Sunday, January 4, 2009

छि: ! अंग्रेजी भी नहीं आती

"पूरा डिपार्टमेंट ही हिंदी में बोलता है। ये एमए पोलटिकल साइंस की क्‍लास है और पूरी क्‍लास में एक भी बच्‍चा एक भी सवाल का अंग्रेजी में जबाव नहीं दे सकता? क्‍या पढ़ाते हैं आप इन्‍हें?" कुछ ऐसे ही शर्मसार करने के अंदाज में ये जुमले बोले गए मेरठ के चौधरी चरणसिंह विश्‍वविद्यालय के राजनीतिशास्‍त्र विभाग में। ये जुमले फेंककर शर्मिंदा करने का नेतृत्‍व कर रहीं थीं गौर बांगा विश्‍विद्यालय कोलकाता की कुल‍पति प्रोफेसर सुरभि बनर्जी जो एक तरह से महारानी की भूमिका में थीं। जी हां! प्रोफेसर बनर्जी विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के उस दल की अगुवाई कर रहीं थीं जो खैरात के लिए चौधरी चरण सिंह विश्‍वविद्यालय के निरीक्षण को आया था। अब आप ही बताइए कि जिस दल की रिपोर्ट पर करोड़ों रूपयों का खेल हो तो उसकी अगुवाई करने वाली विदुषी महारानी विक्‍टोरिया जैसा व्‍यवहार क्‍यों न करे।
आईए पहले आपको ये बता दें कि विश्‍वविद्यालय की टीम चौधरी चरण सिंह यूनीवर्सिटी क्‍यों पंहुची। ग्‍यारहवीं पंचवर्षीय योजना के तहत विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग की टीम तीन दिवसीय निरीक्षण के लिए आई। चौधरी चरण सिंह विश्‍विविद्यालयय प्रशासन ने इस योजना में विश्‍वविद्यालय का कायाकल्‍प करने के लिए करीब पौने तीन सौ करोड़ की योजना यूजीसी के पास स्‍वीकृति के लिए भेजी थी। प्रस्‍ताव के मुताबिक चौधरी चरण सिंह विश्‍वविद्यालय में चार नई शोध पीठ स्‍थापित करने, ई-गवर्नेंस, शिक्षकों की संख्‍या में कमी, वैज्ञानिक शिक्षा और अकादमिक स्‍टाफ की नियुक्ति जैसी योजनाओं के लिए धन की आवश्‍यकता बताई गई थी। इन्‍हीं प्रस्‍तावों और यूनीवर्सिटी की वर्तमान प्रगति आंकने के लिए यूजीसी की टीम तीन दिन के लिए पंहुची और उसने पहले ही दिन विश्‍वविद्यालय के अठारह विभागों का दौरा किया। वैसे दो दिनों में नौ सदस्‍यीय दल को केवल सात घंटे खर्च कर विश्‍वविद्यालय का हालचाल जानना था। आप समझ सकते हैं कि एक विश्‍‍वविद्यालय का सात घंटे में क्‍या और कैसे आंकलन हो सकता है।
परम्‍परा के मुताबिक चौधरी चरण सिंह विश्‍वविद्यालय के कुलपति और उनके सहयोगी पंद्रह दिन तक यूजीसी के आकाओं के स्‍वागत की तैयारी में जुटे रहे। एक-एक विभाग को चमकाया गया। अधिकाधिक उपस्थिति के लिए गुहार की गई। सारी व्‍यवस्‍थाएं चाक-चौबंद की गईं। लंच-डिनर और नाश्‍ते के लिए लजीज पकवानों की सूची तैयार की गई। ऐसे स्‍वागत-सत्‍कार की तैयारी कि आने वाले राजाओं की टोली खुश होकर आशीर्वाद दे दे और विश्‍वविद्यालय को अनुदान मिलने का रास्‍ता साफ हो जाए। हांलाकि ये सब शिक्षा की दशा-दिशा सुधारने के लिए किए जा रहे प्रयत्‍नों का हिस्‍सा है और ये योजनाएं अगर साकार होती है तो इससे उच्‍च शिक्षा को ही लाभ होना है लेकिन विश्‍वविद्यालय के कुलपति के लिए तो ये बिल्‍कुल वैसा ही समझिए कि मानों कोई पिता अपनी पुत्री के विवाह के लिए वर पक्ष के लोगों के आगमन पर किसी भी स्‍तर पर कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता।
इतनी सारी व्‍यवस्‍थाएं चाक-चौबंद करने वाला विश्‍वविद्यालय प्रशासन क्‍या करता। उसे क्‍या मालूम था कि आजाद भारत की हिंदी वेल्‍ट में आजादी के इकसठ सालों बाद भी फिरंगियों की भाषा उन्‍हें इस कदर अपमानित कराएगी! वह कर भी क्‍या सकते थे? पंद्रह दिन में पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के छात्रों को अंगेजी की घुट्टी घोलकर उन्‍हें देसी अंग्रेजों के काबिल बनाना मुमकिन भी न था। अब प्रोफेसर बनर्जी को कौन समझाए कि चौधरी चरण सिंह विश्‍वविद्यालय में जिस जमीन से छात्र आते हैं वहां गन्‍ने और गुड़ की खुशबु से राजनीति उपजती है। पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में अधिकांश छात्र पोलिटिकल साइंस नहीं बल्कि राजनीति शास्‍त्र पढ़ते हैं। यहां के सरकारी स्‍कूलों में प्राइमरी तक अंग्रेजी की एबीसीडी भी नहीं पढ़ाई जाती। जहां बच्‍चा पढ़ाई के साथ-साथ खेतों में हल या ट्रैक्‍टर चलाना भी सीखता है। अगर ग्रामीण पृष्‍ठभूमि के ऐसे बच्‍चे अपनी लगन पर उच्‍च शिक्षा के लिए विश्‍वविद्यालय की शक्‍ल भी देख लेते हैं तो ये उनकी जीवटता है और चौधरी चरणसिंह विश्‍वविद्यालय के ज्‍यादातर छात्र ग्रामीण पृष्‍ठभूमि से ही निकल कर वहां तक पंहुचे हैं। ऐसे में उनसे ऐसी भाषा में सवाल पूछना जिसे वह समझते ही नहीं, कहां तक न्‍यायसंगत है? क्‍या ये देश का संविधान कहता है कि एमए पोलिटिकल साइंस को राजनीतिशास्‍त्र कहना गुनाह है? क्‍या राजनीतिशास्‍त्र हिंदी में नहीं पढ़ा-समझा जा सकता? क्‍या हिंदी अभी भी गुलामों की भाषा है? क्‍या राष्‍ट्रभाषा हमारे आधुनिक राजाओं से इसी तरह अपमानित होती रहेगी? क्‍या राजनीति का ककहरा भी अब एबीसीडी में सीखना होगा? क्‍या हम इसी तरह से मा‍नसिक गुलामियत में जीवन जीने को अभिशप्‍त रहेंगे? आशा है कि अंतर्जाल पर हिंदी का चिट्ठाजगत ही इन गुलाम मानसिकता वाले आधुनिक राजाओं को जबाव देगा।

