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Monday, June 27, 2011

हौंसलों और मजबूत इरादों ने दी पहचान





सामाजिक सरोकारों से जुड़े पत्रकार रवीश कुमार और विषमताओं में बुलंदियों पर पंहुचने वाली सात विदूषियां सम्‍मानित

उत्‍तर प्रदेशीय महिला मंच के संस्‍थापक और कलम के योद्धा रहे स्‍व0 वेद अग्रवाल की स्‍मृति में दिए जाने वाला साहित्‍य-पत्रकारिता-2011 पुरस्‍कार मेरठ के चैंबर हॉल में सामाजिक सरोकारों से जुड़े जुझारू पत्रकार रवीश कुमार को दिया गया तो उपस्थित लोगों ने करतल ध्‍वनि से उसका स्‍वागत किया। वरिष्‍ठ पत्रकार और भास्‍कर समूह के संपादक श्रवण गर्ग और अप्रतिम कथाकार चित्रा मुदगल के हाथों सम्‍मान लेते रवीश के साथ-साथ ऑडीटोरियम में बैठा जनसमूह अपने को भी गौरवान्वित महसूस कर रहा था। इस अवसर पर साहित्‍य-पत्रकारिता के साथ अपनी माटी से जुड़ी, हौंसलों और मजबूत इरादों से लबालब ऐसी स्त्रियां भी सम्‍मानित हुईं जिन्‍होंने विषम परिस्थितियों में न केवल एक मुकाम बनाया बल्कि असंभव को संभव कर दिखाया। सजगता व आत्‍मविश्‍वास के बूते जिन्‍होंने अबला से सबला तक का सफर तय किया और अपने सशक्तिकरण के लिए उन्‍होंने न उम्र को आड़े आने दिया और न सामाजिक विषमताओं या परिस्थितियों को बाधा बनने दिया। इस अवसर पर उत्‍तर प्रदेशीय महिला मंच की अध्‍यक्ष डा0 अर्चना जैन, महामंत्री ऋचा जोशी, 'आमीन' के रचयिता आलोक श्रीवास्‍तव और शिक्षाविद डा0 राधा दीक्षित मौजूद थीं।
'मंच' के 26 वर्ष पूरे होने के अवसर पर जिन सात महिलाओं को 'हिंद प्रभा' सम्‍मान से अलंकृत किया गया उनमें सत्‍तर साल की युवा शूटर प्रकाशो देवी, मंदबुद्धि बच्‍चों के विकास में लगीं प्रमिला बालासुंदरम, सौ से ज्‍यादा महिलाओं को ट्रैक्‍टर चलाना सिखा चुकीं शालिनी, उत्‍तराखंड की संस्‍कृति और कला के उन्‍नयन में जुटीं लोकगायिका बसंती बिष्‍ट, महिला होकर पुरुषों का बोझ उठाने वाली रेलवे कुली मुंदरा देवी, तीन हजार रूपये से अपना उद्यम शुरु कर बीस देशों तक अपने उत्‍पाद पंहुचाने वाली प्रेरणा और शोषण के खिलाफ संघर्ष करने वाली प्रशासनिक अधिकारी डा0 अमृता सिंह हैं। देश के अलग-अलग हिस्‍सों से आईं इन सात देवियों का जब परिचय पढ़ा गया तो उनकी पृष्‍ठभूमि, संघर्ष, जिजीविषा और उपलब्धियों को सुनकर ऑडीटोरियम में बैठे लोगों ने खड़े होकर करतल ध्‍वनि से उनका अभिवादन किया।
इस मौके पर बोलते हुए भास्‍कर समूह के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि गर्व होता है जब रवीश जैसे सामाजिक सरोकारों से जुड़े किसी बेवाक पत्रकार को देखते हैं। उससे भी ज्‍यादा गर्व तब होता है जब प्रकाशो, बालासुंदरम, शालिनी, मुंद्रा या प्रेरणा जैसी महिलाओं का सम्‍मान होता है क्‍योंकि अखबारों और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में चारों ओर से उनके जलाने, लूटने या इज्‍जत से खिलबाड़ की खबरें आ रही हैं और इन सब के बीच ऐसी महिलाएं एक ताकत बनकर उभरती हैं और हमें बताती है कि अभी सब कुछ खत्‍म नहीं हुआ है और होने भी नहीं दिया जाएगा। उन्‍होंने कहा कि अखबारों में ये खबर तो छपती है कि 'एक किसान मर गया लेकिन ये खबर नहीं छपती वह किसान अपने पीछे एक औरत को भी मरने के लिए छोड़ गया क्‍योंकि औरत तो हर जगह मरती है, चाहे वह युद्ध का मैदान हो या सांप्रदायिक दंगे या फिर बिगड़ते पर्यावरण के चलते सूखते कुंए या झरने। यदि एक कुंआ सूखता है तो गांव में एक महिला के लिए पीने के पानी की दूरी और बढ़ जाती है। पानी के झरने लगातार सूख रहे हैं लेकिन महिलाओं के आंसू लगातार बढ़ते जा रहे हैं और उनकी पीठ लगातार कमजोर हो रही है या टूट रही है। उन्‍होंने कहा कि कन्‍या भ्रूण हत्‍या को लेकर जो आंकड़े प्रकाशित हुए हैं, उनसे सिर शर्म से झुक जाता है। दुनिया भर की संस्‍था हमें बता रही हैं कि हिंदुस्‍तान में महिलाओं की संख्‍या भले ही पुरुषों के आसपास हो लेकिन उच्‍च पदों पर उन्‍नति प्राप्‍त करने वाली महिलाओं का प्रतिशत दस से बारह के आसपास ही है। उन्‍होंने कहा कि ये सारी परिस्थितियां बताती हैं कि हम जिस तरक्‍की या आर्थिक विकास दर की बात करते हैं वह उन महिलाओं तक नहीं पंहुचा है जो बीस रूपये में अपना घर चला रही है, अपने बच्‍चों को पढ़ा रही है और अंधेरे में अपनी आंखे फोड़ रही है। वरिष्‍ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने कहा कि अल्‍प संसाधनों में अपने बूते काम कर रही उत्‍तर प्रदेशीय महिला मंच समाज के शोषितों, दलितों और पीडि़तों के लिए जिस तरह से काम कर रही है और जमीन से जुड़ी महिलाओं की हौंसलाअफजाई कर रही है वह एक उम्‍मीद पैदा करता है।
