Thursday, October 30, 2008

जलते सवाल


रामेश्‍वर काम्बोज ‘हिमांशु’ का नाम लघुकथा आंदोलन से जुड़ा है। लेकिन हिंदी के इस चर्चित लघुकथाकार ने समय-समय पर इर्द-गिर्द की घटनाओं और उनसे उपजे सवालों पर कविताओं के माध्‍यम से आपकी चुप्‍पी तोड़ने की कोशिश की है। ताजा हालात पर उन्‍होंने एक कविता इर्द-गिर्द के लिए भेजी है। आशा है आप अपनी प्रतिक्रियाओं से उनका स्‍वागत करेंगे।

छायाचित्र Word Photos से साभार

ट्रेन जलाई जा रही है
यह समझने की बात है-
क्या यह लालू जी की भैंस है ;
जिसने ग़लती से आपका खेत
चर लिया था या
इस मरखनी भैंस ने
किसी के पूत को
सींगों पर धर लिया था?


चक्का जाम है-
क्या ये रास्ते
किसी गलत मंज़िल की ओर जा रहे हैं
या किसी चलने वाले को सता रहे हैं
ये रास्ते किसी के जूते की कील हैं ?
जो पैरों में गड़ रहे हैं
या किसी के माथे पर कलंक का टीका
जड़ रहे हैं?


राह चलते लोग,
जिन्हें हम जानते तक नहीं
उनको मार दे रहे हैं
ये दूकाने -जिन पर लोग
घर का चूल्हा जलाने के लिए बैठे है।
हमारे दुश्मन कैसे बन गए
हम आज तक नहीं समझ पा रहे हैं
‘पंजाब ,सिन्ध ,गुजरात ,मराठा,द्रविड़ ,उत्कल ,बंग’
इतने साल गा कर भी
हम अर्थ नहीं समझ पा रहे हैं।
हम किस अँधेरी गुफ़ा में जा रहे हैं?


नहीं पता ।
मेरे घर मे लगे
शहीद भगतसिंह,सुभाष चन्द्र बोस और शिवाजी के कलेण्डर
मेरे गाँव-घर का पता पूछ रहे हैं-
सोच नहीं पा रहा हूँ
मैं क्या बताऊँ ?
जो आज़ादी के वक़्त देश मिला था
उसे ढूँढ्कर कहाँ से लाऊँ?

Friday, October 24, 2008

अब तार नहीं आते हैं बस तार बाबू आता है

तार, अरे भाई टेलीग्राम,
जो जैमिनी की पुरानी
काली-सफेद फिल्मों
और दूरदर्शन के

सीरियलों में अब
भी दिख जाता है।



दीपावली आ रही, त्यौहार के 4 दिन पहले से लेकर 4 दिन बाद तक इनाम मांगने वालों की भीड़ लगी रहेगी। चंद्रयान के युग में भी हमेशा डेड रहने वाले बीएसएनएल के लैंडलाइन फोन वाला लाइनमैन आएगा, बत्ती गुल हो जाने पर कभी भी फोन ना उठाने वाले बिजली कर्मचारी आएंगे, रोज़ आधा कचरा डिब्बे में ही छोड़ जाने वाला सफाई कर्मचारी आएगा, रात को दफ्तर से लौटने पर हमेशा सोता नज़र आने वाला सोसायटी का चौकीदार आएगा और मुहल्ले भर की चिट्ठियां एक ही घर में पटक जाने वाला डाकिया भी खींसे निपोरते हुए घंटी बजाएगा। सब आएंगे, साल भर के ताने एक दिन में सुनेंगे फिर पचास का नोट लगभग हाथ से छीनने के अंदाज़ में जेब में ठूंसेंगे और मुस्कराते हुए चले जाएंगे, मानो कह रहे हों देखा कैसा बनाया, साले को।

लेकिन इन सामाजिक झपटमारों की भीड़ में मुझे लुटने के लिये सबसे ज़्यादा इंतज़ार रहता है तार बाबू का। तार बाबू यानी वो कर्मचारी जो तार लाता था। अब तार तो नहीं आते हैं लेकिन कुछ इलाकों में दीपावली के मौके पर तार बाबू ज़रूर नज़राना लेने आते हैं। जो कम उम्र के हों उनको बता दूं कि आजकल जो छोटे मोटे संदेश एसएमएस से भेजे जाते हैं ना वो पहले तार से भेजे जाते थे। हर शहर में एक तारघर होता था। खाकी वर्दी पहने, खाकी टोपी लगाये हेडलाइट वाली साइकिल पर घंटी बजाते हुए आने वाले तारबाबू को आते देखते ही आम लोग सहम जाते थे और फौजी खुश हो जाते थे। मोहल्ले में दहशत फैल जाती थी कि पता नहीं किसके बाबू जी या अम्मा जी चल बसे। लेकिन फौजियों के लिये घर से आने वाला अम्मा-बाबू की बीमारी तार छुट्टी मिलने की गारंटी होता था, शायद अब भी होता हो। हमारे गांव के कई फौजी तो जब छुट्टी में गांव आते थे तो घर के कामकाज के हिसाब से अगली छुट्टी के लिये तारीख तय करके तार भेजने के लिये मजमून भी लिखवा जाते थे। तय तारीख को उनके लिये तार होता था, तार पहुंचता था और और फौजी गांव भर के लिये कैंटीन से मंगाई रम, मच्छरदानी, एचएमटी की घड़ी, टॉर्च, रब़ड़ की चप्पलें और अफगान स्नो की चार शीशियां लेकर हाज़िर हो जाता था। तार झूठ को विश्वसनीयता में बदलने की ही नहीं तेजी की भी गारंटी था। लैंब्रेटा और फिएट के उस युग में भी आज की स्पीड पोस्ट से जल्दी तार पहुंचते थे। चाहे उत्तर-पूरब में बसा नेफा हो या जैसलमैर में रेत के टीलों के बीच नज़र ना आने वाली सीमा सुरक्षा बल की चौकी हो, जम्मू-कश्मीर की बर्फ में गश्त लगाते सैनिक हों या समंदर की पहरेदार करते कोस्ट गार्ड, दूसरे विश्व युद्ध के वक्त की बनी मशीनों से तार झट से पहुंचता था। तेजी का आलम ये था कि 10 पैसे के पोस्टकार्ड पर चिट्ठी को ही तार का रूप देने के लिये अम्मा नीचे एक लाइन जुड़वा देती थीं, इसे चिट्ठी नहीं तार समझना और मिलते ही बच्चों के साथ चले आना।

बाद में खुशी के भी तार आने लगे, नौकरी मिलने के, शादी होने के बेटा होने के, अपने मकान में जाने के, तरक्की होने के वगैरह-वगैरह। लेकिन अब तो कोई तार नहीं आता। मुझे तो 22 साल पहले आखिरी तार मिला था, नौकरी मिलने का। जिसके जवाब में मैनें भी तार किया था। उसके बाद दो-तीन साल तक तार से आने वाली खबरें बनाता रहा और एक दिन अचानक वो तार गायब हो गये और उनकी जगह फैक्स ने ले ली। कुछ पुरानी पत्रिकाओं और सरकारी दफ्तरों की स्टेशनरी में आपको अब भी तार का पता मिल जायेगा लेकिन तारघर ढूंढे नहीं मिलेगा। पहले हर शहर में टाउनहाल, घंटाघर, गांधी रोड की तरह एक तारघर भी होता था। लेकिन ना अब टाउन हाल रहे ना घंटाघर और ना ही तारघर। लेकिन होली और दीपावली के वक्त दिखने वाला तारबाबू अभी है। मुझे बाकी लोगों की तरह तारबाबू को बख्शीश देना नहीं खटकता। बल्कि मैं चाहता हूं कि वो आये मैं उसके साथ बैठकर चाय पीऊं और उन दिनों के बारे में जानूं जो उसने जिये हैं। अब तो मैं हर होली-दीपावली बड़ी शिद्दत से उसका इंतज़ार करता हूं कि क्योंकि मुझे पता है कि अब वो कोई बुरी खबर नहीं लाता है। अब वो हमारे लिये तेजी से गुजरते समय में उन सुस्त रफ्तार दिनों के इतिहास का हरकारा है जिन्हे हमने जिया है।

Tuesday, October 21, 2008

लोगों का काम है कहना




शिक्षाविद और साहित्‍यकार राधा दीक्षित ने लोक साहित्‍य पर काफी काम किया है। हिंदी और अवधी के लोकगीतों और लोकमुहावरों पर उनकी शोधपरक पुस्‍तकें काफी चर्चित रहीं हैं। भारी-भरकम शब्‍दों से भरा एक संस्‍मरण उन्‍होंने बड़े स्‍नेह से इर्द-गिर्द के लिए भेजा है। पढिए, संस्‍मरण में छिपी वेदना को समझिए।






ऊंच चबूतरा तुलसी का बिरवा
तुलसी का बिरवा
तुलसा जमीं घनघोरे न.....