23 comments:

masijeevi said...

प्रोफेसर बनर्जी को तो हम जानते नहीं बंगाल के विद्वान खुद अपनी भाषा को लेकर गर्व महसूस करते रहे हैं। हॉं हो सकता है कि हिन्‍दी व उत्‍तरभारतीयों को लेकर जो ग्रंथि बॉंग्‍स में देखी जाती है शायद उसीका प्रभाव प्रो बनर्जी में होगा।

इतना तयशुदा तौर पर कह सकता हूँ कि अच्‍दे शिक्षक व विद्वान ये क्षुद्रता नहीं दिखाते हमारे विश्‍वविद्यालय में चोटी के विद्वान इतिहास व राजनीति विज्ञान में प्रोफेसर रहे हैं लेकिन आमतौर उन्‍हें हिंदी माध्‍यम के छात्रों के साथ समानता का व्‍यवहार करने का प्रयास करते ही देखा है।

राजेन्‍द्र said...

इन देसी अंग्रेजों के लिए फिलहाल मुझे संसदीय भाषा में कुछ कहने की इच्‍छा नहीं है।

ताऊ रामपुरिया said...

ये सब बडा दुर्भाग्य पुर्ण है.

रामराम.

khamoshi todo said...

agar adyapak log hi chatro ki mana sthithi nahi samajh payege to jaan lijiye bharat or india ke beech ki khai hamesha hi bani rahegi. maine bhi apni life main is apmaan ko kai baar piya hai. kabil hone ke bavzood bhasai aadhar par agar koi aapke saath aisa anyay kar de to ye ise main mere manavadhikaro ka hanan manta hu.jis tarah un chatro ka dosh beneegi adyapika ji se angregi main baat karna nahi tha. waisa hi dosh beneergi sahiba ka bhi tha ki unhe desh main sabse zyada boli jaane wali hindi bolne (zaanbhujkar ya nahi aati ho)main jijhak hui.main manta ho ki hindi aisi bhasha hai jise 5 din main koi bhi bolna sikh sakta hai.kyonki hindi main sab chalta hai. aur galat hindi bolne par aapko sharminda bhi nahi hona padta hai. lekin dosri bhasayo ke saath aisa nahi hai.




kapil sharma
reporter in business standard
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9990907571

राज भाटिय़ा said...

