर्खिया बनी रही। हर रोज एकता कपूर के सीरियलों जैसा एक नया घटनाक्रम सामने आ जाता। चटखारेदार खबर थी और खबर बिकने वाली थी तो जाहिर था कि कभी चांद बन चुके चंद्रमोहन के बीबी-बच्‍चों को लेकर एक कड़ी बनती और कभी उनके अन्‍य घरवालों की प्रतिक्रियाएं सामने आतीं और खबरची एक से पूछते और दूसरे को बताकर प्रतिक्रिया ले‍ते। कुल मिलाकर चटखारे लिए जाते रहे लेकिन किसी ने गंभीरता से ये सवाल नहीं उठाया कि चंद्रमोहन की ब्‍याहता स्‍त्री और उन बच्‍चों का क्‍या कुसूर था। क्‍या ये उस स्‍त्री और बच्‍चों के प्रति एक तरह की हिंसा नहीं थी। क्‍या धर्म परिवर्तन कर दूसरा विवाह इतना आसान है। क्‍या सामाजिक सुरक्षा के ताने-बाने को इस तरह तार-तार किया जा सकता है। क्‍या धर्म परिवर्तन कर लेने से एक व्‍यक्ति अपनी पत्‍नी से मुक्‍त हो सकता है। अगर नहीं तो चांद पर कानूनी शिकंजा क्‍यों नहीं कसा गया?
लेकिन ये कहानी यहीं पर खत्‍म नहीं हुई। चांद फिर गायब हो गया। चांद की फितरत है घटना, बढ़ना और छिप जाना। चंद्रमोहन जिस तरह अपनी पहली बीबी और बच्‍चों को छोड़ कर गायब हुआ था; उसी तरह फिजा को छोड़कर गायब हो गया। अपनी पत्‍नी और बच्‍चों को छोड़कर गायब होने के बाद चंद्रमोहन जब सदेह सामने आया तो चांद बना हुआ था। यानी उसने इस्‍लाम ग्रहण कर लिया था। तब वापस आया चांद अपने साथ फिजा को लेकर अवतरित हुआ था। ये ऐलान करता हुआ कि उसे अनुराधा से बेपनाह मुहब्‍बत है। इतनी मुहब्‍बत कि वह एक-दूसरे के बगैर जिंदा नहीं रह सकते। फिजा को अपना चांद हीरा लग रहा था। ऐसा चांद जिसमें उसे कोई धब्‍बा भी नहीं दिखाई दे रहा था। लेकिन कुछ दिनों बाद ही कृष्‍ण पक्ष आया और चांद एक बार फिर छिप गया। इस बार फिजा बन चुकी अनुराधा की जिंदगी में अमावस्‍या आई।
वजह कुछ भी हो। चाहे लोग ये माने कि उन्‍होंने प्‍यार को बदनाम किया है। बदनाम हुई है तो सिर्फ मौहब्‍बत। या ये माने कि चंद्रमोहन और अनुराधा दोनो ही दोषी हैं। लेकिन कड़वा सच यही है कि दोनों ही परिस्थितियों में अगर कोई ठगा गया है तो वह है औरत। हर हाल में अगर किसी का कुछ छिना है तो वह है स्‍त्रीत्‍व। चंद्रमोहन के गायब होने पर उसकी पत्‍नी और बच्‍चे ठगे गए और चांद मौहम्‍मद के गायब होने पर फिजा। यानी लुटी तो सिर्फ और सिर्फ औरत ही। हो सकता है कि आप कहें या तर्क दें कि अनुराधा वाली तो पढ़ी-लिखी कानून की जानकार औरत थी; ये भी मानें कि उसी की वजह से चंद्रमोहन ने अपनी पत्‍नी को छोड़ा लेकिन सच तो यही है कि एक औरत की आबरू लूट कर उसने दूसरी औरत की आबरू को भी तार-तार किया।
अब मजहब की भी सुनिए। हिंदु मैरिज एक्‍ट के मुताबिक चंद्रमोहन एक पत्‍नी के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकते थे; इसलिए वह मुसलमान हो गए और अब इस्‍लाम के विद्वान कह रहे हैं कि अगर चांद मौहम्‍मद सार्वजनिक तौर पर यह कह दे कि वह इस्‍लाम धर्म छोड़कर फिर से हिंदु हो गए हैं तो उनका फिजा से निकाह अपने आप टूट जाएगा। और फिजा को इस्‍लाम धर्म में रहते हुए इद्दत करनी पड़ेगी। यानी हर हाल में एक औरत ही ठगी गई और यही सदियों से होता चला आ रहा है लेकिन सवाल उठता है कि आखिर कब तक? कब तक हम कबीलाई समाज की मानसिकता का दामन थामे बैठे रहेंगे? आखिर कब ऐसा होगा जब औरत को इंसाफ के लिए गुहार नहीं लगानी पड़ेगी? क्‍या लगाम सिर्फ औरत के लिए है? आपकी प्रतिक्रियाओं और विचारों का इंतजार रहेगा!

