Thursday, May 26, 2011

दो ग़ज़लें

एक-

खुद से बाहर कभी निकल
हाथ पकड़कर मेरा चल

जरा संभल कर रहना सीख
यह दुनिया अब है जंगल

यूं गिरना भी बुरा नहीं
फिर भी पहले जरा संभल

अब काजू बादाम उड़ा
नहीं यहाँ गेहूं चावल

इसकी बातें ध्यान से सुन
क्या कहता है ये पागल

मै बस आने वाला हूँ
बंद नहीं करना सांकल

इस तिनके की इज्जत कर
शायद कभी बने संबल

इसके आगे बस्ती है
देख भाल कर जरा निकल

रात देख कर छत सूखी
बरस गया कोई बादल

आगे है ढालान बड़ा
मुमकिन है तू जाये फिसल

मैंने नदी को रोका तो
करती चली गयी कल-कल

आज, आज की सोचो बस
कल की बात करेंगे कल

खुदा से बढ़कर नहीं है तू
खुद को इतना भी मत छल

तू खुद को तो बदल के देख
दुनिया भी जाएगी बदल

यूं ही पथ कट जाएगा
ग़ज़ल 'अनिल' की गाता चल

दो-

जंगल से उठ आये जंगल
शहरों में उग आये जंगल

बस्ती में आ गए दरिन्दे
उनको हुए पराये जंगल

शहरों के हालात देखकर
खुद से ही शर्माए जंगल

अन्दर का इन्सान मारकर
हमने वहां बसाये जंगल

ड्राइंग रूम की दीवारों पर
शीशों में जड्वाए जंगल

आँगन में कैक्टस सींचकर
हमने खूब सजाये जंगल

कुदरत शायद खुश हो जाए
आये कोई बचाए जंगल

हरे भरे सब काटे हमने
कंक्रीट के लाये जंगल

पहली बारिश की आमद से
मुस्काए, हर्षाये जंगल

5 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति

हरि जोशी said...

पहली बार इर्द-गिर्द पर प्रकाशित किसी गजल की माननीय राजकिशोर जी ने प्रशंसा की है। आज ही उनका मेल मुझे मिला। बधाई आपको कुमार अनिल जी।

Navin C. Chaturvedi said...

अच्छी गज़लें कुमार अनिल भाई
बधाई स्वीकार करें

Kumar Anil said...

भाई राज भाटिया जी, नवीन जी, जोशी जी,
आपके स्नेह के प्रति आभारी हूँ। उत्साह वर्धन के लिए शुक्रिया.

Anonymous said...

bahut ache sir..sacchai ko ghazal ki libaas pehnakar kamaal ki rachnayen pesh ki hain..

saurabh bhatt

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