Wednesday, August 4, 2010

बाघखोर आदमी ........

जंगल सिमटते जा रहे हैं
घटती जा रही है
विडालवंशिओं की जनसंख्या
भौतिकता की निरापद मचानों पर
आसीन लोग
कर रहे हैं स्यापा
छाती पीट-पीट कर
हाय बाघ; हाय बाघ.

हे बाघ! तुम्हारे यूं मार दिए जाने पर
दुखी तो हम भी हैं
लेकिन उन वनवासिओं का क्या
जिनका कभी भूख तो कभी कुपोषण
कभी प्राकृतिक आपदा
कभी-कभी किसी आदमखोर बाघ
उनसे बचे तो
बाघखोर आदमी के हाथ
बेमौत मारा जाना तो तय ही है.

चिकने चुपड़े चेहरे वाले
जंगल विरोधी लोग
गोलबंद हैं सजधज के
बहा रहे हैं
बाघों के लिए नौ-नौ आँसू.

बस बचा रहे मासूमियत का
कोरपोरेटीय मुखौटा
बाघ बचें या मरें वनवासी
इससे क्या?


4 comments:

अर्चना said...

बाघ को बचाने में करोड़ों-अरबों निकल गए सरकारी बाघ लेकिन न बाघ संरक्षित हो पा रहा है और न आदमी। सामाजिक सरोकारों से लवरेज कविता।

माधव said...

well said

सतीश सक्सेना said...

बहुत सुंदर ...वास्तविकता का कठोर चित्रण है यह ! लेखक को शुभकामनायें !!

राज भाटिय़ा said...

आज का सच जी

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