32 comments:

SALEEM AKHTER SIDDIQUI said...

richa ji bahut hi achhi post hai. isi mudde par hi aaj he maine bhi ek post dali hai. nazar daliyga.

Kishore Choudhary said...

nice post

MANVINDER BHIMBER said...

अनुराधा वाली पढ़ी-लिखी कानून की जानकार औरत थी इसे लिए उसने बड़े कायदे से पहले धर्म बदला फ़िर शादी की लेकिन मर्द की फितरत को भी समझ लेना चाहिए था ......वैसे किसी का घर उजाड़ कर kon सुखी रह सका है यह भी सोचने की बात है

sanjeev said...

ये सही है कि अनुराधा वाली दूध की धुली नहीं हैं लेकिन ऋचा की बात काबिले गौर है कि चंद्रमोहन की पहली पत्‍नी छली जाए या अनुराधा लेकिन है तो सारा खेल चंद्रमोहन का और कोई भी पिसे लेकिन वह औरत ही होगी।

राज भाटिय़ा said...

जेसा करो वेसा भरो, मर्द हो या ऒरत, अब कसुर किस का है कोन ठगा गया, यह तो वक्त ही बतायेगा, लेकिन सब से बडा नुकसान तो इस चन्दू की बीबी ओर बच्चो का हुया, उन्हे किस बात की सजा मिली???

creativekona said...

Richa ji ,
bahut achchha aur nishpaksh likha hai apne.shukra hai ki Anuradha...Chandra mohan kee ye kahanee Meediya ke madhyam se poore desh ke samne aa gayee.naheen to shayad is prem kahanee ka hshra bhee Amar mani tripathee aur madhumita shukla jaisa ho jata.....aur un sthitiyon men rajnatik partiyan apnee rotiyan senkatee.aur chandra mohan...amar mani tripathee kee tarah aish karta.
Hemant

परमजीत बाली said...

अच्छी पोस्ट लिखी है।

सहज साहित्य said...

मीडिया ने तो चाँद को चाँद पर ही पहुँचा दिया था । ऐसे लोगों को महिमा -मण्डित करना एक घरेलू औरत का हक छीनना है ,जो सुख-दु:ख में पूरे परिवार के लिए अपना जीवन होम करती रहती है । इर्द -गिर्द में सधी हुई रचनाएँ ही नज़र आती हैं ।साधुवाद जोशी जी !
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

dharmvir said...

bahut achchha likha hai. mere mail par aapke lekh ka msg mila tha. aap jo bhi hain lekhani me kamal ki dhaar rakhti hain. jari rakhiyega.........
dharmvir
dvharyana@gmail.com

Mired Mirage said...

प्रेम करना अपने आप में गलत नहीं है और साथ रहने की चाह भी। परन्तु यदि प्रेम के लिए गलत तरीके अपनाए जाएँगे तो परिणाम भी गलत हो सकते हैं। विवाह केवल तब हो सकता था जब पहले विवाह में सम्बन्ध विच्छेद होता। जिस धर्म की आड़ में सुविधाजनक विवाह किया उस धर्म में वैसी ही तलाक की सुविधा भी है यह भूल जाना मूर्खता ही थी। यदि सुविधा चाहिए तो असुविधा भी झेलनी ही होगी। इसमें ठगे जाने जैसा कुछ भी नहीं था। कोई भी समझदार स्त्री यह जानती है कि किसी अन्य धर्म के व्यक्ति से विवाह special marriage act के अन्तर्गत करना ही बेहतर होता है। मैं कानून को नहीं जानती परन्तु एक कानून जानने वाली स्त्री को यह सब सोचना चाहिए था और यदि नहीं जानती थी तो भी सलाह लेनी चाहिए थी।
आज जिस स्थिति के लिए इतना क्रोध आ रहा है वही स्थिति पहली पत्नी की होने पर क्रोध क्यों नहीं आ रहा था? जो एक स्त्री को ठूँ छोड़कर जा सकता है वह एक अन्य को क्यों नहीं? हाँ,स्त्री की स्थिति पुरुषों जितनी सशक्त नहीं है,फिर भी यदि हम यदि अन्य के साथ अन्याय होने में सहायक बनते हैं तो अपने पर अन्यया होने पर उसे भी सहने की हिम्मत रखनी चाहिए।
यदि यही विवाह तलाक के बाद हुआ होता तो मेरी सम्वेदनाएँ उनके साथ होतीं परन्तु इस स्थिति में नहीं। जब हम दूसरों के प्रति संवेदनाशून्य हो सकते हैं तो अपने लिए इन्हीं संवेदनाओं की आशा करना अति आशावादी होना है। स्त्री होने का यह अर्थ नहीं कि हर हालत में वह सही रहेगी।
वैसे हम केवल उतना जान सकते हें जो हमें बताया जा रहा है।
कहीं तो इस धर्म परिवर्तन का मुद्दा भी उठना चाहिए। क्या दूसरा विवाह करने के लिए धर्म परिवर्तन सही माना जाना चाहिए?
घुघूती बासूती