भोपाल में अवधी का ये लोकगीत सुनकर पुलकित हुई ही थी कि कानों में सीसा उड़ेलती कर्कश ध्‍वनि टकराई, ' आजकल के फैशन की बलिहारी। सुखी-सुहागिन हैं, पर हाथों में देखो तो क्‍या लटकाएं हैं, कांच की चूडियों से जैसे वैर है वैर।'

फुसफुसाहट से आहट होकर उनकीं निगाहों का अनुगमन करती हुई मेरी दृष्टि बाईं और बैठी, अनुपम सौंदर्य की स्‍वामिनी भद्र महिला पर पड़ी। निगाहें थमीं की थमी रह गईं। बैठने की मुद्रा कितनी प्रभावशाली है। मृदु, मधुर स्‍वर, एक-एक शब्‍द मोती जैसा झरता हुआ! उनके बारे में जानने की इच्‍छा बलवती हो उठी।

हां मैं भोपाल से आई थी अपने एक पारिवारिक मित्र के समारोह में। महिला-संगीत का कार्यक्रम चल रहा था। जलपान के बाद मैनें उनसे मिलने का बहाना ढूंढ ही लिया। उनके हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘ कितनी प्‍यारी हैं आप और कितने प्‍यारे हैं कंगन हैं आपके।‘ उन्‍होंने मेरे कंधे थपथपाते हुए कहा, ‘अक्‍सर तो इनके लिए आलोचना ही सुननी पड़ती है। अच्‍छा लगा तुमसे मिलकर।‘ मन में कौंधा, अच्‍छा तो ये अपनी आलोचना से बेखबर नहीं हैं। बातें शुरू हुईं तो रवर की के मानिंद खिंचती चली गईं। उन्‍होंने बताया, मेरे भैय्या की नियक्ति फिरोजाबाद में हुई। मन में सतरंगी सपने जाग उठे। चूडियों का शहर फिरोजाबाद। ढेर सारी चूडियां लाउंगी। रंग-बिरंगी, हर साड़ी, हर सूट से मेल खाती। एक दिन मैं फिरोजाबाद पंहुच गई। भईया उच्‍चाधिकारी हैं। मेरे उगमते उत्‍साह को देखकर उन्‍होंने चूड़ी कारखाने को देखने का भी प्रबंध करवा दिया। मैं उत्‍साह से भरपूर एक-एक चीज को देख रही थी, कैसे वे कांच को पिघलाते हैं, कैसे कांच की लंबी-लंबी लटें बनाते हैं, कैसे उन्‍हें काटकर विभिन्‍न रंग-रूप देते हें। मैं शिशुवत उत्‍साह से सब देखती रही। जब उन्‍होंने मेरी उंगलियों की नाप के कांच के बने छल्‍ले दिए तो उन्‍हें पहनकर कांच की उष्‍मा देर तक महसूस करती रही। साथ के लोग कारखाने के एक-एक विभाग को दिखलाते रहे और धीरे-धीरे मेरे सामने एक नया रहस्‍य खुला। वहां बच्‍चे, बूढ़े, हर आयु वर्ग के लोग काम कर रहे थे। पता चला कि यहां के मजदूर असमय ही बुढ़ा जाते हैं और काल के ग्रास बन जाते हैं। कांच से चूडियां बनाने की प्रक्रिया में उत्‍सर्जित गैसों से उन्‍हें यक्ष्‍मा यानी टीवी जैसे राजरोग हो जाते हैं। यह देख-सुनकर मेरा मन वितृष्‍णा से भर उठा। पहले चूडियों भरे हाथों पर मैं इतराती घूमती थी। अब वही हाथ नौ-नौ मन के भारी लगने लगे थे।

उसी समय निर्णय ले‍ लिया, अब कांच की चूडियां नहीं पहनूंगी। पर निर्णय क्‍या इतना सरल था। सासू-मां चाहती थीं कि उनकी इकलौती बहु भर-भर हाथ चूडियां खनकाती और पायल बजाती घर-आंगन में दौड़ती फिरे। मन कचौट रहा था। हिम्‍मत करके मैने पतिश्री से पूरी बात बताते हुए कहा, ‘तुमहीं बताओ, मैं क्‍या करूं?’ पतिश्री ने मेरा हमेशा मान रखा है, साथ दिया है। बोले, ‘रंजना, तुम्‍हारा जो मन हो करो। अम्‍मा जी को मैं समझा लूंगा।‘ मैं अपनी सासू-मां की आजीवन ऋणी रहूंगी कि उन्‍होंने इस विषय को कभी उठाया नहीं। तब से आज तक मैंने कांच की चूडियां नहीं पहनीं।

बड़ा सा टीका लगाए उस अपूर्व सौंदर्य की स्‍वामिनी को मैं निहारती रहो। कितनी करूणा छिपी है इस छरहरी काया में। लोगों का क्‍या! लोगों का काम है कहना!

Friday, October 17, 2008

पधारो ना म्हारे देस (अगर यही करना है तो)

हिमाचल प्रदेश में कुल्लू से मणिकर्ण जाते हुए रास्ते में पड़ने वाले कसोल में जो चल रहा है वो बताता है कि हम किस किस्म का पर्यटन मॉडल विकसित कर रहे हैं और मेहमाननवाज़ी के नाम पर क्या कर रहे हैं। पार्वती नदी के किनारे बसे कसोल के दड़बेनुमा सस्ते होटलों और घरों में महीनों तक रहने वाले इन सैलानियों में से काफी तादाद दरअसल इज़राइली नौजवानों की हैं जो तीन साल की अनिवार्य सैनिक शिक्षा के बाद लंबी छुट्टी मिलने पर सीधे भारत और भारत में भी कसोल जैसी जगहों की तरफ भागते हैं। पार्वती नदीं के किनारे गरम पानी के सोते ही नहीं बल्कि कसोल के आसपास मिलने वाली उम्दा किस्म की चरस और और दूसरे सस्ते नशे परदेसी सैलानियों को थकान उतारने में मदद करते हैं।

किराये की बुलेट मोटरसाइकिल पर घूमने वाले इन सैलानियों के बीच कसोल से कुछ ऊपर बसे मलाणा गांव के आसपास चोरी छुपे पैदा होने वाली चरस बड़ी लोकप्रिय है जिसे मलाणा क्रीम कहा जाता है। मलाणा क्रीम लेने के लिये इनको कहीं जाने की ज़रुरत नहीं बल्कि हिमाचली नौजवान होम डिलीवरी दे देते हैं। लेकिन जो जाना चाहते हैं उनके लिये कसोल से मलाणा गांव महज़ 14 किलोमीटर है, 9 किलोमीटर तक तो सड़क जैसा कुछ हैं और बाकी 5 किलोमीटर पहाड़ की चढ़ाई है। हम और आप तो एक किलोमीटर में ही टें बोल जायें लेकिन परदेसी मेहमान ऊपर पहुंचकर कुछ खास मिलने की खुशी में हिरण की तरह कुलांचे भरकर देखते-देखते आंखों से गायब हो जाते हैं।


रास्ते में भागते दौड़ते सैलानी ही नहीं दिखते हैं बल्कि आधे नंगे और बेसुध पड़े सैलानी भी दिखते हैं। इनकी चिलम कभी बुझती नहीं है । धुंए के साथ उड़ती भारतीय मान्यताओं की परवाह किसे, गांव वाले भी कुछ नहीं कहते क्योंकि उनको इनसे कमाई होती है। कमाई क्या बस यों कह लीजिये दालरोटी चल जाती है क्योंकि ये सैलानी कोई खर्च करने वाले सैलानी नहीं होते हैं। पांच हज़ार में एक कमरा लेकर 5-6 युवक-युवतियां उसमें रह लेते हैं। नशा उतरने पर जब दो-तीन दिन में एक बार खाना खाते हैं तो एक बोतल पेप्सी और तीन-तार रोटियां। एक बोतल पेप्सी से एक-एक कप पेप्सी लेकर उसमें रोटियां भिगोकर खा लेते हैं।