छि: ! अंग्रेजी भी नहीं आती" तो मे इन प्रोफ़ेसर बनर्जी को बताना चाहुगा की पुरे युरोप मे सिर्फ़ दो तीन देशॊ को छोड कर किसी भी अन्य देश मै ंग्रेजी नही बोली जाती, मै प्रोफ़ेसर बनर्जी से यही कहुगां छि: ! हिन्दी भी नहीं आती" केसे आजाद देश के नागरिक हो तुम??अगर ऎसा गुरु होगा तो गुलाम तो बहुत बन जायेगे

Umed said...

अपनी भाषा से कटे, ये मैकाले पुत्र.
भूरे साहब चला रहे, तभी दुष्ट है तन्त्र.
बहुत दुष्ट है तन्त्र, करे अपमान राष्ट्र का.
दुश्मन बन बैठा है,अपने हिन्दु-राष्ट्र का.
कह साधक कवि,तन्त्र हटा-भारत को बचाओ.
राम के भाई भारत का शासन फ़िर से लाओ.

विनय said...

शायद बंगाली में बोलते तो अंग्रेजी का ख़्याल ज़हन से उतरता!

Binod Ringania said...

प्रो. बनर्जी की तो मैं नहीं जानता लेकिन यह गुजारिश जरूर करूंगा कि हिंदी प्रदेश अब अंग्रेजी को नजरंदाज करना बंद करें। अंग्रेजी का राजनीतिक विरोध कर हिंदी प्रदेशों ने काफी नुकसान उठाया है। इसमें बंगालियों से शिक्षा ली जा सकती है। उन्होंने अपनी भाषा की उन्नति के लिए जितना काम किया है शायद ही अन्य भाषाभाषियों ने। लेकिन अंग्रेजी की अवहेलना उन्होंने नहीं की। अंग्रेजी भारत में रहने वाली है। इसे सीखिए, अपनी भाषा सीखते हुए। राजनीतिक नारेबाजी से कोई लाभ नहीं होने वाला।
विनोद रिंगानिया
गुवाहाटी

sandhyagupta said...

Gulam mansikta ko ade hathon lete hue bilkul sahi likha hai aapne.Anya bhashaon ko sikhna aur janna aur bat hai lekin apni bhasha hi atmvikash ka adwitiya madhyam hai.

राजकिशोर said...

प्रो. बनर्जी इस तरह की अकेली मूरख नहीं हैं। उनके भाई-बहनों की संख्या लाखों में है। इनमें से एक-तिहाई दिल्ली में रहते हैं।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

छिः...!

tarot card said...

looks very complex -_@

pramod said...

Bhasha kisi ki baputi nahi haoti.jis madhyam me appa apni Bhavanao ko samjha sanke us bahash ko bolne me sharm nahi aani chahiye.savidhan me yeh adhikar kisi ko nahi hai ki hamari pandhrh aur angregi ke baijjati karePro.Banarjee ko shayd pure desh ki vibbhin sabhyato ko gyan nahi hai

शैलेश भारतवासी said...

क्‍या हिंदी अभी भी गुलामों की भाषा है?

इसका उत्तर लगभग 'हाँ' में है।

Arvind Mishra said...

बेहद अफसोसनाक !

garuna said...

आपको इससे बकवास विषय साझा करने के लिए नहीं मिला क्या भाई। आप जैसे लोग क्यों दूसरों का वक्त बरबाद करते हैं। हालांकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि अंग्रेजी आना कितना जरूरी है। पढ़ रहे हैं राजनीति शास्त्र और चाह रहे हैं कि यूरोप और मध्यएशिया की राजनीति आपको कोई हिंदी में पिला दे। तब तो आप चाहेंगे कि आपकी बोली में राजनीति शास्त्र पढ़ाया जाए। अपना और दूसरों का वक्त बरबाद करना और दिग्भ्रमित करना बंदे करें महोदय। हिंदी पर आपका यह सबसे बड़ा उपकार होगा।

ओमकार चौधरी said...