लब्‍धप्रतिष्‍ठ कथाशिल्‍पी चित्रा मुदगल ने अपने संबोधन में कहा कि ये महिलाओं की मेहनत का ही नतीजा है कि वह आज अपनी पहचान अपने ही बलबूते पर बनाने में सफल हो रही हैं। उन्‍होंने 'मंच' द्वारा प्रदत्‍त 'हिंद प्रभा' सम्‍मान से अलंकृत महिलाओं के कार्यों और सफलताओं से अभिभूत होते हुए कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि उनकी यात्रा में मुश्किलें या रुकावटें न आईं हों लेकिन उन्‍होंने हिम्‍मत नहीं हारी। वह मुश्किलों से जूझी होंगी, टूटी होंगी, हालात पर झल्‍लाई होंगी लेकिन उन्‍होंने हिम्‍मत नहीं हारी और न ही हालात के साथ समझौता किया। इसलिए उन्‍हें सफलता का स्‍वाद चखने को मिला। उन्‍होंने सत्‍तर की उम्र पार कर चुकी प्रकाशो देवी के हौंसले और मेहनत का जिक्र किया जिसने साठ साल की उम्र में चूल्‍हे पर रोटियां सेकने और गोबर पाथने के साथ-साथ हाथों में बंदूक थाम कर निशानेबाजी सीखी और एक ही साल में स्‍टेट के नौ मेडल जीतकर सबको एक बार फिर बताया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। आज प्रकाशो की बदौलत न केवल उसके घर की बहु-बेटियां बल्कि बागपत का जौहड़ी गांव अचूक निशानेवाजी के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। कथा शिल्‍पी चित्रा मुदगल ने कहा कि आगरा कैंट रेलवे स्‍टेशन की पहली महिला कुली मुंद्रा हो या महिलाओं को ट्रैक्‍टर की स्‍टेयरिंग थमाने वाली शालिनी; इन सभी के भीतर कई कालजयी रचनाएं छिपी हैं और यही हमारे असल आयकॉन होने चाहिएं लेकिन दुर्भाग्‍य से अभी ऐसा नहीं है, पर मन में विश्‍वास है कि एक दिन ऐसा होगा।
सम्‍मान ग्रहण करने के बाद रवीश कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि आप सबको ये समझ लेना चाहिए कि 'न्‍यूज' आपके लिए नहीं हैं क्‍योंकि आप दो पैसे भी नहीं देते। टेलीविजन का सारा खेल टीआरपी का है और विज्ञापनदाताओं के लिए है। हम इस तरह से उनके प्रति सम्‍मुख, उन्‍मुख और जिम्‍मेदार बना दिए गए हैं क्‍योंकि चार टीआरपी मीटर वाले बक्‍से जो तय करेंगे वही हम होंगे। इसलिए आप जो हमसे अपेक्षा रखते हैं, कुछ दिन बाद हम वह नहीं रह जाएंगे और कुछ दिन बाद अगर यही हालत रही तो आप लोगों को पत्रकारों को बुलाकर सम्‍मानित करने की जहमत नहीं उठानी पड़ेगी बल्कि चौराहों पर घेरकर पीटने की या फिर गाली देने की नौबत आ जाएगी। उन्‍होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि इसके लिए पत्रकारों को ही संघर्ष करना होगा बल्कि इस संस्‍था या इस पेशे को बचाने के लिए जब आप संघर्ष करेंगे तभी ये बच सकेगी क्‍योंकि वोट की जगह इस समस्‍या के निदान का रिमोट भी आपके ही हाथ में है। उन्‍होंने लोगों से कहा कि वह बहुत दिन तक दर्शक की भूमिका में नहीं रह सकते क्‍योंकि सारा काम या कुकर्म उन्‍हीं के नाम पर यानी दर्शकों की पसंद और नापसंद के नाम पर ये सब किया जा रहा है। अगर दर्शकों ने सक्रियता नहीं दिखाई तो कुछ कॉरपोरेट हाउस इस देश को ऐसा बना देंगे जैसा वह दिखता नहीं है और जैसा वह दिखना नहीं चाहिए।
मीडिया में महिलाओं की उपस्थिति सिर्फ इतनी भर है कि साथ काम करने वाली कोई स्त्री जैसी लगती है। लड़की जैसी लगती है। उसके मुद्दे, उसके अहसास, उसके अधिकार, ये सब नज़र नहीं आते। न्यूज़ चैनलों में आप लड़कियों की संख्या से खुश होना चाहते हैं या उनके दखल से। प्लास्टिक की गुड़ियाओं की मांग आने वाले दिनों में टीवी में बढ़ेगी। बल्कि अभी भी प्लास्टिक नुमा लड़कियां ही ख़बरें पढ़ रही हैं। फर्क इतना आएगा कि जो पूरी तरह प्लास्टिक और झुर्रियों से मुक्त होगी वही एंकर होगी। मीडिया में स्त्रियों की मौजूदगी स्क्रीन पर है। स्क्रीन के बाहर कुछ अपवादों, कुछ प्रसंगों को छोड़ दें तो कुछ नहीं है। हिन्दी में तो बिल्कुल नहीं है। इंग्लिश में कुछ महिला पत्रकारों ने वाकई कई धारणाओं,सीमाओं और कई चीजों को तोड़ते हुए जगह बनाई। लेकिन ये जगह बनाने वाली सभी महिलाएं एक खास वर्ग विशेष तबके से आती हैं। किसी बड़े अफसर की बेटी हों, या किसी बड़े संपादक की पत्नी या किसी बड़े कालेज की स्नातक। कहने का मतलब है कि इसकी वजह से उन्हें मौके मिले और इनमें से कई ने उन मौकों का इस्तमाल प्लास्टिक की गुड़िया बनने में नहीं किया बल्कि जगह बनाने में किया। यह बदलाव और ही अच्छा लगता जब इंग्लिश मीडिया में कोई छोटे कस्बे की अंग्रेज़ी बोलने वाली उतने ही प्रयास, उतने ही समय में वैसी जगह बना लेती जो एक खास तबके के महिलाओं ने बनाई। हिन्दी मीडिया में तो इतना भी नहीं हुआ। एक तो पुरुषवादी ढांचे की मज़बूती। दूसरा जूझ कर, टूट कर और फिर उठ कर जगह बनाने की होड़ या भूख कम लोगों में नज़र आई। पेशेवर होने के पैमाने पर भी साबित करने की भूख बढ़ती या कर पातीं, उससे पहले उन्हें स्त्री से भी ज्यादा स्त्री बना कर मेकअप लगाकर स्टुडियो में भेज दिया गया। जहां कठपुतली होना ही नियति है। फिर भी कुछ लड़कियां अच्छा काम कर रही हैं। कुछ यूं ही काम किए जा रही हैं जैसे कुछ लड़के किये जा रहे हैं। यह मेरा नज़रिया नहीं है जो देख रहा हूं अपने पेशे में उसकी लाइव कमेंट्री है। आप चाहें तो आराम से असहमत हो सकते हैं।
समारोह में अनेक विभूतियां मौजूद रहीं। संस्‍था के संपादक स्‍व0 वेद अग्रवाल का परिचय युवा लेखिका/पत्रकार आकांक्षा पारे ने पढ़ा। इस अवसर पर 'वरदा-2011' का विमोचन और वितरण भी हुआ।