वैसे यहां के ढाबों में हर तरह का इजराइली खाना भी उपलब्ध है। मैन्यू भी हिब्रू में होता है और वेटर भी हिब्रू बोलने वाला। लेकिन इन लोगों के पास खाना खाने के लिये वक्त ही कहां है। ऐसे सैलानी किसी तरह का राजस्व नहीं बस गंदगी ही दे रहे हैं इस देश को और समाज को। इनको नशा मुहैया कराने वाले खुद भी कोई नशे से दूर थोड़े ही हैं। महीने-महीने भर तक ना नहाने वाले परदेसी युवक-युवतियों के देशी युवक युवतियों के साथ रिश्ते भी अजीब किस्म का सामाजिक समीकरण बना रहे हैं। ऐसे कई जोड़ों ने शादी कर ली है, अब ये शादी या तो भारत में बसने के लिये है या उनके साथ परदेस जाने के लिये, क्योंकि इसमें रिश्ता कम सौदा ही ज़्यादा दिखता है।

Thursday, October 16, 2008

इज़राइल से दूर एक इज़राइल


कुल्लू से मणिकर्ण जाते हुए रास्ते हुए में एक जगह पड़ती है कसोल। अजीब माहौल, अजीब से रेस्त्रां और अजीब सी ही दुकाने, अजीब सी बोली में खुसुर-पुसुर के अंदाज़ में बात करते लोग और अजीब सी भाषा में लिखे हुए साइन बोर्ड। कुछ अपने से दिखते लोगों के बीच एक और अपनी सी चीज़ नज़र आती है रॉयलइनफील्ड की बुलेट मोटरसाइकिल, जिसके तीन छोटे-बड़े सर्विस स्टेशन इस ज़रा सी बस्ती में मुझे दिख गये। फिर पता चलता है कि ये लोग इज़राइल के सैलानी हैं, और इन्हीं की सुविधा के लिये यहां के सारे साइनबोर्ड इज़राइल की भाषा हिब्रू में लिखे गये हैं। मिनी इज़राइल सा नज़र आ रहे कसोल में आने वाले सैलानियों में से 90 फीसदी इज़राइल के होते हैं जो दो चार पांच दिन के लिये नहीं बल्कि 5-6 महीने और कई तो यहीं बस जाने के लिये आते हैं। परदेस में अपने देश की हैसियत जानकर बड़ा अच्छा लगा। कुछ लोगों ने बताया कि लड़ाई और आतंकवाद से ऊबे इन लोगों को कसोल में सुकून मिलता है। लेकिन जब वहां गाड़ी खड़ी की और एक दिन ठहरने का मन बनाया तो कसोल और इज़राइलियों की तारीफ के कसीदे काढ़ रहे लोग परेशान हो गये। मेरी खोजी बातों से हाल ये हो गया कि खाली होटल (अगर उनको होटल माना जाये तो) वालों ने भी मुझे कमरा देने से मना कर दिया। गाड़ी पर लगा एक बड़े नेशनल टीवी चैनल का स्टीकर उनको कुछ ज़्यादा ही परेशान कर रहा था जबकि ना मेरे पास कोई कैमरा था ना माइक। बिखरे बालों में मैं भी टी शर्ट, लिनेन का पायजामा और स्लिपर्स पहने वहां के सैकड़ों सैलानियों जैसा ही हिप्पी लग रहा था। लेकिन ना जाने क्या हुआ कि देखते-देखते कसोल में कर्फ्यू सा लग गया, कोई मुझसे बात करने को तैयार नहीं। दुकानदारों ने बिसलरी की बोतल तक बेचने से मना कर दिया।
चढ़ी आंखों वाले एक आदमी ने मेरे ड्राइवर को समझाया, चले जाओ यहां से। ड्राइवर ने भी आकर बस इतना कहा, साहब निकल लो बस। जब ड्राइवर ने भी हाथ खड़े कर दिये तो मेरे सामने कोई रास्ता नहीं बचा। लेकिन मैने तय कर लिया कि मैं रहूंगा आसपास ही कहीं। और फिर इसके बाद कुल्लू से जगतसुख और कसोल होकर मणिकर्ण के बीच तीन रोज़ तक गाड़ी दौड़ाकर जो कहानी सामने आई वो चौंकाने वाली है।


आगे की कहानी यहाँ है॰॰॰॰

Tuesday, October 14, 2008

फिर याद आए मातादीन



ये कोई नई खबर नहीं है। बस! समय, स्‍थान और पात्र बदले हुए हैं। पुलिसिया किस्‍सों में ये आम हैं। परंपरागत हैं। लेकिन फिर भी ये घटनाएं जहां भी हों, परदे में नहीं रहनी चाहिएं। आप अपनी मनपसंद बात न सुनने या पढ़ने पर मीडिया को चाहें जितना भी कोसें लेकिन ये भी सच है कि ऐसे मामले गिनती की दुनिया से परे हैं जिनमें मीडिया की वजह से न्‍याय का दीपक जल पाता है।


इंस्‍पेक्‍टर मातादीन का किस्‍सा तो आपने सुना होगा। अगर नहीं तो हम सुनाए देते हैं। मातादीन को टास्‍क मिला कि उन चूहो को पकड़ कर लाया जाए जिसने सरकारी गोदाम के माल को चट कर दिया। तीन दिन का समय और मुश्किल टास्‍क लेकिन मातादीन ने मुमकिन कर दिखाया। कप्‍तान साहब के सामने मातादीन एक हाथी को लाकर खड़े हो गए और बोले कि हुजूर यही वह चूहा है। कप्‍तान साहब झल्‍लाए तो इंस्‍पेक्‍टर बोले कि हुजूर ये इकबाल-ए-जुर्म कर रहा है। इंस्‍पेक्‍टर ने हाथ के डंडे को हवा में लहराते हुए हाथी से पूछा कि बताओ सरकारी गोदाम के माल को चट करने वाले चूहे हो या नहीं? हाथी जोर-जोर से सूंड और सिर हिलाने लगा। ऐसा ही कुछ हुआ है उत्‍तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जहां पुलिस की कहानी में मार डाला गया बच्‍चा वापस आ गया और उसके अपहृता और कथित हत्‍यार छह महीने से जेल की हवा खा रहे हैं।

पुलिस की ऐसी कारगुजारियां अक्‍सर देखने-सुनने को मिलती हैं और निरपराध लोग सींखचों के पीछे चले जाते हैं। मुजफ्फरनगर के सुनील, सोनू और रवि पिछले छह महीने से मुजफ्फरनगर की जिला जेल में बंद हैं। मुजफ्फरनगर के भोपा थाना इलाके के रहने वाले इन तीनों लोगों पर छठी क्‍लास में पढ़ने वाले राजन के अपहरण और हत्‍या का इल्‍जाम है। पुलिस ने करीब छह महीने पहले राजन का बस्‍ता और हत्‍या में प्रयोग किया गया चाकू भी गंग नहर के किनारे से बरामद कर लिया और धारा एक सौ इकसठ के तहत अपराधियों के बयान भी दर्ज कर लिए जिसमें तीनों अभियुक्‍तों ने इकबाल-ए-जुर्म कुछ इस तरह से किया-''सोनू और रवि ने अपहृत राजन के हाथ पकड़े और सुनील ने उसकी पेट में चाकू घोंपकर नहर में फेंक दिया।'' इसी इकबाल-ए-जुर्म के बाद कथित अपराधियों की कथित निशानदेही पर आला कत्‍ल यानी हत्‍या में प्रयुक्‍त चाकू भी बरामद कर लिया लेकिन अब राजन वापस आ गया है। यानी जिस बच्‍चे को अपहरण के बाद मार डाला गया और तीन युवक पिछले छह महीने से जेल की हवा खा रहे हैं, जबकि वह बच्‍चा अभी जिंदा है।

आप समझ ही सकते हैं कि राजन के वापस आ जाने के बाद क्‍या हो रहा होगा। राजन के वापस आते ही मुजफ्फरनगर पुलिस सकते में आ गई है तो दूसरी तरफ जेल में बंद राजन की कथित हत्‍या के हत्‍यारोपियों के घरवाले पुलिस की हाय-हाय कर प्रदर्शन कर रहें हैं। उनका आरोप है कि पुलिस ने रंजिश के चलते राजन के पिता से रिश्‍वत खाकर अपहरण और हत्‍या का ड्रामा करवाया और सुनील, सोनू और रवि को कई दिन तक अवैद्य हिरासत में रखकर जमकर मारा-पीटा और फिर कथित इकबाल-ए-जुर्म के आधार पर जेल भेज दिया। पिछले छह महीने से जेल में बंद तीनों युवकों के घर वाले अब इंसाफ मांग रहे हैं लेकिन साथ में वे शंका भी जता रहें हैं कि उन्‍हें न पहले इंसाफ मिला था और न अब उम्‍मीद है।