Mired Mirage said...

corrections *आज जिस स्थिति के लिए इतना क्रोध आ रहा है वही स्थिति पहली पत्नी की होने पर क्रोध क्यों नहीं आ रहा था? जो एक स्त्री को यूँ* छोड़कर जा सकता है वह एक अन्य को क्यों नहीं? हाँ,स्त्री की स्थिति पुरुषों जितनी सशक्त नहीं है,फिर भी यदि हम यदि अन्य के साथ अन्याय होने में सहायक बनते हैं तो अपने पर अन्याय* होने पर उसे भी सहने की हिम्मत रखनी चाहिए।*
घुघूती बासूती

रचना said...

जब तक पत्निया पर स्त्री गमन करके आये पति के साथ सुलह करके { किसी भी कारण से } दुबारा उनको पति मान कर उनके साथ दैहिक सम्बन्ध बनाती रहेगी तब तक इस समस्या का कोई समाधान नहीं हैं . बात केवल चंद्र मोहन , अनुराधा बाली और सीमा विश्नोई की नहीं हैं . बात हैं समाज मे अनेतिकता बढ़ाने के लिये कौन जिम्मेदार हैं . क्यूँ पत्नियां ऐसे मे चुप रहती हैं . क्यों नहीं वो अपने पति से सम्बन्ध समाप्त करती हैं . जो चन्द्र मोहन और फिजा ने किया वो जीतना ग़लत हैं उससे भी ज्यादा ग़लत हैं सीमा का अपने पति को फिर से पति मानना . अगर सीमा वो करती जो चन्द्र मोहन ने किया तो सब फिर सीमा को ही दोष देते .
क्यों नहीं पत्नियां ऐसे पति को जेल करवाती हैं जो बहु विवाह करते हैं हिंदू धर्म मे पत्नी का जो स्थान हैं उसको कानून से पूरा संरक्षण हैं पर क्या जो व्यक्ति सरासर कानून का उल्लंघन करता हैं उसको केवल इस लिये घर मे आने देना चाहिये की वो आप का पति हैं , आप के बच्चो का पिता हैं ? क्या पत्नी बनते ही आप के अस्तित्व और ज़मीर का अंत हो जाता हैं ?
आज एक अनुराधा बाली खड़ी हैं की वो कानुनी लड़ाई लडेगी और अपने लिये ही नहीं अपनी जैसी अन्य महिला के लिये भी कानून को सही करवायेगी अगर ये हो जाता हैं तो लिव इन रिलेशनशिप कानून भी आही जायेगा । क्या तब ही पत्नियां जागेगी की "हम उस पुरूष को पति नहीं मानेगे जो किसी और स्त्री के के साथ विवाह करता हैं { किसी भी धर्म के तहत } " ।
क्यूँ भारतीये पत्नियाँ अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं हैं । पति क्या कोई ट्राफी होता हैं की जैसा भी हैं शेल्फ पर सजा रहे ??

PN Subramanian said...

आपका लेख बहुत ही सुंदर है और अबतक के घटना क्रम को बड़े सिलसिलेवार प्रस्तुत करता है. यह कहना कि "दोनों ही परिस्थितियों में अगर कोई ठगा गया है तो वह है औरत।" से हम सहमत नहीं हैं. फिजा के साथ कोई सहानुभूति नहीं हो सकती. दोनों ने ही मिलकर चाँद मियां की हिंदू पत्नी के साथ अत्याचार किया है. यह घटना इस बात को बल देती है कि भारत के नागरिकों हेतु कामन पर्सनल ला का होना आवश्यक है. घुघूतीजी ने एकदम सटीक राय दी है जिसका हम समर्थन करते हैं.

ओमकार चौधरी said...