सम्‍मानित होने वाली विभूतियां
रवीश कुमार : जो लोग टीवी देखते हैं या ब्लॉग पढ़ते हैं या सामाजिक सरोकारों से सरोकार रखते हैं उनके लिये रवीश कुमार को जानना अनिवार्य मजबूरी है। एनडीटीवी देश के सबसे ब्रान्ड्स में से एक है लेकिन रवीश कुमार ने इस ब्रांड की छाया में ही एक ब्रांड अपना भी बना लिया...रवीश की रिपोर्ट। कुछ लोग इसे मेहनत कह सकते हैं और कुछ सयानापन लेकिन हकीकत ये है कि रवीश की रिपोर्ट..अगर वो बंद नहीं हुई है तो..खूब देखी जाती है और उस पर खूब चर्चा होती है। दिल्ली के पास बसे धारावीनुमा खोड़ा पर प्रोग्राम देखने के बाद उत्तर प्रदेश जैसी सरकार 300 करोड़ का पैकेज दे देती है, खोड़ा के लोग लाइन लगाकर रवीश कुमार का सम्मान करते हैं, पहाड़गंज का प्रोगाम महेश भट्ट मुंबई में मंगवाकर देखते हैं, एक रुपया रोज़ में काम करने वालों की कहानी मोंटेक सिंह आहलुवालिया के दफ्तर में देखी जाती है, और सबके लिये यूनिक आई कार्ड बनाने वाली अथार्टी के मुखिया नंदन निलेकणी किसी से कहलवाते हैं...यार एक प्रोग्राम हमारे लिये आधार पर बना दो। टीआरपी की दौड़ में बने रहते हुए वो देश की, समाज की, लोगों की चिंता कर लेते हैं। जब टीवी चैनल टीआरपी मीटर वाले एपीएल (एबोव पॉवर्टी लाइन) दर्शकों की चिंता करते हैं तब रवीश कुमार बीपीएल पर प्रोग्राम बना देते हैं। मॉल कल्चर वाले दर्शकों को वो निपट देहाती गढ़ मेले के बारे में बताते हैं। जब लोग मेट्रो के गुण गाते हैं तो रवीश कुमार बताते हैं कि डीटीसी कितने कमाल की है। ये किसी पॉज़ीटिव चीज़ को निगेटिव नज़रिये से देखने की कोशिश नहीं, बल्कि निगेटिव में पॉज़टिव ढूंढने की हिमाकत है। सूचना का अधिकार अधिनियम जैसे जिन विषयों को टीवी में कोई छूने में भी डरता है रवीश कुमार पूरा अभियान चला डालते हैं। रवीश कुमार नई पीढ़ी के पत्रकार हैं, लेकिन पुरानी पीढ़ी सा अनुभव उनकी कलम और चित्रों में दिखता है। दलितों और मुसलिम बिरादरी का हाल रवीश कुमार का प्रिय विषय रहा है, लेकिन आजकल राज तो नौ बजे प्राइम टाइम में वो मिडिल क्लास की मकान की ईएमआई की भी चिंता करते हैं।
टीवी इंडस्ट्री में बहुत बड़े-बड़े किस्सा गो हैं लेकिन रवीश कुमार ने टीवी में किस्सागोई का एक नया अंदाज़ बनाया है। हो सकता है कि बिहार से निकले रवीश कुमार ने दिल्ली स्टेशन पर उतरते ही बिहार की बहुत सी बातों को भुला दिया होगा लेकिन उनके प्रोग्राम देखकर, उनको पढ़कर और उनसे बातें करते पता चलता है कि उनको अब भी कितना याद है, अपनी भाषा और मिट्टी के बारे में। रवीश कुमार सबसे अलग हैं, अनोखे हैं इसीलिये उत्तर प्रदेश महिला मंच ने उनको अपने संस्‍थापक की स्‍मृति में दिए जाने वाले सम्‍मान के लिए चुना है।