राजन के जिंदा लौटने पर पुलिसिया कहानी और षडयंत्र का आधा सच तो सामने आ चुका है लेकिन बाकी के सच पर पर्दा डाले रखने और महकमें की तार-तार हो रही लाज को बचाने के लिए पुलिस ने एक बार फिर से लीपापोती शुरू कर दी है। थानेदार साहब कह रहे हैं कि मामला उनसे पहले थानेदार साहब के कार्यकाल का है। और साथ ही साथ अपहृत राजन और उसके पिता को थाने में बुलाकर बिठा लिया है और वे दोनों अपहरण की कहानी को सच बता रहे हैं।

अब एक तरफ राजन और उसके परिजन अपने अपहरण की मॉलीवुड कथा सरीखी अपहरण की कहानी सुना रहे हैं वहीं अभियुक्‍तों के परिजनों का कहना है कि राजन पहले भी कई बार घर से भाग चुका है और गायब हो जाना उसकी फितरत है। सचाई क्‍या है? आधा सच तो सामने है। पुलिस के कागजों में मर चुका राजन वापस आ गया है। कब सामने आएगा बाकी बचा सच।

Sunday, October 12, 2008

अगले जनम मोहे मास्टर ना कीजो


कई बरस पहले जनसत्ता अखबार की रविवारीय पत्रिका में आलोक तोमर का एक लेख पढ़ा था कि जो कुछ नहीं होते वो शिक्षक होते हैं। शिक्षक माता-पिता की संतान आलोक तोमर का ये लेख उस समय अच्छा नहीं लगा था। लेकिन अब अपने ही बीच के एक शिक्षक की कहानी सुनी तो समझ में आया कि आलोक तोमर ने सच लिखा था। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर ज़िले उस शिक्षक की कहानी सुनकर लगा कि ऐसे हालात में जो शिक्षक धर्म और कर्म निभाये वो गांधी ही हो सकता है। और चूंकि दूसरा गांधी अब तक कोई हुआ नहीं है इसलिये ये ही कहा जायेगा कि जो शिक्षक हैं उनके पास और कोई रास्ता ही नहीं है या वो और कुछ बन नहीं सकते। यानी आलोक तोमर की बात सोलह आने सही कि जो कुछ नहीं होते वो शिक्षक होते हैं।






मास्साब की चिट्ठी


राधा को देखने वाले आ रहे हैं, 15 अक्टूबर की सुबह। लड़का दीपावली की छुट्टियों में घर आ रहा है, इसलिये महीने भर से पहले से कार्यक्रम तय है। लेकिन मैं शायद उनसे ना मिल सकूं। आज ही बेसिक शिक्षा अधिकारी के दफ्तर से संदेश आया है कि 15 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के सभी प्राइमरी और जूनियर हाई स्कूलों में ‘विश्व हाथ धोना दिवस’मनाया जाएगा। इस मौके पर स्कूलों में शिक्षकगण बच्चों को अलग-अलग समूहों में बांटकर विद्यालय की साफ-सफाई कराएंगे। अपनी और आसपास की स्वच्छता-सफाई का संदेश देने के रैलियां निकालीं जाएंगी। और बच्चे टॉयलेट जाने के बाद और कुछ भी खाने से पहले हाथ धोने की शपथ लेंगे। यानी शाम के पांच-छह बजेंगे सामान समेटते-समेटते। हेड मास्टर साहब को भी पता है कि उस दिन मुझे कितना ज़रुरी काम है लेकिन क्या करें उनकी भी मजबूरी है और मेरी भी। राधा की मां ज़िम्मा संभालेगी घर पर। कोई बात नहीं, लेकिन मैं अपनी बेटी राधा की शादी में हाज़िर होने की पूरी कोशिश करूंगा।
वैसे सच बताऊं मेरे जैसे शिक्षकों की बिरादरी इस तरह के आपातकाल की आदी हो गई है या होती जा रही है। आजकल हमारे जिम्मे परिवार नियोजन के लिये लोगों को प्रेरित करने से लेकर पोलिया की दवा पिलवाने तक का काम ही नहीं होता बल्कि लखनऊ में जिस पार्टी की सरकार है उसके छुटभैये नेताओं की सभा के लिये बच्चे-बड़े भी हमको ही जुटाने पड़ते हैं। मेरे पिता जी भी मास्टर थे, लेकिन तब हालात कुछ और थे। इलाके के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति माने जाने वाले मास्टर साहब या गुरुजी हालात की वजह से अब ‘वो मास्टर’ में बदल चुके हैं। अब ना इज्जत है, ना पैसा और ना ही चैन। गांव के पंचों से लेकर कलेक्टर तक निगरानी के लिये इतने लोग तैनात कर दिये गये हैं कि मेरे जैसे मास्साब, पिता के अंतिम संस्कार या बेटी की शादी की तैयारियों के लिये भी छुट्टी लेने से पहले पचास बार सोचते हैं।
और इतनी मेहनत और बेगार के बाद जब वेतन की बारी आती है तो 5-6 महीने तक इंतज़ार और वो भी इतनी जलालत के बाद, मानो भीख मिल रही हो। देश की जिस राजधानी दिल्ली में शिक्षा और शिक्षकों के लिये बड़ी-बड़ी योजनाये बनती हैं, उससे महज़ 60-70 किलोमीटर दूर बसे बुलंदशहर के बेसिक शिक्षकों का हाल आप सुन लेंगे तो कलेजा मुंह को आ जायेगा। बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में बैठने वाले लेखाधिकारी महोदय का एक अदना सा बाबू हम भविष्यनिर्माताओं को खून के आंसू रुला देता है। पूरे बुलंदशहर में गिने-चुने स्कूल होंगे जिनके शिक्षकों को वेतन समय पर मिल पा रहा होगा। दरअसल वेतन मिलने की प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी है कि इससे लेखाधिकारी कार्यालय के बाबू के अलावा सब परेशान होते हैं। हर महीने की 20-22 तारीख को स्कूल का बाबू वेतन का बिल बनाकर लेखाधिकारी कार्यालय ले जाता है। लेखाधिकारी कार्यालय के बाबू के मूड के ऊपर है कि वो बिल स्वीकार करता है या नहीं। पहली बार में तो वो नहीं ही करता है, ये कहकर कि अभी बजट नहीं आया है। मानमनौव्वल के बाद बिल स्वीकार होता है और कम से 10-15 दिन से लेकर महीने तक पड़ा रहता है ट्रेज़री में जाने के लिये। जब जाता है तो ट्रेज़री से चैक आने में दो-चार रोज़ लग जाते हैं। ट्रेज़री से आया चेक लेखाधिकारी के बाबू के पास फिर पड़ा रहता है, कई बार तो दो-दो महीने तक। ये हाल तब है जब बाबू से चेक लेने के एवज़ में हर बार 100 रुपये खर्च होते हैं। 10 लोगों के वेतन पर 100 रुपये खर्च का नियम है। बीच में शिक्षकों ने बुलंदशहर में कर्मचारी नेताओं से मिलकर शिकायत की तो छह महीने तक सब ठीक रहा। फिर सातवें महीने अचानक शेर हो गये बाबू ने पिछले छह महीने की भी कसर निकाल ली तब कहीं जाकर चेक दिया। चेक हाथ में देने से पहले 100 रुपये के खर्च का सिलसिला फिर प्रारंभ हो गया है। किससे कहें?
दीपावली की तैयारियां आपके घर मे चल रही होंगी। मेरे घर में भी हर साल शुरू होती हैं लेकिन बीच में ही दम तोड़ देती हैं। पिछले कई साल का नियम है कि जिस महीने दीपावली होती है उस महीने बोनस तो दूर उस माह का वेतन भी नहीं मिल पाता है। इस महीने का वेतन अब तक नहीं मिल सका है, बिल बाबू की टेबल पर ही पड़ा हुआ है। और बोनस, वो तो पिछले साल का भी नहीं मिला है। बाबू जी कहते हैं बजट नहीं हैं। दबंगों के स्कूलों को पिछले साल ही मिल गया था। महंगाई भत्ता बढ़ने का हज़ारों रुपये का एरियर भी नहीं मिल पा रहा है। देर सबेर मिल जायेगा लेकिन उसका जो हिस्सा पीएफ में जायेगा उसके ब्याज का नुकसान तो ही ही रहा है हम लोगों को।
पीएफ पर याद आया, राधा की शादी के लिये 40 हज़ार रुपये निकालने के लिये अर्जी दी हुई है। एक हज़ार रुपये अब तक चाय-पानी के नाम पर बांट चुका हूं।लेकिन अर्जी वहीं की वहीं है, आगे बढ़ ही नहीं रही है। शुक्ला जी, सिंह साहब, मिश्रा जी सबके उदाहरण मेरे सामने हैं कि उनको पीएफ से निकाली गई रकम बच्चों की शादी पर नहीं नाना या दादा बनने पर ही मिल सकी। मुझे भी बहुत ज़्यादा उम्मीद लगती नहीं है।
लेकिन एक उम्मीद आपसे नज़र आ रही है। आपने हमको अपने बच्चों का भविष्य बनाने का जिम्मा दे रखा है। हम पूरी कोशिश करते हैं लेकिन बदले में कभी गुरु दक्षिणा नहीं मांगते हैं, मांगते भी हैं छोटी-मोटी, द्रोण जैसी नहीं। क्या आप पालकों की पूरी बिरादरी दिवाली के मौके पर शिक्षकों की बिरादरी को एक गुरु दक्षिणा दे सकती है। हमारे पढ़ाये कई बच्चे आईएएस, आईपीएस और बड़े अफसर हैं, कृपया हमको बाबुओं से मुक्ति दिलवाकर बस वेतन समय पर दिलवा दीजिये। हम आपके बच्चों का भविष्य बनाते हैं आप हमारे बच्चों का ध्यान रखिये।
मास्टर रामदयाल, पहासू वाले

