Wednesday, January 26, 2011

गणतंत्र दिवस- आइये कुछ सोचें

आज हम गणतंत्र दिवस की ६२ वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। दुःख का विषय है की सियासतदानो ने इस पुनीत अवसर को भी राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। एक तरफ वो फिरकापरस्त लोग हैं जो कश्मीर की पावन भूमि पर पाकिस्तान का झंडा लहराकर गर्व अनुभव करते हैं और ऐतिहासिक लाल चौक पर भारत का तिरंगा लहराने में अपनी तौहीन समझते हैं। वहीँ दूसरी और कुछ अन्य लोग भी हैं जो इस अवसर का लाभ उठा कर राजनीति की शतरंज पर अपने मुहरे सिद्ध करना चाहते है। खेद का विषय यह है कि परिणाम से दोनों ही नावाकिफ है। अभी बहुत दिन नहीं बीते जब 'वन्दे मातरम' जैसे पावन गीत पर भी दोनों पक्षों द्वारा इसी तरह की राजनीति की गई थी। आज भी यह मुद्दा कभी भी गर्म हो उठता है।जहाँ देश के कर्णधारों को राष्ट्रगान भी पूरी तरह याद नहीं है , वे राष्ट्रगीत या राष्ट्र गान का अर्थ क्या समझ पाएंगे। इन गीतों को रटने मात्र से ही हमारे कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती। क्या आज तक हम महज राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत गाने की औपचारिकता ही पूरी करते नहीं आ रहे हैं. उनके अर्थ का हमें पता ही नहीं है. कोई भी गीत या गान व्यक्ति के मानस में तभी घर बना सकता है जब वह पूर्णत: व्याख्यायित हो तथा उसका अर्थ पूर्णत: स्पष्ट हो. बिना अर्थ समझे किसी चीज का विरोध करना नाजायज ही नहीं दुखद भी है। वन्दे मातरम गीत संस्कृतनिष्ठ अधिक होने के कारण सभी के लिए समझना कठिन हैं, परन्तु दुःख की बात यह है की स्वतंत्रता के ६२-६३ साल के बाद भी इसको समझने -समझाने की कोशिश ही नहीं की गई. सम्पूर्ण गीत का अर्थ यदि ठीक प्रकार से समझा जाये तो मैं नहीं समझता की किसी हिन्दू-मुश्लिम या किसी और कौम को इस पर ऐतराज हो सकता है बशर्ते वह अपने को सच्चा हिन्दुस्तानी समझता है। वन्दे मातरम का सरल हिंदी में गीतात्मक अनुवाद करने की मैंने कोशिश की है और गणतंत्र दिवस के इस पावन अवसर पर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ । शायद कुछ लोग समझ पायें और अपने विचारों में परिवर्तन कर ला पायें , इसी विश्वास के साथ गीत प्रस्तुत है :-

हे मातृभूमि वंदन, हे जन्म भूमि वंदन॥
हम कोटि- कोटि जन की , हे कर्म भूमि वंदन।

नदियों में तेरी बहता, अमृत सा मीठा पानी
ताजे पके फलों के बागों पे है जवानी।
पर्वत मलय से आकार , शीतल सुखद हवाएँ
पावन धरा पे तेरी , चादर हरी बिछाएं
सुख समृद्दी से भरी तू, सोने सी है खरी तू
हे मातृभूमि वंदन, हे जन्म भूमि वंदन॥

शुचि श्वेत चांदनी में रातें तेरी नहाये
फूलों फलों से लदकर , सब पेड़ लहलहायें
अधरों पे तेरे खेले मुस्कान मीठी मीठी
वाणी में बांसुरी की है तान मीठी मीठी
सुखदान देने वाली, वरदान देने वाली
हे मातृभूमि वंदन, हे जन्म भूमि वंदन॥

तेरे करोड़ो बेटे , एक साथ जब गरजते
बासठ करोड़ बाजू , शास्त्रों को ले फड़कते
अबला न समझे कोई , इतनी तू शक्तिशाली
अदभुद है तेज तेरा , महिमा तेरी निराली
जन जन को अपने तारे, दुश्मन दलों को मारे
हे मातृभूमि वंदन, हे जन्मभूमि वंदन.

2 comments:

राज भाटिय़ा said...

वो क्या हे कि अगर देश की जनता जागरुक हो तो कोई भी नेता अपनी रोटियां हमारी चिता पर नही सेक सकता, ओर हमारे देश की आम जनता इस फ़र्क को नही समझती, जब की यह जनता किसी भी राजा का तख्त हिला सकती हे सरकार को घुटनो पर ला सकती हे,
आप ने बहुत सुंदर लेख लिखा. धन्यवाद

प्रदीप कुमार said...

mera bhi blog visit karen aur meri kavita dekhe.. uchit raay de...
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