प्रकाशो तोमर : सीखने या पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती। यह कहावत बागपत के जौहड़ी गांव की प्रकाशो दादी पर एकदम सटीक उतरती है। साठ साल की उम्र में बंदूकबाजी सीखकर प्रकाशो तोमर ने स्‍टेट लेबल पर जब नौ पदक जीते तब पूरे देश में प्रकाशो का नाम पूरे देश के खेल प्रेमियों की जुबान पर आ गया। उनके गांव में तो एक क्रांति ही आ गई और घर की बेटियों और बहुओं ने भी हाथों में बंदूके थाम लीं। आज प्रकाशो की बेटी सीमा तोमर ही नहीं बल्कि घर में उनके पोते-पोतियां भी राष्‍ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर धूम मचा रहे हैं और सत्‍तर पार कर चुकी प्रकाशो दादी अब पूरे देश में घूम-घूमकर बेटियों को निशानेबाजी के गुर सिखा रहीं हैं। प्रकाशो को निशानेबाजी का कोई शौक भी नहीं था और न वह इस खेल के बारे में कोई विशेष जानकारी रखती थीं। घर में रोटियां सेकने, गोबर पाथने और खेतों में काम करने वाली प्रकाशो को निशानेबाजी का शौक तब परवान चढ़ा जब जौहड़ी में अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के निशानेबाज रहे राजपाल सिंह ने घास-फूस की रेंज बनाकर गांव के बच्‍चों को निशानेबाजी सिखाना शुरु किया तो साठ साल की प्रकाशो भी घर से चोरी-छिपे उस रेंज में जाकर निशानेबाजी में अपने हाथ आजमाने लगी। घर वालों को जब पता चला तो उन्‍होंने विरोध भी किया लेकिन प्रकाशो अपनी धुन की पक्‍की थीं। धीरे-धीरे प्रकाशो के बेटे-बेटियां और पोते-पोतियां भी उनका अनुसरण करने लगे।

प्रमिला बालासुंदरम : कर्नाटक की मूल निवासी प्रमिला बालासुंदरम पिछले 32 वर्षों से समाधान नाम की संस्था के माध्यम से मंदबुद्घि बच्चों के विकास के लिए संकल्पबद्घ हैं। अपनी भतीजी की शारीरिक अक्षमता को देखकर वह काफी परेशान रहती थीं और वही उनके सेवा कार्यों की प्रेरणा श्रोत भी बनी और शादी के बाद जब प्रमिला दिल्ली आईं तो उन्होंने देखा कि कोई भी सरकारी या गैर सरकारी कार्यक्रमों की पंहुच समाज के अंतिम छोर तक नहीं जा पाती। वह शारीरिक तौर पर अक्षम बच्चों को बुद्घि की कसौटी पर बेहतर पातीं लेकिन उनकी शिक्षा या पुनर्वास के कार्यक्रमों की शिथिलता से परेशान रहतीं। यही सब देखते और महसूस करते हुए प्रमिला को लगा कि इस दिशा में ठोस प्रयासों की जरुरत है और उन्होंने समाधान का गठन कर इसका रास्ता तैयार किया। तब से आज तक प्रमिला असहायों को संबल देने और उन्हें दक्ष बनाने में जुटी हैं। 1981 में उनके द्वारा रौंपा गया पौधा आज वटवृक्ष बन चुका है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर आज उनकी पहचान है। वर्तमान में वह एशियन फेडरेशन फॉर इंटलेक्चुअली डिसेबिल्ड की उपाध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त ·रने वाली वह पहली महिला हैं। उन्हें अब तक कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्‍कारों से नवाजा जा चुका है।