Saturday, October 11, 2008

जुग –जुग जियो समाजवाद !

रामेश्‍वर काम्‍बोज 'हिमांशु' ने हमें बत्‍तीस साल पहले लिखी गई एक कविता भेजी है। लघुकथा लेखन में सक्रिय रामेश्‍वर की ये कविता आज और अधिक प्रासंगिक है। उन्‍होंने ये कविता तब लिखी थी जब वह उत्‍तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के एक हाई स्‍कूल में शिक्षक थे। देश की तत्‍कालीन परिस्थितियां डरा रहीं थीं लेकिन तब से अब तक लंबी यात्रा तय कर चुके रामेश्‍वर काम्‍बोज 'हिमांशु' मानत हैं-- "आज से 32 साल पहले बेईमान आदमी सबकी आँखों में खटकता था; आज ईमानदार आदमी सबकी आँखों का काँटा बन जाता है ।"
 
 
भ्रष्टाचार, ब्लैक मार्केट ,गुण्डागर्दी जिन्दाबद !
जुग–जुग जियो समाजवाद !
कालूराम जी ने एक दिन ,बहुत मुझे ये समझाया ।
काले धन और काले तन की बहुत पूछ ये बतलाया।।
काले थे कृष्ण जी देखो दुनिया में पूजे जाते ।
काला धन कमाने वाले ईश्वर से न घबराते ॥
भेंट और पूजा लिए बिना,
अफ़सर भी सुनता नहीं फ़रियाद।
जुग–जुग जियो समाजवाद !
पुलिस डकैती में शामिल है ,नेता जी ऐसा हथियार।
सत्य और न्याय की हत्या करने में हरदम तैयार ॥
खाने –पीने की चीज़ों में भी मिलावट का है राज ।
धन कमाना सेवा करना एक पंथ और दो-दो- काज ।।
घूम रहे सड़कों पर नंगे
रिश्वत रानी और अपराध
जुग–जुग जियो समाजवाद !
बिना सहारा लिये चमचों का हो नहीं पाता कोई काम।
स्वर्गलोक की बात दूर है,सिफ़ारिश से मिलता नरकधाम ॥
दफ़्तर में जाकरके देखो-बड़े बाबू जी ऊँघ रहे ।
उनके गुर्ग़े हर असामी की जेबों को सूँघ रहे ॥
जो हो रहा सो ठीक हो रहा,
क्योंकि अब भारत आज़ाद ।
जुग–जुग जियो समाजवाद !
(रचनाकाल :29 जून 1974)

Wednesday, October 8, 2008

हम टायर होंगे, रिटायर नहीं



दामोदर दत्‍त दीक्षित की आदत है कि वह इर्द-गिर्द ताकाझांकी बहुत करते हैं। दरअसल नाक-कान-आंख को हमेशा एक्टिव रखने वाले कथाकार-व्‍यंग्‍यकार दामोदर उत्‍तर प्रदेश में आला अफसरी भी करते हैं। हांलाकि उनका विभाग मिठास भरा है लेकिन उनकी व्‍यंग्‍य रचनाएं तीखी होती हैं। उप चीनी आयुक्‍त के पद पर काम करते हुए भी उनका नियमित लेखन हमेशा गतिमान रहता है। इर्द-गिर्द के लिए उन्‍होंने ये व्‍यंग्‍य भेजा है। पढिए, आनंद लीजिए और जी भर कर टिपियाइए। बेहिचक।


हिंदुस्‍तानी आदमी बहुरंगी-बहुस्‍तरीय विशेषताओं वाला प्राणी है। उसकी एक विशेषता यह है कि वह टायर हो जाता है, रिटायर नहीं होना चाहता। वह अजर-अमर कामी होता है और स्‍वयं को विकल्‍पहीन मानते हुए उसी दिन रिटायर होना चाहता है जिस दिन महिषवाहन यमराज टांग पकड़ कर कुर्सी से खींचे और भैंसे की पूंछ से बांधकर फिल्‍मी अंदाज में घसीटते हुए नरक की ओर प्रस्‍थान करें या क्‍या जाने उस दिन भी नहीं? शायद सोचता हो कि उसकी भटकती हुई प्रेतात्‍मा भी छूटे हुए महान दायित्‍व को संभालने में सक्षम है।
वैसे तो देशवासी बात-बात में मूंछ मरोड़ते रहते है, पर रिटायर होने के मामले में भयंकर कायर होते हैं। इकदम बोदे, इकदम कांचू। वे वन से भले ही न डरें पर वानप्रस्‍थ से डरते हैं। जैसे कुत्‍ते के काटने से पागल हुआ व्‍यक्ति पानी से डरता है, जैसे पु‍लिस के लोग 'लाइन हाजिर' होने से डरते हैं, जैसे राजनेता चुनावी हार से, जैसे उपदेशक मौनव्रत से और अध्‍यापक कक्षा से डरता है, वैसे ही हिंदुस्‍तानी पदधारक रिटायर होने से डरता है। उसके दो-चार झापड़ रसीद कर दो, चार-पांच लाते जड़ दो, मुर्गा बना दो, बस रिटायर न करो। रिटायरमेंट का नाम सुनते ही उल्‍टी-दस्‍त होने लगती हैं। सिरदर्द, पेटदर्द मुंहदर्द, दांतदर्द, आंखदर्द, कानदर्द, नाकदर्द सब सताने लगता है। कुछ लोग राजयोग छूटने का नाम सुनते ही राजरोग के शिकार हो जाते हैं। किसी को मधुमेह, किसी को हृदयरोग, किसी का गुर्दा क्षतिग्रस्‍त तो किसी का यकृत। एक से एक महंगे, मजबूत और टिकाउ राजरोग। किसी को जूड़ीताप हो जाता है तो किसी को दमा, किसी को कब्‍ज तो किसी को गठिया। किसी को बबासीर हो जाती है, किसी को गुप्‍तरोग तो किसी को नामर्दी। कुल मिलाकर वे चिकित्‍सा विज्ञान के अदभुत मॉडल बन जाते हैं। ये तो कहिए अंगविशेष होते नहीं अन्‍यथा रिटायरमेंटद्रोही जन रजोनिवृत्ति और स्‍तनकैंसर की भी शिकायत करने लगें।
रिटायरमेंटोलॉजी (सेवानिवृत्ति-विज्ञान) का एक और फंडा भी है। अशुद्ध-अबुद्ध जीवात्‍मा स्‍वयं तो रिटायर होना नहीं चाहती, पर दूसरों को समय से या हो सके समयपूर्व रिटायर होते देखना चाहती है। सार्वजनिक स्‍थानों की बतकहियों, दफ्तरों की कनफुसकियों और ड्राइंगरूमीय चर्चाओं में अक्‍सर लोग अमुल्‍य सुझाव देते मिल जाते हैं। 'राजनेताओं के भी रिटायरमेंट की आयुसीमा होनी चाहिए।' मेरा अनुभव है कि ऐसे लोग वे होते हैं जो कभी रिटायर नहीं होना चा‍हते हैं। वे परसंताप-ग्रंथि से पीडि़त होते हैं। 'ये नामाकूल नेता कभी रिटायर नहीं होते, मरते दम तक जनता की छाती पर मूंग दलते रहते रहते हैं जबकि ये सुअवसर हम नामाकूलों को दिया जाना चाहिए।'
अफसरशाही देश का सबसे निर्लज्‍ज वर्ग है। ऐसा मैं दावे के साथ कह सकता हूं क्‍योंकि मैं उसका अविभाज्‍य अंग हूं। चतुर-चंट अफसर रिटायरमेंट से पहले ही कटोरा लेकर खड़ा हो जाता है-हुजूर, कुछ काम-धंधे का जुगाड़ किया जाए।' यानी कि रिटायरमेंट की वय तक आधिकारिक तौर पर जोंक बनकर खून चूसते रहे, पर पेट नहीं भरा। तन शिथिल, मन उससे भी शिथिल, पर रिटायरमेंट के लिए तैयार नहीं। ऐसे लोगों के लिए भर्तृहरि बहुत पहले कह गए हैं-
अंग गलितं पलितं मुण्‍डं, दशनविहीनं जातं तुण्‍डम्।
वृद्धो याति गृहीत्‍वा दण्‍डं तदपि न मंचत्‍याशा पिण्‍डम्।।