मामला उल्टा ही लग रहा है. अनुराधा के फेर में फंसकर चन्द्रमोहन ने पाया क्या है ? उप मुख्यमंत्री की कुर्सी गई. रुतबा गया. भजनलाल ने अपनी संपत्ति से उन्हें बेदखल कर दिया. सामाजिक और राजनीतिक भविष्य चौपट हो गया. कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि भजन परिवार को बदनाम करने के लिए ही यह साजिश रची गई है. अब इसके पीछे कौन है, ऊपर वाला जाने..इसे सच न भी मानें तो चन्द्रमोहन के जाने के बाद रो रोकर फिजा जी ने उनकी शान में जो गालियाँ निकाली हैं, उसके बाद भी कोई कह सकता है कि वो चन्द्रमोहन को प्यार करती हैं या सम्मान देती हैं ? ये प्यार व्यार कुछ नहीं है. किसी का घर बरबाद करके आप सुख से कैसे रह सकते हैं ? गलती दोनों की है. अब ताउम्र उन्हें इसका प्रायश्चित करना ही होगा. धर्म बदलकर जिस अंदाज में उन्होंने निकाह किया, वह ख़ुद कई सवाल खड़े करता है. और चलिए आपने कर भी लिया तो कभी प्रेस क्लब दिल्ली में कभी टेलीविजन के स्टूडियो में तो कभी लाइव इंटरव्यू देकर ये दोनों क्या साबित करना चाहते थे ? क्या बड़ा बहादुरी का काम किया था ? वो ड्रामा देख कर चन्द्रमोहन की पहली पत्नी पर क्या बीत रही होगी, क्या सोचा इन दोनों ने ?
इसलिए मै इस बात से सहमत नहीं हूँ कि प्यार के तमाशे में औरत फंसी है. न ये प्यार है न सही तरीके से की गयी शादी. जैसा किया, वैसा भरेंगे अब ये दोनों.

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

ऋचा जी
असल बात यह है कि इसमें न तो स्त्री ठगी गई है न पुरुष. इसमें ठगा गया है आम भारतीय. सच पूछिए तो हर भारतीय ठगा जा रहा है. हमारे संविधान में सुविधा सम्पन्न लोगों के लिए इतने चोर दर्वाजे हैं कि वे जैसे चाहें उनका इस्तेमाल कर रहे हैं. लोग धर्म और उनसे जुडे कानूनों का इस्तेमाल पेपर नैप्किन की तरह कर रहे हैं. हैरत है कि वह औरत इस पूरे परिद्रिश्य से ग़ायब ही घो गई, जिसे लोग चन्द्रमओहन की पहली पत्नी के तौर पर जानते हैं और ये लोग रासलीला रचा रहे हैं तथा हमारी पूरी मीडिया इनके पीछे-पीछे दौड रही है. आखिर हमने अपने कानून में इतनी छूट दी ही क्यों हुई है कि उसका दुरुपयोग हो? क्या कानून की वास्तविक उपयोगिता और उसके दुरुपयोग की सीमा तय करने के लिए कुछ मानदंड नहीं बनाए जा सकते?

बलराम अग्रवाल said...

आपकी यह पोस्ट मुझे विश्लेषणपरक कम 'औरत' शब्द को भुनाने जैसी ज्यादा लगी। 'चंद्रमोहन की पत्नी हो या फिजा, ठगी तो औरत ही गई'- पढ़कर तो यह साफ ही हो जाता है। आपका लेख वस्तुत: घुघूती बासूती की टिप्पणी पाकर ही पूर्णता को पाता है। 'धर्मो एव हतो हत्नि:,धर्मो रक्षति रक्षित:' अर्थात धर्म का हनन करने वाले को धर्म मार डालता है और उसकी रक्षा करने वाले की वह रक्षा करता है-'महाभारत' के इस युधिष्ठिर-वाक्य को हमेशा याद रखना चाहिए। जो थू-थू हम चन्द्र्मोहन पर कर रहे हैं वह थू-थू हमने धर्मेन्द्र पर क्यों नहीं की? उसे तो हमने सांसद तक स्वीकार कर लिया! उसे ही नहीं, उसकी पहली पत्नी और बच्चों पर इसी तरह का अत्याचार करने वाली महिला भी सांसद है! सम्बन्ध विच्छेद न होने से अपराध कम हो जाता है क्या? और उन उलेमाओं की, भले ही उनके अपने सर्किल द्वारा, क्लास क्यों नही ली जानी चाहिए जिनकी विवेकहीनता ने एक वैज्ञानिक-दृष्टि सम्पन्न सम्माननित धर्म को अपराधवृत्ति वालों ने मखौल बना डाला है। निश्चितरूप से धर्म-परिवर्तन पाप नहीं है। मनुष्य अपनी अन्तश्चेतना से जहाँ एकरूपता महसूस करे वहाँ सिर झुकाने/खपाने को स्वतन्त्र है। मेरी समझ में नहीं आता कि इस पवित्र कार्य को चोरी-चोरी सम्पन्न कराने की इजाजत क्यों दी जाती है? यहाँ मैं एक बात और बता देना चाहूँगा -'असुर' लम्बे दाँतों व नाखूनों और सिर पर नुकीले सींगों वाले स्त्री-पुरु्षों को नहीं बल्कि उन्हें कहा गया है जो 'सुर' का ज्ञान होने के बावजूद उसका निर्वाह नहीं करते या फिर सिर्फ और सिर्फ स्वहिताय उस ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं। अब आप खुद ही समझ लें कि कितना, किसके द्वारा किस या किस-किस पर हुआ है।