शालिनी माथुर : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की रहने वाली शालिनी माथुर को लोग ट्रैक्टर चलाने वाली मैडम के नाम से भी जानते हैं। कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढाने का संकल्प लेकर शालिनी ने 1991 में पुरुषों का एकाधिकार माने जाने वाले ट्रैक्टर की स्टेयरिंग पर जब महिलाओं को बिठाना शुरु किया तो लिंग आधारित इस प्रभुत्व को पहली बार देश ने टूटते देखा।
53 साल की शालिनी जिस काम में जुट जाती हैं, उसे अंजाम तक पंहुचाकर ही दम लेती हैं। प्रबंधन में मास्टर डिग्री करने के बाद शालिनी सामाजिक विषमताओं को दूर करने में जुट गईं और 1980 तक विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के साथ-साथ उन्होने स्वतंत्र रुप से सामाजिक विषमताओं और कुरीतियों के खिलाफ मोरचा खोले रखा। 1987 में शालिनी सुरक्षा नाम के संगठन से जुड़ीं। महिला अधिकारों के मुद्दों पर जमीनी स्तर से लेकर नीति निर्धारण तक के मंचों पर शालिनी समान रुप से जूझती हुईं दिखाई देती हैं।

मुंदरा देवी : लोग अपना बोझ नहीं उठा सकते लेकिन मुंदरा महिला होकर पुरुषों का बोझ उठाती हैं। उन्हें देखकर अक्सर लोग अचरज करने लगते हैं लेकिन जब उन्होंने कुलीगिरी करने का फैंसला लिया तो यह आसान नहीं था। मुंदरा देवी आगरा कैंट रेलवे स्टेशन पर पहली महिला कुली हैं। पुरुषों के एकाधिकार वाले इस क्षेत्र में मुंदरा जब पहली बार लाल वर्दी पहनकर रेलवे स्टेशन पर पंहुची तो लोगों ने उन्हें उपहास की दृष्टि से देखा लेकिन आज उन्होंने अपनी मेहनत और ईमानदारी से तमाम पुरुषों को पीछे छोड़ रखा है। अक्सर उनके साथ ऐसा होता है कि महिला कुली से सामान ढुलवाने में कुछ मुसाफिर चुप्पी साध जाते हैं लेकिन इनकी हिम्मत, ताकत और फुर्ती का कमाल असमानता की हर खाई को पाट देता है। यूं तो मुंदरा का भरा-पूरा परिवार है लेकिन पति की कमाई इतनी नहीं थी कि वह अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर योग्य बना पाती और शिक्षा के अभाव में उन्हें अपने लिए कुलीगिरी सबसे उचित लगी और उन्होंने एक दिन कुली का बिल्ला हासिल कर लिया। मुंदरा भले ही लिंग भेद मिटाने के लिए कोई प्रोजेक्ट न चला रही हों या किसी एनजीओ का हिस्सा न हों लेकिन वह खुद में एक ऐसी मिसाल बन गई हैं जिन्हें देखकर कोई भी महिला अपने को सबला समझ सकती है।

बसंती विष्ट : उत्तराखंड की विलुप्त होती संस्कृति को लोक गायिका बसंती विष्ट ने अपने शब्दों में पिरोकर न केवल जिंदा रखा है। बल्कि लोकगायिकी की इस विधा में पुरुषों के एकाधिकार को भी तोड़ा है। गढ़वाल की लोकगायन शैली जागर को बसंती विष्ट ने न केवल नई ऊंचाईया दीं बल्कि सीमांत गांवो तक सिमट कर रह गई इस विधा को जन-जन तक पंहुचाया। गढ़वाल और कुमाऊं की मिलीजुली थाती को संवारने वाली बसंती देवी के सुरों में इतनी मिठास है कि अपने छोटे से क्षेत्र की बोली को अपने गीतों के माध्यम से पूरे राज्य में पहचान दिलाई है। आज देश के संगीत समीक्षक उन्हें उत्तराचंल की तीजन वाई कहते हैं।
बसंती देवी ने अब तक अनेक गीत लिखे हैं और खास बात यह है कि वह स्वरचित गीतों को ही अपना स्वर देती हैं। जागर के अलावा वह मांगल, पाण्डवाणी, लोक गाथाएं एवं गढ़वाली तथा कुमाऊंनी लोकगीतों की भी गायिका हैं। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उनके द्वारा रचित एक गीत 'वीर नारी आगे बढ़, धीर नारी आगे बढ़' उत्तराखंड की आंदोलनकारी महिलाओं के कंठ से हमेशा गूंजता रहता था। कारगिल युद्घ से लेकर सामाजिक विषमताओं तक पर लोकगीत रच कर उन्हें स्वर देने वाली बसंती विष्ट उत्तराखंड की संस्कृति को सहेजने और परंपराओं को आगे बढ़ाने में जुटी हुई हैं।