हमारे अफसर भी आशा का पिण्‍ड नहीं छोड़ते। 'माइटी-हाइटी-फाइटी' अफसरों के लिए विभिन्‍न आयोग, निगम, संस्‍थाएं आदि चारागाह के रूप में उपलब्‍ध है। हाल ये है कि घोड़ा न हो तो गधे की ही सवारी दे दो, सिर पर चौराहा बना दो, तब भी चलेगा। अफसर में जरा भी गैरत बची हो, तो उसे सेवाविस्‍तार, पुनर्नियुक्ति या दैनिक वेतनभोगी के रूप में मिलने वाले प्रस्‍ताव से इंकार कर देना चाहिए। पर अफसरों के पास सब कुछ होता है, बस गैरत नहीं होती। आप चारों तरफ नजर दोड़ाइए, एक से एक सेवानिवृत्‍त अफसर निर्लज्‍जता के साथ, राजा ययाति की मुद्रा में कुर्सी से चिपके बैठे हैं, तन-मन से मजबूत योग्‍य जनों का अधिकार हड़पते हुए। सच ही, बेशर्ममेव जयते।
खेल का भी खेल कुछ कम नहीं। दुनिया जानती है कि आउटडोर खेलों या शारीरिक शक्ति वाले खेलों की प्रतिस्‍पर्धापरक आयु लगभग पंद्रह से बत्‍तीस बर्ष तक होती है। अद्वितीय क्षमतावान खिलाड़ी हो तो एक-दो साल और खींच ले जाएगा। बस़......। पर हमारे हिंदुस्‍तानी खिलाड़ी इस तथ्‍य से अ‍परिचित हैं, अपरिचित ही रहना चाहते हैं। अन्‍य देशों में क्षमता के ह्रास होते ही खिलाड़ी सम्‍मानजनक ढंग से स्‍वयं रिटायर होने की घोषणा कर देता है। पर अपने देश में जब तक खिलाड़ी की पीठ से चार इंच नीचे, चार लातें मारकर 'जा फूट, बहुत हुआ' कहने का पवित्र मंत्रोच्‍चारण नहीं होता, तब तक वह रिटायर नहीं होता। यानी खिलाड़ी रिटायरमेंट से पूर्व चार लातें खाना अपना अनिवार्य धर्म समझते हैं।
एक समस्‍या और भी। यहां अगर खिलाड़ी रिटायर होना चाहे, तो उसके फेन रिटायर नहीं होने देते। अगर 'टेनिस एल्‍बो' के कारण किसी क्रिकेटर का हाथ उठने से इंकार करता है और वह बार-बार बोल्‍ड होने की उदारता दिखाता है तो उसके समर्थक कहते हैं, ‘कोई बात नहीं। ससुरे लंदन के डाक्‍टर कब काम आएंगे। वे हमारे खिलाड़ी की महान ‘टेनिस एल्‍बो’ को महान ‘क्रिकेट एल्‍बो’ बना देंगे।‘ पर ऐसा हो नहीं पाता। हमारे महान खिलाड़ी और उससे भी ज्‍यादा महान उनके समर्थकों को यह नहीं पता कि उम्र का तकाज़ा होता है और एक निश्चित उम्र के बाद एक नहीं, एक सौ एक ऑपरेशन करा डालो, पर पहले जैसी बात नहीं आ सकती। ऐसे में खिलाड़ी देश के प्रति ही नहीं, अपने प्रति भी अन्‍याय करता है। कमर में पीरें उठने लगती हैं, गठिया ने घुटने का जकड़ लिया है। ऐसी स्थिति में गेंद आपकी हाकी स्टिक का नमस्‍ते स्‍वीकार करने से रहा। स्‍पान्‍डलाइटिस हो जाने पर, टेबलेट खाकर ‘हेडर’ मारेंगे, तो फुटबाल कितनी दूर जाएगा, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। फास्‍ट बालर के कंधे में अंदरूनी चोट है, तो उसकी बालिंग की गति कितनी होगी और बाल किस दिशा में जाएगा, समझा जा सकता है। पर हमारे तथाकथित खिलाड़ीप्रेमी सुनने-समझने को तैयार नहीं होते। अंधभक्ति और व्‍यक्तिपूजा हावी रहती है और वे घायल-चोटिल-अस्‍वस्‍थ-कमजोर हो चुके खिलाडियों की पैरवी करते रहते हैं। गालिब याद आते हैं-
गो हाथ में जुबिंश नही, आंखों में तो दम है,
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।

कुल मिलाकर हम अ-रिटायरमेंट माहौल में घिसट रहें हैं। लोग इतने कायर हो चुके हैं कि घिसे टायर बनने को तैयार हैं, पर रिटायर होने को नहीं। पर घिसा हुआ टायर तो घिसा हुआ होता है। एक दिन अचानक फटेगा, तो बस में सवार यात्रियों को भी दुर्घटनाग्रस्‍त कर देगा, ‘हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे।‘ इसलिए प्‍यारे देशवासियो, आदरणीय रिटायरणीयों को अशांति से रिटायर होने दो, उन्‍हें टायर होने से बचाओ। इसी में देश का भला है और जिसमें देश का भला है, उसमें सबका भला है।
दारा रहा न रहा सिकंदर-सा बादशाह,
तख्‍त-ए-ज़मीं पे सैंकड़ों आए, चले गए।

Sunday, October 5, 2008

कहां तक जाएंगे हम

ये कविता मैने करीब बीस साल पहले तब लिखी थी जब मेरठ दंगों की आग में झुलस रहा था। तब से अब तक मैने कई मेरठ झुलसते देखे हैं। गोलियां और मारक हुई हैं और बमों के फटने का सिलसिला थम नहीं रहा है। इस कविता में मैने जो सवाल बीस साल पहले उठाए थे वह आज और भयावह हो गए हैं। उम्‍मीद है आप इस कविता को गुनेंगे और मेरे दुख में शरीक होंगे।


कर्फ्यू, गोलियां बम
कहां तक जाएंगे हम
आंचल में खून मां के
अश्‍कों से आंख है नम
कहां तक पाएंगे गम
कहां तक जाएंगे हम

कर्फ्यू गोलियां बम
कहां तक जाएंगे हम

ये किताबें, ये धर्मस्‍थल
सब हो रहें हैं मक़त़ल
लिखें आदमी की किस्‍मत
कानून और राइफल
सबकी निगाह में दौलत
और बारूद पे कदम

कर्फ्यू गोलियां बम
कहां तक जाएंगे हम

खेतों और खलिहानों में
सुरक्षा नहीं मकानों में
देश कहां है, पता नहीं
सब कुछ बंद बयानों में
रोजी रोटी सुख और गम
राजा रानी आप और हम