प्रोफेसर बनर्जी जैसे लोगों की हिन्दी विरोधी मानसिकता पर गुस्सा भी आता है, तरस भी. इन्हे इस पर शर्म आनी चाहिए कि ये हिन्दी भी नहीं जानते. वैसे हिन्दी को गाली देना फैशन बन गया है. हिन्दी को तुच्छ समझने वाले ऐसे लोग दरअसल गुलामी और सामंती मानसिकता से उबर ही नहीं पा रहे हैं.

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

प्रो.सुरभि बैनर्जी को कैसा व्यवहार करना चाहिए था या कैसा नहीं, ये विषय अलग है, सवाल ये है कि आज के आधुनिक परिवेश में शिक्षा केवल अंग्रेजी माध्यम के लिए ही है? और यदि कोई इस माध्यम में जरा भी कमजोर है,तो वह अशिक्षित है?
जी हां,आज ये बात सच सी लगती है...
शायद प्रो.बैनर्जी को लगता होगा की केवल अंग्रेजी में बात करना, उत्तर देना, तर्क देना ही शिक्षा और ज्ञान की परिभाषा है, पर प्रो.साहिबा ये भारत ही है, जहां की दूसरी भाषाओं के आधार पर ही ज्ञान को आंका जाता है, तभी तो आज भी हमारे देश के युवा विदेशी भाषाओं का ज्ञान लेकर विदेशों में कार्य करने के लिए जाते है, क्योंकि हमारी भारतीय भाषाएं तो अपने ही देश में द्वयम दर्जे की मानी जाती है, आप जैसे तथाकथित बुद्धिजीवियों की मेहरबानी से। कभी भारत से ही विदेशों को ज्ञान देने वाले विषय अपने ही देश में केवल विदेशी भाषा के आधार पर ही अपने छात्रों से दूर होते जा रहें है, पहले इस बानगी में गणित,अर्थशास्त्र,इतिहास तथा दर्शन शास्त्र ही थे, पर अब राजनीति शास्त्र भी भाषाई ज्ञान की भेंट चढ़ गया। लगता ही नहीं की ये देश आर्यभट्ट,चाण्क्य,शंकराचार्य जैसे विद्वानों का रहा होगा। ये देश केवल और केवल,कुछ विदेशों से पढ़कर आए शिक्षकों का सा लगता है...

waghe khandoji said...

english ana to more important hai . kyon ki ajki takniki bhasha english banti ja rahi hai . magar yah galat hai ki english na ana utani tirskarniy ghatana nahi hai . kyon ki bhasha ka matalab hai ak vyakti ke vichar , bhavana aur idias dusare vyakti ko samajna . jab yah vo sakata hai tab kounsi bhi bhasha tirskarniy nahi ho sakati. bhasha ke adhar par ham kisi ki bhi sambhavna kar nahi sakte.

रंजना said...

क्‍या ये देश का संविधान कहता है कि एमए पोलिटिकल साइंस को राजनीतिशास्‍त्र कहना गुनाह है? क्‍या राजनीतिशास्‍त्र हिंदी में नहीं पढ़ा-समझा जा सकता? क्‍या हिंदी अभी भी गुलामों की भाषा है? क्‍या राष्‍ट्रभाषा हमारे आधुनिक राजाओं से इसी तरह अपमानित होती रहेगी? क्‍या राजनीति का ककहरा भी अब एबीसीडी में सीखना होगा? क्‍या हम इसी तरह से मा‍नसिक गुलामियत में जीवन जीने को अभिशप्‍त रहेंगे?



बहुत बहुत सही मुद्दा उठाया आपने.......
सचमुच लगता है गिरेबान पकड़कर इन तथाकतित आकाओं से इस सवाल का जवाब लिया जाए.
ज्ञान को भाषा का मुहताज करने की इनकी साजिश अंगरेजी खाल लपेटे अपने उजले साहब वाले श्रेष्ठता को बरकरार रखने के लिए है.इन्हे नही पता कि आमजन और आमजन की भाषा में ज्ञानदान का क्या महत्व है.

उन्मुक्त said...

मेरे विचार से जितनी भाषाऐं आयें उतना ही अच्छा है। हिन्दी बोलने और लिखने पर हमें गर्व है अंग्रेजी भी आये तो अच्छा है।

Dr. Amar Jyoti said...

मैकाले के मानस-पुत्र/पुत्री जीवित ही नहीं हैं फल-फूल भी रहे हैं।

Tej Prakash Yadav said...

besharmi ki had par kar di prfessor sahiba ne..wo prof kahlane ke kabil nahi

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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