प्रेरणा वर्मा : धुन की धनी प्रेरणा वर्मा ने बचपन से ही उद्यमी होने का सपना संजोया था। लेकिन परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं थीं। उन्हें न तो विरासत में कोई उद्यम मिला था और न इतनी पूंजी कि उससे कोई कारोबार खड़ा हो सके। कानपुर की रहने वाली प्रेरणा मध्यमवर्गीय परिवार से हैं और उनके पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी। पिता की मृत्यु के बाद घर का खर्च भी मुश्किल से चलता था। यही कारण था कि इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने एक प्राइवेट फर्म में नौकरी कर ली और यहीं से उनके मन में अपना उद्यम लगाने का विचार आया। परास्नातक की पढ़ाई पूरी की और कंप्यूटर का प्रशिक्षण लिया और 2004 में मात्र तीन हजार रूपये की पूंजी से अपना कारोबार शुरु किया। यहां से शुरु हुआ प्रेरणा के संघर्ष का सिलसिला। प्रेरणा बाजार में ठगी भी गई और उसे अपना उद्यम एक बार बंद भी करना पड़ा लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और इरादों को हमेशा बुलंद रखा। गुणवत्ता और नेकनीयती को अपना हथियार बनाया और फिर ·भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे अपनी मंजिल की तरफ बढ़ीं और घरेलू बाजार में पैर जमाने के बाद विदेशी बाजार में अपने पैर जमाने की दिशा में अपने कदम बढ़ाए। आज प्रेरणा वर्मा की औद्योगिक इकाई क्रिएटिव इंडिया बीस देशों में अपने लेदर एवं कॉटन से बने कलात्मक उत्पादों का निर्यात करती है और उनकी सालाना ग्रोथ अस्सी फीसदी तक पंहुच गई है, जो अपने आप में सफलता की कहानी बयां करने के लिए काफी है। उन्हें राज्य सरकार की तरफ से विशिष्ठ उत्पादकता पुरस्कार भी मिला है और आज वह अपनी लगन से नए उचाईयों की तलाश में जुटी हुई हैं।

डा0 अमृता सिंह : यूपी कैडर की पीसीएस अधिकारी डा0 अमृता सिंह ने उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से हासिल की। 2001 में पीसीएस में चयन होने के बाद पहली पोस्टिंग में ही एक नहीं तीन जिलों का काम उन्हें सौंपा गया। एक अधिकारी होने के बावजूद इन्हें खुद को अपने शोषण से बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। एक बार तो इन्होंने एक उच्चाधिकारी की गलत हरकतों से परेशान होकर नौकरी छोडऩे का मन बना लिया था लेकिन दूसरे ही क्षण अंतरआत्मा की आवाज पर आरोपी बॉस को सबक सिखाने के लिए जी-जान से जुट गईं। अनेकानेक दवाबों के बाद भी झुकी नहीं। अमृता का मानना है कि महिलाएं यदि पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में कदम रखती हैं तो उन्हें उसी तरह रहना सीखना पड़ता है जैसे बत्तीस दांतो के बीच में जीभ रहती है लेकिन यदि स्त्रियां दृढ़ता और मजबूत इरादों का कवच पहन लें तो संसार का कोई भी पुरुष उनसे मनमर्जी नहीं कर सकता।