कर्फ्यू गोलियां बम
कहां तक जाएंगे हम

Thursday, October 2, 2008

बटला हाउस के बहाने उठे कुछ सवाल

दिल्‍ली में हुए धमाकों और उसके बाद बटला हाउस में हुई मुठभेड़ के बाद लगातार सवाल उठ रहे हैं। इस तरह के सवाल देश में शायद ही कभी इतने बड़े पैमाने पर उठे हों। आखिर क्‍यों उठ रहें हैं सवाल? क्‍या लोकतंत्र में सवाल उठाना भी गुनाह है? क्‍या कुछ लोग एक अलग तरह का आतंक फैलाकर अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता भी छीन लेना चाहते हैं? अगर सवाल उठ रहें हैं तो हमें जबाव भी खोजने होंगे। अगर बहस हो रहीं हैं तो ये इस बात का सुबूत है कि हम एक आजाद मुल्‍क में सांस ले रहें हैं। लोकतंत्र की जड़ें अभी दीमक से बची हुई हैं। मेरी पिछली पोस्‍ट बटला हाउस के बहाने में मैने अपने विचार रखे थे। कुछ मुद्दे उठाए थे। मुझे खुशी है कि साथियों ने रियेक्‍ट किया। तर्कों के साथ। निहायत ही सौम्‍य तरीके से। लेकिन मैने चिट्ठाजगत में देखा कि शाब्दिक हिंसा की होड़ लगी है। मैं शुक्रगुजार हूं आपका कि आपने न मुझे संघी कहा और न सिमी का एजेंट। लेकिन यदि आप कह भी देते तो क्‍या मुद्दे नेपथ्‍य में चले जाते। सवाल उठना बंद हो जाते। सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