बलराम अग्रवाल said...

कृपया ठीक कर लें--
* 'जिनकी विवेकहीनता ने' के स्थान पर 'जिनकी विवेकहीनता के चलते' पढ़ें।
**अन्त में 'अब आप खुद ही समझ लें कि कितना…' को 'अब आप खुद ही समझ लें कि अत्याचार कितना' पढ़ें।
शब्दों के छूट जाने पर क्षमायाचना।

डॉ .अनुराग said...

औरत को तो को हर खेल में घाटा ही उठाना है ,कल मैंने मनविंदर जी के ब्लॉग पे ये सवाल छोडा था की यही काम अगर चाँद की पहली पत्नी करती तो मीडिया ?तमाम संस्क्रति के रखवालो का रवैया क्या उस वक़्त भी मूक दर्शक होता ...शादी से बाहर किसी भी रिश्ते का कोई सुखद अंत नही था....खैर ये निजी मामले है....ये सबको मालूम है...
दरअसल ये घटना दो चीज साफ़ करती है
एक कानून रसूख वालो के लिए अलग है ओर गरीबो के लिए अलग दूसरा मजहब भी रसूख वालो के लिए अलग कायदे रखता है.....

nirmal gupt said...

मैं मानता हूँ कि चाँद और फिजा के इस मेलोड्रामा में
सिर्फ़ औरत ही ठगी गई.लेकिन इस ठगे जाने के लिए
कौन जिम्मेदार है.नैतिक,सामाजिक और मानवी सरोकारों
के नजरिया से जो व्यव्हार ग़लत है वह किसी सकारात्मक
परिणाम को कैसे प्राप्त हो सकता है.बर्नाड शा के शब्द उधार
लेकर कहूँ---दो काली चीजों को मिला देने से एक सफेद
चीज़ कभी पैदा नहीं हुआ करती..ऐसी प्रेम कथाओं
का दुखांत ही होता है....nirmal

shyam kori 'uday' said...

... प्रभावशाली अभिव्यक्ति।

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

सच तो यह है....कि इस भद्दे प्रकरण पर मैं कुछ लिखना भी नही चाहता......चाँद जैसे गए-बीते लोगों ने प्रेम नाम की पवित्र चीज़ को इतना घटिया रंग दे दिया है...कि इनका मुहं काला कर गधे पर बिठाकर सरे-राह लत्तम-जूता करना भी बहुत कम होगा....सच मैं कुछ नहीं कहना चाहता...!!!

आकांक्षा~Akanksha said...

कब तक हम कबीलाई समाज की मानसिकता का दामन थामे बैठे रहेंगे? आखिर कब ऐसा होगा जब औरत को इंसाफ के लिए गुहार नहीं लगानी पड़ेगी? क्‍या लगाम सिर्फ औरत के लिए....Bahut vajib sawal uthaya hai par jab rakshak hi bhakshak ban jaye to...???
____________________________
कभी मेरे ब्लॉग शब्द-शिखर पर भी आयें !!

monika sheoran said...

richa ji,aapne jo bhi likha hai kisi had tak sach hai,par baat ye hai k humare kanun ka dhacha hi kuch is tarah bana hai k har koi uski dhajjiyaan uda deta hai,shayaad kuch aise samajhdar logo ki zarurat hai jo soche aur samajhhe aur is kaanun mei badlaav laaye.maaf kijiye ga yaha mazak aurat ka nahi bana,ismae murkh to vo har insaan bana hai jo humari sanskriti aur humare daesh se juda hai jisme hum sub shamil hain.
monika

सबकी कहानी said...