Saturday, December 18, 2010

तंदूर से फ्रिजर तक : भुनती और जमती औरत

करीब पंद्रह साल पहले एक आदमी ने अपने प्‍यार को तंदूर में भून डाला था और पंद्रह साल बाद एक दूसरे आदमी ने अपने प्‍यार को बर्फ में जमा दिया। पंद्रह सालों में दुनिया बदल गई लेकिन नहीं बदला तो 'मर्द' और उसकी 'मर्दानगी'। दुनिया में हम विकासशील से विकसित की दौड़ में पंहुच गए तो मर्द भी तंदूर से डीप-फ्रिजर तक पंहुच गया। कहते हैं कि शिक्षा के साथ संपन्‍नता और सभ्‍यता में भी इजाफा होता है लेकिन लगता है कि दरिंदगी की रफ्तार इन सबसे कई गुना चलती है; तभी तो देहरादून की अनुपमा बहत्‍तर टुकड़ों में कटकर डीप फ्रिजर में पड़ी रही और उसके कथित तौर पर शिक्षित, सभ्‍य और संपन्‍न पति सत्‍तावन दिनों तक एक दिन भी आत्‍मग्‍लानि नहीं हुई। कहते हैं कि हिंदु या भार‍तीय शादियां किसी लाटरी की तरह होती हैं। शादी के बाद ही पता चलता है कि लाटरी लाख की हुई या खाक की। लेकिन सोफ्टवेयर इंजीनियर राजेश गुलाटी ने तो उड़ीसा की अनुराधा को दिल की आवाज पर अपनी संगिनी बनाया था। दोनों ने लव मैरिज की थी और अमेरिका में रहने के बाद जब वह अपने वतन लौटे तो देहरादून में आकर बस गए। अनुराधा के जुड़वा बच्‍चे हुए जो उनके साथ ही रह रहे थे और अब चार साल के हैं। तब आखिर ऐसा क्‍या हुआ जिसने आदमी को दरिंदा बना दिया या यूं कहिए कि आदमी की खोल में छिपा दरिंदा यकायक बाहर आ गया। क्‍या मर्दानगी ही आदमी की दरिंदगी है या दरिंदगी में ही मर्दानगी का वास होता है या फिर औरत इस सृष्टि में इसी तरह के किसी हश्र के लिए जन्‍मी है।
आज से करीब पंद्रह साल पहले दो जुलाई 1995 को नैना साहनी तंदूर में मुर्गे की तरह भूनी गई थी। उसके राजनेता पति ने गोली मारकर उसे तंदूर में सेंक दिया था। नैना साहनी के दबंग पति सुशील शर्मा को शक था कि उसकी पत्‍नी के किसी दूसरे मर्द के साथ संबंध हैं। सुशील ने अपनी पायलट पत्‍नी की उड़ान बंद करने के लिए पहले उसे गोली मारी और फिर उसके टुकड़े कर उसे एक होटल के तंदूर में डालकर भूनना शुरु कर दिया ताकि कोई सुबूत ही न बचे लेकिन वहां से गुजर रहे एक सिपाही की आत्‍मा तंदूर से उठती गंध ने जगा दी और वह थाने से पुलिस लेकर पंहुच गया। सुशील शर्मा तो मौके से फरार हो गया लेकिन होटल का मालिक केशव हत्‍थे चढ़ गया तो पता चला कि दिल्‍ली युवा कांग्रेस का कद्दावर नेता सुशील अपनी पत्‍नी के टुकड़ों को तंदूर में भून रहा था। ठीक कुछ इसी तरह राजेश गुलाटी ने बीती 17 अक्‍टूबर को पहले अपनी पत्‍नी का वध किया और उसके बाद बाजार से डीप फ्रिजर लाकर उसमें जमा दिया। इसके बाद उसके शातिर दिमाग ने बाजार से पत्‍थर काटने का कटर और आरी लेकर उसके 72 टुकड़े किए और धीरे-धीरे एक-एक टुकड़े को वह मंसूरी की वादियों में फेंककर ठिकाने लगाता रहा। उसके बच्‍चे मां को याद करते तो वह उन्‍हें पुचकार कर चुप करा देता कि उनकी मां दिल्‍ली गई है, जल्‍दी आ जाएगी। यदि राजेश की ससुराल से फोन आता तो वह उन्‍हें भी कोई बहाना बनाकर टरका देता। बाहर का कोई आदमी राजेश पर दरिंदा होने का शक भी नहीं कर सकता था क्‍योंकि अमेरिका में नौकरी कर लौटा सोफ्टवेयर इंजीनियर राजेश आज की सोसायटी के लिए एक आयकॉन भी था। सुशील को तो मौत की सजा सुना दी गई और हो सकता है कि दस-बीस साल में राजेश का भी वही हश्र हो लेकिन सवाल उठता है कि समाज के उस वर्ग के लोग दरिंदंगी की सीमाएं क्‍यों पार कर रहे हैं जिनको समाज एक बिंब की तरह देखता है; जिन से प्रभावित होता है और उनकी तरफ देखकर वैसा ही बनने की आकांक्षा पालता है।
ऐसा नहीं है कि नैना और अनुपमा दो ही उदाहरण हैं। ऐसी घटनाएं हमारे समाज में अलग-अलग जगहों पर आए दिन घटित होती हैं। इनमें से बहुत सी घटनाएं तो कभी अखबारों की सुर्खियां भी नहीं बनतीं। जेसिका लाल, प्रियदर्शन मट्टू या कुसुम बुद्धिराजा जैसे नाम तो मीडिया की सुर्खियों की वजह से जाने जाते हैं वरना हमारा समाज आमतौर पर मर्द को माफ करने का ही हिमायती रहता है और बहुत सी अमानवीय दुराचार की कहानियां घर की चहारदीवारी से बाहर भी नहीं आ पातीं। अगर ऐसा न होता तो मुजफ्फरनगर की इमराना के बलात्‍कारी ससुर को गांव की पंचायत सिर्फ सात जूतों की सजा सुनाकर वरी न करती। यानी एक निरीह औरत की अस्‍मत गांव की पंचायत ने सिर्फ सात जूतों में ही निपटा दी लेकिन इमराना को भी हम मीडिया के जरिए ही जानते हैं वरना न जाने कितनी इमरानाएं रोजाना इस तरह के अत्‍याचार सहती हैं। समाज और पंचायते ही नहीं अदालतों का रवैया भी इससे कहीं इतर नहीं है। 1977 में महाराट की एक आदिवासी लड़की का थाने में ही बलात्‍कार हुआ था तब भी आरोपी सिपाहियों को वरी करते हुए मथुरा नाम की उस आदिवासी लड़की को ही निचली अदालत ने बदचलन करार दिया था। इस फैंसले पर भी खूब हंगामा हुआ और बाद में हाईकोर्ट ने दोनों बलात्‍कारी सिपाहियों को आजीवन कारावास की सजा दी लेकिन एक बात साफ है कि औरत की आबरू मर्द के नजरिए में कोई अहमियत नहीं रखती। हर साल करीब पच्‍चीस हजार महिलाओं की इज्‍जत तार-तार होती है, इतनी ही अगुवा की जाती हैं तो इससे तीस गुना या और भी अधिक घर पर 'मर्दो' के हाथों रोज पिटती हैं।
सवाल उठता है कि इसके लिए दोषी समाज है, गिरते नैतिक मूल्‍य हैं या अपसंस्‍कृति इसके लिए दोषी है? क्‍या हमारी लाचार कानून-व्‍यवस्‍था इन पवृतियों को निरंकुश करने में सहायता नहीं कर रही है? सच तो यही है कि आज हमारी कानून-व्‍यवस्‍था की हालत दिल दहला देने वाली है। जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्टू, शिवानी भटनागर, मनू शर्मा, बीएमडब्‍लू कांड लगातार हमारे दिमाग में हथौड़े नहीं बजाते। नैना साहनी कांड में लाश को टुकड़ों में विभाजित कर तंदूर में भूना जाना क्‍या हमारे समाज के गर्त में जाने, उसके अधोपतन के उदाहरण नहीं है। या फिर एक पढ़े-लिखे विदेश में रहे एक सोफ्टवेयर इंजीनियर द्वारा अपनी पत्‍नी की हत्‍या कर पत्‍थर काटने की मशीन से उसके टुकड़े कर उसे डीप फ्रिज में रखना आदमी के पत्‍थर हो जाने की कहानी नहीं तो और क्‍या है? आदमी के दरिंदा होने की कहानियां हमारे समाज में लगातार क्‍यों बढ़ रहीं हैं; ये एक ऐसा यक्षप्रश्‍न है जिसका हल किसी युधीष्ठिर के पास ही हो सकता है लेकिन अफसोस कि हमारा समाज आजकल दुशासन पैदा कर रहा है और उनके हाथ भी खून से रंगे हुए हैं जिनपर युगनिर्माण की जिम्‍मेदारी है। ऐसे में कहना मुश्किल है कि कब तक नैना तंदूर में और अनुपमा बर्फ में जमती रहेंगी...ये दो तो फिलहाल एक प्रतीक हैं वरना इस वेद में तो ऋचाएं बहुत हैं।