Ratan Singh ने अफसोस जताया कि हमारे यहाँ कुछ ऐसे नेता और लोग है जो ख़बरों में बने रहने के लिए उलजलूल बयानबाजी करते रहतें है। मिहिरभोज का गुस्‍सा कुछ यूं था-‘हर मुसलमान आतंकवादी होता है ,देशद्रोही होता है ये साबित करने मैं लगे है ऐसे लोग....आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है मित्र ....पर जब जब किसी आतंकवादी का बाल भी बांका होता है तो ये मीडिया वाले ये मानवाधिकार वादी उसे आतंकवादी न कहकर मुसलमान कहने लगते हैं....मुसलमान हो या हिंदू हर देशभक्त नागरिक इस देश मैं बराबर हक और कर्तव्य का निर्वाह कर रहै हैं और करना चाहते हैं। ओमकार चौधरी के विचार थे कि आतंकवाद विश्वव्यापी समस्या बन चुका है लेकिन लगता है कि अभी दुनिया के बहुत से देश इस महादैत्य से निपटने के लिए मानसिक और रननीतिक तौर पर तैयार ही नहीं हुए हैं. भारत भी उनमे से एक है. भारतीय नेताओं, मानवाधिकारवादियों, मीडिया और आम जन को ये सीखना होगा कि इस से कैसे निपटना है. राज भाटिय़ा और सचिन मिश्रा ने अच्‍छा लेख और धन्‍यवाद देकर रस्‍मअदायगी की। लेकिन गुफरान ( gufran) की प्रतिक्रिया जरा गौर से पढिए- जोशी जी आप ने जो लिखा वो हर नज़रिए से तारीफ के काबिल है ! लेकिन क्या ऐसा इससे पहले भी कभी हुवा है इस तरह से क्या कभ और किसी ने ऊँगली उठाई है ! क्या इससे पहले मुडभेड नहीं हुई हो सकता है की उसपर ऊँगली उठी हो पर ऐसा आरोप आज तक नहीं लगा! वैसे क्या मुसलमान को टारगेट करने से पहले मीडिया या नेताओं को ये नहीं सोचना चाहिए की अभी कानपूर में जो हुवा वो क्या था किस संगठन के लोग थे और बम क्यूँ बना रहे थे आखिर इससे फायदा किसको है! मै आपके लेख के लिए आपको धन्यवाद् देता हूँ ! लेकिन मीडिया और आज की राजनीती पर भी कुछ बेबाक राय दीजिये......!आपका हिन्दुस्तानी भाई गुफरान (ghufran.j@gmail.com)मेरा मानना है कि गुफरान की सोच को हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। हो सकता है कि कुछ लोग गुफरान को मुसलमान/पाकिस्‍तानपरस्‍त या आतंकी सोच वाला व्‍यक्ति मानकर मुद्दे को भटकाने की कोशिश करें लेकिन गुफरान आज जो पूछ रहा है वह इस देश के कम से कम अठारह करोड़ नागरिकों का सवाल है। गुफरान का सीधा सवाल है कि आखिर इससे फायदा किसको है। गुफरान के मन में मीडिया और वर्तमान दौर की राजनीति को लेकर भी पीड़ा है। मैं गुफरान को नहीं जानता लेकिन गुफरान के मन में जो सोच पल रही है उससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। दरअसल कुछ ऐसी ताकते हैं जिनकी राजनीतिक रोटियां तभी सिकती हैं जब मुसलमान और हिंदू एक दूसरे को देखते ही अपनी-अपनी आसतीनें चढ़ा लें। यही ताकतें न केवल धर्म और जाति के आधार पर हमें बांट रहीं हैं बल्कि ऐसा बीज बो रहीं हैं जो जिन्‍ना से भी ज्‍यादा खतरनाक है। मैं फिर कहता हूं कि गोली का जबाव फूलों से नहीं दिया जा सकता लेकिन आप उस पुलिस को छुट्टा कैसे छोड़ सकते हैं जिसके आचार-व्‍यवहार से औसत आदमी थाने में शिकायत लेकर जाने से भी डरता है। जो दबंगों की शह पर या रिश्‍वत लेकर किसी को भी अपराधी बना देती दरअसल हमारे दो चेहरे हैं। जब हम परेशानी में होते हैं तो हमारा सोच कुछ और होता है और जब दूसरा परेशानी में होता है तो हम धर्म देखते हैं। जाति देखते हैं। सामने वाले की औकात को देखकर व्‍यवहार करते हैं। बिल्‍कुल उसी तरह जैसे हम अपने घर आने वाले मेहमान की अहमियत देखकर ही आवभगत करते हैं।आज समाज के हर वर्ग में गिरावट है। मीडिया भी उससे अछूता नहीं है लेकिन फिर भी मीडिया के खाते में अच्‍छे कामों की फेहरिस्‍त बहुत लंबी है। लेकिन एक फैशन है कि मीडिया को गाली दो। अगर मीडिया आपका माउथ आर्गन नहीं बनता तो आप उसे कोसने लगते हो। अगर वह बटला हाउस की घटना पर सवाल उठाता है तो आप उसे कोसने लगते हो। डॉ .अनुराग का मैं दिल से मुरीद हूं। बहुत सेंटी ब्‍लागर हैं। बहुत भावुक हैं और बहुत सारे चिंतकों से बेहतर सोच के साथ लिखते हैं। अभी उनकी पोस्‍ट थी एफआईआर। पुलिस थाने और गिरते मूल्‍यों का सटीक चित्रण किया था डाक्‍टर साहब ने। डाक्‍टर साहब ने अपना अमूल्‍य समय निकाल कर मेरा चिट्ठा पढ़ा और तर्कसंगत प्रतिक्रिया दी- ‘एक तरीका तो ये था की मै आपका लेख पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त किए बिना समझदारी भरी चुप्पी ओड लूँ ताकि मुझे कल को किसी विवाद में न पड़ना पड़े ...पर मन खिन्न हो जाता है कई बार .....
शुक्र है आप छदम धर्म-निरपेक्ष का रूप धारण करके कागजो में नही आये ,हमारे देश को एक स्वस्थ बहस ओर आत्म चिंतन की जरुरत है ,बाटला हाउस की मुठभेड़ ओर मुसलमानों को सताया जाना ?इन दोनों का क्या सम्बन्ध है मुझे समझ नही आता है .इस देश में राज ठाकरे अगर कुछ कहते है तो देश की ८० प्रतिशत जनता उनका विरोध करती है ,तोगडिया ओर दूसरे हिंदू कट्टरपंथी के समर्थक गिने चुने लोग है ,उनके विरोध में हजारो लोग खड़े हो उठते है ...ऐसी ही अपेक्षा मुस्लिम बुद्धिजीवियों से होती है पर वे अक्सर चुप्पी ओडे रहते है .क्या किसी घायल इंसपेक्टर को पहले अपने घाव मीडिया को दिखाने होगे इलाज में जाने से पहले ?क्या अब किसी इंसान को पकड़ने से पहले उसके घरवालो ,मोहल्लेवालो ओर पूछना पड़ेगा ?क्या आतंकवाद हमारे देश की समस्या नही है ?पर सच कहूँ मीडिया भी अपनी जिम्मेदारी नही समझ रहा है ?इस सवेदनशील मुद्दे पर जहाँ किसी भी ख़बर को दिखाने से ..उनकी पुष्टि की जरुरत है ?कही न कही उसे भी बाईट का लालच छोड़ना होगा ......कोई भी ख़बर ,कोई भी धर्म इस देश से ऊपर नही है...’डाक्‍टर साहब जहां आप जैसे प्रतिष्ठित व्‍यक्ति को ऍफ़ .आई .आर जैसी पोस्‍ट लिखनी पड़ती हो वहां पुलिस पर सवाल तो उठेंगे ही। मैं फिर कहता हूं कि जब बटला हाउस के अंदर बैठे बदमाश या आतंकी गोलियां चलाएंगे तो उसका जबाव फूलों से नहीं दिया जा सकता। लेकिन अगर मीडिया ये सवाल उठाता है कि तीन दिन से उस फ्लैट पर पुलिस की निगाहें गढ़ी हुईं थीं। उनके मोबाइल सर्विलांस पर थे तब पुलिस ये अंदाजा क्‍यों नहीं लगा पाई कि अंदर बैठे आतंकवादी कितने हथियारों से लैस होंगे। जिन लोगों पर देश के कई हिस्‍सों में ब्‍लास्‍ट करने का आरोप है वह भजन-कीर्तन तो करने से रहे। क्‍यों हमारे बहादुर इंस्पेक्‍टर ने बुलेट प्रूफ जैकेट पहनने में लापरवाही की ? ऐसे सवाल तो उठेंगे ही और इनसे मुंह मोड़ना एक दूसरे खतरे को खड़ा करेगा। डाक्‍टर साहब मेरी आपसे गुजारिश है कि अगर मेरी कोई बात गलत लगे तो कहिएगा जरूर क्‍योंकि तार्किक मंथन से ही अमृत निकलेगा। मैं फिर कहता हूं कि बहुत सारे मामलों में मीडिया की भूमिका अच्‍छी नहीं रही लेकिन बहूतायत में मीडिया ने अपनी जिम्‍मेदारी बखूबी निभाई है। बटला के बहाने रौशन जी ने भी इर्द-गिर्द पर शिरकत की है। वह कहते हैं कि ‘अगर किसी सिलसिले में पुलिस किसी को गिरफ्तार करे तो उसका विरोध करने की जगह सच्चाई खोजने की कोशिश की चाहिए जरूरी नही है की जो पकड़े गए हैं सभी दोषी हों और यह भी जरूरी नही है की सभी निर्दोष ही हों। हम नागरिक समाज के लोगो को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी के साथ अन्याय न हो न्याय सबसे बड़ा मरहम होता है और न्याय ऐसा हो जिसके निष्पक्ष होने में किसी को संदेह न होने पाये।कोई मुठभेड़ होते ही उसे सही या गलत ठहराने कि परम्परा बंद होनी चाहिए और किसी के पकड़े जाने पर उसको दोषी या निर्दोष बनाया जाना बंद किया जाना चाहिए। कानून की प्रक्रियाओं का निष्पक्ष पालन जरुरी है।……॥और अंत में मैं उस अनामी की टिप्‍पढ़ीं को जस का तस प्रस्‍तुत कर रहा हूं। इस आशय के साथ कि आप इसे एक पोस्‍ट समझकर चर्चा को आगे बढ़ाएं। वैसे मैं इन अनामी भाई के बारे में आपको इतना बताना चाहूंगा कि ये मेरे अजीज हैं। देश के सबसे बड़े चैनल में विशेष संवाददाता हैं। इनकी गिनती उन चंद मूल्‍यवान पत्रकारों में हैं जिन्‍होंने न कभी समझौता किया और न किसी दबाव में आए। कई सत्‍ताधारी माफियाओं और दबंगों की असलियत उजागर कर चुके मेरे इस भाई की प्रतिक्रिया पढ़कर आप चर्चा को आगे बढ़ाएं।Anonymous हरि भाई, मैं आपकी बातों से कई बार असहमत होता हूं। लेकिन अपनी बात रखना चाहता हूं। पहली बात कि हमें बहस करने पर कभी शर्म नहीं करनी चाहिये। यदि सवालों की हद तय होने लगेगी और बहस करने में शर्म आने लगेंगी तो हरि भाई जल्द ही आप को खुद का नाम बताने के लिये किसी की मुहर चाहिये होगी। साथ ही हरि भाई क्या आपको लगता है कि पुलिस अधिकारी माला ही पहनने वहां गया था। यदि उनका अधिकारी रेकी कर चुका था और पिछले चार दिनों से वो आतिफ के फोन और मूवमेंट को ट्रेक कर रहे थे तो फिर क्या वो माला ही पहनने उस जीने से से चौथी मंजिल चढ़ रहे थे जिससे एक वक्त में एक ही आदमी बाहर आता है। मैं एक बात से मुतमईन हूं कि आप भी बटला हाऊस के एल 18 में नहीं घुसे होंगे लेकिन आप उन आदमियों की निंदा मुक्त हस्त से कर रहे है जो वहां रिपोर्ट कर आ चुके है। क्या आपकों लगता है कि सवाल खड़े करने वाले पत्रकारों का कोई रिश्ता लश्कर ए तोईबा या फिर इंडियन मुजाहिदीन से है। जिस बहस में जिस बात की आप को सबसे ज्यादा चिंता है उसी के ऐवज में ये सवाल किये जा रहे है। क्या आपने एक भी बाईट किसी पुलिस अधिकारी की ऐसी सुनी है जो ये कह रहा हो कि मोहन चंद शर्मा ने अपनी पहचान छुपाने के लिये ही बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहनी थी। या फिर पैतींस किलों की जैकेट पहनना मुश्किल था इसीलिये उसने जैकेट नहीं पहनी। जैकेट उनका पीएसओ लिये गाड़ी में था। लेकिन जिस इंसपेक्टर ने पैतीस से ज्यादा एनकाउंटर किये हो उस अधिकारी को चार दिन की सर्विलांस के बाद भी ये अंदाज नहीं हुआ कि वहां आतंकवादी मय हथियार हो सकते है।एक बात और हरि भाई जब आप पर जिम्मेदारी बड़ी होती है तो सवाल भी आप से ही किये जाते है। मैंने आज तक एक भी न्यूज एडीटर ऐसा नहीं देखा जो ब्रेकिंग न्यूज में पिछडने पर चपरासी को गरियाता हो। सवाल तो और भी हरि भाई दुनिया में लापरवाही के लिये जो भी सजा हो हमारे लिये मैडल है। मैं जानता हूं कि मैंने कभी चलती हुयी गोलियों के बीच पीस टू कैमरा नहीं किया है। मैंने कभी किसी फायरिंग के बीच किसी की जान नहीं बचायी है लेकिन मेरे भाई मैंने अपने माईक पर कभी अपने ड्राईवर से लाईव नहीं कराया। देश में इतने गहरे होते जा रहे डिवीजन पर आप के तीखे सवाल ज्यादा उन लोगों को चुभ रहे है जो झूठ के लिये ज्यादा लड़ते है और सच का आवरण खड़ा किये रहते है। मैं एक बात जानता हूं कि इस देश में करप्ट नेता चलेगा करप्ट ब्यूरोक्रेट चलेंगे लेकिन एक बात साफ है कि करप्ट या दिशाहीन पत्रकार देश को डूबो देंगे। आप सवाल खड़े करने में हिचक रहे है लेकिन आप ही लिख रहे है कि देश में नियानवे फीसदी एनकाउंटर फर्जी होते है क्या इस बात का मतलब है मैं नहीं समझा। क्या आप अपने स्टाफ को तो छोडिये उस करीबी दोस्त के सौवें वादे पर आंख मूंद कर ऐतबार करते है जिसने निन्यानवे बार झूठ बोला हो। मैं एक कहावत लिख रहा हूं आपके ही इलाके में बोली जाती है ...मरे हुये बाबा की बड़ी-बड़ी आंख भले ही बाबा अंधा क्यों न हो। एक बात जान लीजिये हरि भाई जमीन गर्म है अगर उसका मिजाज नहीं भांप पाये तो बेटे के सामने पछताना पडेगा। आपका छोटा भाई.......डीपी मैं उन सभी साथियों का आभारी हूं जिन्‍होंने इर्द-गिर्द पर आकर विचारों को पढ़ा। चर्चा की। हमारे विचारों से सहमति या असहमति जताई लेकिन मेरी गुजारिश है कि ये कारवां, ये तार्किक मंथन जारी रहना चाहिए। शायद किसी बिंदु पर जाकर हम सभी की सहमति बने। कोई रास्‍ता निकले। इसलिए अपने दिल की बात को दबाईए नहीं। खुल कर विचार प्रकट कीजिए। एक बार फिर मैं सभी से क्षमायाचना करता हूं। शायद जाने-अनजाने मुझसे कुछ गुस्‍ताखी हो गई हो।

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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