मैं चंडीगढ़ में ही रहता हूँ और हर दिन देख रहा हूँ फिजा और चन्द्रमोहन का खेल.
दोनों ही महान हैं. मेरी सहानुभूति दोनों में से किसी से नही है. दोनों ही खुदगर्ज हैं. यह कहना की फिजा बेचारी है...इससे नारी जाति का अपमान होगा!!
चन्द्रमोहन भजनलाल के बेटे हैं. इस परिवार के खून में राजनीति है. चन्द्रमोहन ने अपनी पत्नी को जान-बुझकर छोडा. फिजा को भी किसी वजह से छोडा..
ऋचा जी, मैं एक पत्रकार हूँ, मर्यादा में रहकर ही बातें करूंगा. अभी तो बहुत सारा पन्ना खुलेगा..
आपने किस शहर में बैठकर ये लेख लिखा पता नही...लेकिन जितना कुछ दिख रहा है वोह सिर्फ़ दुनियावालों के लिए है...हकीक़त हैरान करने वाली है..

योगेश समदर्शी said...

ऋचा जी आपका आलेख पूरा पढा और फिर एक एक टिप्पणी भी. बात और बहस में लगभग सब पक्ष आ गये हैं. मै एक अन्य पक्ष रखने का प्रयास करता हूं आपने कहा "ठगा तो स्त्रीत्व गया" माफ कीजियेगा.. स्त्रीत्व इतनी छोटी वस्तु नहीं कि उसे कोई ठग सके. निजि स्वार्थ के लिये निजि सुख के लिये किया गया कार्य यदि स्त्रियोचित हो ही ना तो फिर यह पहले कहा जाना चाहिये कि अनुराधा ने अपना स्त्रित्व तो पहले ही खो दिया या भुला दिया था... आप उन्हें मासूम बच्ची समझ रही है क्या? उन्हें किसी ने बहकाया होगा क्या अपको यह लगता है... उनकी उम्र देखिये इस उम्र तक तो जोश और जवानी की अल्हडता भी आकर जा चुकी होती है... ऐसे में जब कि वह खुद एक अहम ओहदे को शिसोभित हो क्या अकारण ही किसी परदेश के मुखयमंत्री से घनिषठता को जगजाहिर करेंगी... और भी दूसरी बात यह है कि उन्होंने मीडिया को कहा कि यह प्यार कई वर्षों से चल रहा है तो फिर इतने दिन तक कोई चर्चा क्यों नहीं हुई... स्त्री हो या पुरुष यदि स्वहित के लिये कदम उठाये और समाज की मान्यता को तोडे तो बराबर का दोषी होता है... स्त्री तो उनकी पहली पत्नी भी है दरसल चांद जितना दोषी है, फिजा जितनी दोषी है समाज उससे कम दोषी नहीं है... एक टिप्पणी मे पहले भी यह बात आई है कि पहले ऐसे उदाहरणों का विरोध क्यों नही हुआ... और एक बात बहुत कठोर शब्दों मे स्वच्छंदता को प्रेम प्रेम प्यार प्यार की परिभाषाएं स्थापित करते संबंध दरसल सेक्स के मूल पर आधारित होते है... इस कडवे सच को सम्झना होगा कोई भी किसी स्त्री से या पुरुष से यह कहे कि प्यार है प्रेम है तेरे बिना नही रहा सकता मतलब सीधा है कि वह सेक्स का इच्छुक है... क्योंकि प्यार है तो उसमे निकटता कोई शर्त न्हीं किसी को दूर से भी चाह्ते रहा जा सकता है, प्यार किया जा सकता है, मैत्री रखी जा सकती है और समाज यदि इस प्यार पर प्रतिबंध लगाता है तो दकियानूसी कहलाता है और जब इसके चक्कर में ठगे लोगों को देख कर चुप रहता है तो दोषी कहलाता है.. अपनी पसंद ना पसंद से किये जाने वाले संबंधों की स्वछंदता पर से जिस तरह से समाज की पकड घटती जा रही है उससे तो सामाज का खुद का अस्तित्व खतरे मे है इस प्रकरण मे भजनलाल को साधुवाद देना चाहिये कि उन्होंने अपने बेटे का उस घिनोने कृत्य में साथ नहीं दिया बहू को संबल दिया... और बेटे को बेद्खल करके इस खेल का जल्दी ही भांडा फोड दिया यदि चांद मोहम्मद अपनी जायदाद पा गये होते तो यह प्रेम और लंबा चलता ... कुल मिला कर समाज में अच्छे आदर्शों की बात होनी बंद हो गई है.. विसंगति पर चर्चा होती है, बहस होती है.. ऐपिसोड बन्ते है टीवी पर बजते है... पर समाज के डर से कोई परेशान नहीं होता... सारा खेल पढेलिखे हो जाने से खराब हुआ है... हमने गलत तर्क गढने सीख लिये है... परम सत्त्ता को हम मानते नहीं यह बात बचकानी हो गई है कि बुरा करेंगे तो पाप लगेगा... इस जनम में बुरा करेंगे तो अगले जनम में भोगेंगे जैसी बात जो हमें भले ही धारमिक रूप से डराती थी पर नैतिकता की पगडंडियों पर चलने के लिये बाध्य तो करती थी.. हमे समाज मे थू थू का डर तो था.. पर नहीं निठारी में बच्चियों के साथ कुकर्म करके उन्हे मारकर दफनाने वाला भी कई मुकाम पर कानून से ही बरी होता नजर आ रहा है... क्या करियेगा... क्या कहियेगा... स्त्री और पुरुष की टकराहट का मामला ही नहीं है.. साझा संस्कृति है साहब चांद के बेटे से पूछो की अपनी मां के स्त्रितव के लिये क्या वह न रोएगा... कोई पुरुष ऐसा हो सकता है जो अपनी मां के गर्भ के स्त्रीत्व की पूजा न करता हो.. मेरा निवेदन है कि विसंगतियों को कोसिये, आचरणो में गंदगी को कारण बताईये, स्त्रीत्व को मत तो हार हुआ मानिये, मत ठगा हुआ कहिये. स्त्रित्व ही जिंदा है तो सृष्टि जिनंदा है और स्त्रित्व परम शक्ति है विशाल है... समाज को विवेकवान कैसे बनाएं. गुनाह करने से पहले हर व्यक्त जानता है कि वह जो कर रहा है वह गलत है.. बस करते वक्त वह कदम पीछे लेने का विवेक और शक्ति पा जाये इसकी जरूरत है.. यह सोचने का विषय है....

अशोक मधुप said...

आप की पोष्ट बहुत अच्छी है। बधाई। मुझे एक शेर याद आता है,
मुझको बेवफा कहने वाले तूने कुछ आेर कह दिया होता,
कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी यूं ही कोई बेवफा नही होता।
आपने एक पक्ष देखा किंतुं आपने दूसरा पक्ष नही देखा क्या अनुराधा ने ही त्याग किया। क्या चंद्रमोहन ने कुछ नही खोया, वह तो अपना अतीत,सम्मान,उपमुख्यमत्री पद को गवां कर अनुराधा के साथ आया था। समाजमें सम्मान के लिए ही तो हम जीते हैं। उसने तो वह सब दांव पर लगा दियां। यह तो वह राजा रहा जो अपना परिवार बच्चे, सिंहासन सब छोड़ कर अनुराधा का बना था,जितने इतना सब खोया हो वह अनुराधा के पास से कहीं गया तो एेसे ही नही गया। वह जहां था वहां रहकर अनुराधा ही नही जाने किंतनी महिलाआे को अपनी एय्याशी के लिए प्रयोग कर सकता था ,किंतु उसने एसा नही किया! उसने धडल्ले से अनुराधा को स्वीकारा एवं उसके लिए अपने सर्वस्व पर लात मार दी। क्या उसने कुछ नही गवांया।
मेने बहुत पहले रघुवीर शरण मित्र का काव्य भूमिजा पढ़ा था,वह राम द्वारा सीता को बनवास देने की कथा के बाद शुरू होता है। सीता बन को जा रही है। रास्ते में लंकेश रावण की आत्मा मिलती है एवं कहती है कि सीते बताआें पयार एवं त्याग किसका ज्यादा है,राम का या रावण का ।राम ने शासन के लिए तुझे त्याग दिया एंव मैने तेरे लिए अपना सिंहासन कुंटुब पु़त्र एवं भरे पूरे परिवार को बलिदान कर दिया।
आप देखें कि यहां अनुराधा का भी प्यार था, आैर चंद्र मोहन का भी ।
किसी ने कहा है कि मै तुझे कितना चाहता हैं यह अपने मन से बूझ ले। तेरे प्यार की प्यास मेरे प्यार की उंचाई एवं मयार बता देंगी। हां चंद्र मोहन ने पहली पत्नी के साथ बच्चों के साथ बेवफाई की। किसने लिए उसके लिए कौन जिम्मदार है। अगर अनुराधा चंद्रमोहन के जीवन में नही आई होती। इस प्यार के रास्ते पर चलने से पूर्व उसने चंद्रमोहन को उसके परिवार का वास्ता
देकर झिड़क कर अलग कर दिया होता, तो चंद्र मोहन का परिवार क्यों बर्बाद होता। उसे क्यों इतना अपमान झेलना पड़ता। मै यहीं समाप्त करता हूं एवं फिर कहता हूं कुछ तो मजबूरिया रहीं होंगी,यू ही कोई बेवफा नही होता।

Science Bloggers Association of India said...

मूल बात यह है कि मनुष्‍य एक निहायत स्‍वार्थी और मतलबी इंसान है, जो अपने फायदे के लिए नियम कानून और यहॉं तक कि धर्म का भी फायदा उठाने की फिराक में रहता है। इसके विरूद्ध जन चेतना की आवश्‍यकता है।

Sanjiv Panday said...

िफजा की हकीकत तो देखे
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चंदरमोहन को गाली देने से पहले िफजा की हकीकत जािनए। िफजा पंजाब और हिरयाणा में अिसटेंट एडवोकेट जनरल लगने से पहले चंडीगढ़ िजला अदालत में एडीए लगी थी। उनहें बरखासत िकया गया था। आिखऱ कयों उनहें बरखासत िकया गया। उनकी बरखासतगी के बावजूद उनहें अमिरंदर िसंह की सरकार में अिसटेंट एडवोकेट जनरल लगाया गया। आिखर एक बरखासत एडीए को कैसे अिसटेंट अडवोकेट जनरल लगाया गया। बीच में ही एडवोकेट जनरल आर एस चीमा ने उनहें इस पद से हटा िदया। िफर जब हिरयाणा में कांगरेस की सरकार आयी तो वो हिरयाणा में एिडशनल एडवोकेट जनरल लगी। इस दौरान ही चांद मोहमद उनके संपरक में आए।
चांद मोहमद रिसक है, सारा हिरयाणा जानता है। यह तो िफजा को समझना चािहए था। चांद मोहमद के संपरक में आने के बा पहले िफजा ने एक बार पंजाब एवं हिरयाणा हाईकोरट में ज्वाइंट सेकरेटी पद पर चुनाव लड़ा। िफजा ने जब नामांकन िकया तो उनके िवरोध में िकसी भी लड़की ने चुनाव लड़ने से इंकार कर िदया। सामानय रुप से लड़िकयों के िलए छोड़ी गई इस सीट पर लड़िकयों ने ही एक लड़का खड़ा िकया। िफजा की बुरी तरह से हार हो गई। मिहला वकीलों ने उनहें बुरी तरह से हराया और वो सौ वोट भी नहीं ले पायी। आिखर इतनी बड़ी हार उनहें हाईकोट की मिहला वकीलों ने कयों दी।
इस समय चंदरमोहन और भजनलाल हिरयाणा में एक राजनीितक फोरस है। कांगरेस की एक लाबी उनसे घबरायी है। भजनलाल के बेटे कुलदीप िवशनोई उनके िलए चुनौती है। उनके राजनीितक गितिविधयों से सबसे जयादा परेशानी कांगरेस को है। आिखर इस बात की जांच होनी चािहए िफजा कुलदीप िवशनोई को ही िनशाना कयों बना रही है। कहीं कोई भारी राजनीितक सािजश तो नहीं। बाकी कई मामले है इस पर बाद में बात करेंगे।

M.P.Birds said...

good written on current issue

Chhavi said...

Hello Richa ji...
Achha laga aapke vichar pad kar...
Main soachti huin ki Pyar karna koi gunah nahi hai..aur jab rishton mein apasi pyar na ho to unhe jinda lash ki tarah ghasitana kahan tak achha hai...
Agar Chanadermohan ko yeh lagta tha ki uski apani patni se nahi nibh pa rahi hai to us rishtey ko achhe dangh se mukt kar sakte the...Fareb karna pehle Patni se phir premika se yeh achha nahi...
Haan agar wo ek aam insaan hota aur aisa karta to shayad surkhion mein nahi bhi aata..aur ek Neta ko uski karyshamta chhod personnel life ke basis par support karna nasamghi hai meri nazar mein...
Apaki Lekhani bahut prabhawshali hai
Chhavi

Brijesh Dwivedi said...

bahut khoob....

सागर नाहर said...

रचना जी से शत प्रतिशत सहमत।
जब एक स्त्री को पता होता है कि उसका पति उसे छोड़ (धोखा देकर) किसी और स्त्री के साथ भी छल कर रहा है, फिर दूसरी स्त्री को छोड़कर जब उसके पास आ जाता है तो किसे उस लिजलिजे इन्सान को वह सहन करती होगी।
बाकी रही अनुराधा और चंद्रमोहन, दोनों ही दूध के धुले नहीं लगते।
खुद एक स्त्री ने जानबूझ कर अपने आप को और स्त्री जाति को बदनाम किया।

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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