Wednesday, February 4, 2009

प्रेम के तमाशे में फंसी औरत

करीब साठ दिन से एक (अ)प्रेम कहानी सुर्खियों में है। मीडिया के लिए मुंबइया फिल्‍मों या एकता कपूर के सीरियलों से भी हिट मसाला। राष्‍ट्र की सबसे गंभीर समस्‍या। जी हां! हरियाणा के दिग्‍गज नेता भजनलाल के साहबजादे और पूर्व उपमुख्‍यमंत्री चंद्रमोहन के चांद मौहम्‍मद और चंडीगढ़ की एडवोकेट अनुराधा वाली के फिजा बनकर निकाह करने और फिर चांद के छिप जाने से आहत फिजा की दास्‍तान कई हफ्तों से सुर्खियां बनी हुई है। भले ही इस कहानी को चटखारे लेकर परोसा जा रहा हो लेकिन इस प्रसंग ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे सवाल जो मौकापरस्‍ती के लिए धर्म का ही नहीं बल्कि कानून का भी मजाक उड़ाते हैं और हमारा समाज, धर्म और कानून अभिशप्‍त होकर मूकदर्शक बना रहता है। एक मुद्दा महज चटखारेदार खबर बनकर रह जाता है।
ये कहानी एक ऐसे पुरुष और स्‍त्री की है जो सुसंस्‍कृत परिवार और समाज से हैं। पढ़े-लिखे हैं। समझदार हैं। या कहिए कि जरूरत से ज्‍यादा समझदार हैं। इस कहानी का एक पात्र चंद्रमोहन है। हरियाणा के दिग्‍गज राजनेता भजनलाल का पुत्र और सूबे का उपमुख्‍यमंत्री चंद्रमोहन एक दिन अचानक गायब हो गया। कुर्सी छोड़कर। यहां तक कि अपने बीबी-बच्‍चों को बिलखते हुए छोड़ गया। तलाश हुई लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला लेकिन एक दिन वह एक युवती के साथ दुनिया के सामने आया। इस युवती का नाम था अनुराधा वाली। पेशे से एडवोकेट अनुराधा भी गायब थी। लेकिन प्रकट हुए चंद्रमोहन अब चांद मौहम्‍मद बन चुके थे और अनुराधा वाली नए अवतार में फिजां बनकर सामने आई थी। दोनों ने ऐलान किया कि उन्‍होंने निकाह कर लिया है। यानी कानून को धोखा देने के लिए चंद्रमोहन ने धर्म का सहारा लिया और अपनी प्रेयसी का भी धर्म परिवर्तन करा शादी कर ली। दोनों ने हीर-रांझा टाइप प्रेम कहानियों पर बनी मुंबइया फिल्‍मों की तरह डायलोग बोले। चांद मौहम्‍मद बन गए चंद्रमोहन ने कहा कि उनकी दोस्‍ती पुरानी थी और जब प्‍यार में बदली तो उन्‍होंने साथ रहने का फैसला किया क्‍योंकि वह दोनों एक दूसरे के बगैर रह नहीं सकते थे। फिजा ने चांद को हीरा कहा और दोनों ने एक-दूसरे को तारीफ के चंदन लगाए और साथ जीने-मरने का ऐलान कर दिया।
अगर ये हरकत हमारे देश के किसी आम चेहरे ने की होती तो उसका उपचार समाज और उसके रखवालों ने कर दिया होता। अगर 'रामू' या 'मुन्‍ना' ऐसा करते तो इलाके के दरोगा जी ही चार लाठियों में मामला सुलटा देते लेकिन मामला अपमार्केट था। एक राजघराने से जुड़ा था। लिहाजा कई हफ्तों तक चांद और फिजा के पीछे-पीछे कैमरे चलते रहे। सुर्खिया बनी रही। हर रोज एकता कपूर के सीरियलों जैसा एक नया घटनाक्रम सामने आ जाता। चटखारेदार खबर थी और खबर बिकने वाली थी तो जाहिर था कि कभी चांद बन चुके चंद्रमोहन के बीबी-बच्‍चों को लेकर एक कड़ी बनती और कभी उनके अन्‍य घरवालों की प्रतिक्रियाएं सामने आतीं और खबरची एक से पूछते और दूसरे को बताकर प्रतिक्रिया ले‍ते। कुल मिलाकर चटखारे लिए जाते रहे लेकिन किसी ने गंभीरता से ये सवाल नहीं उठाया कि चंद्रमोहन की ब्‍याहता स्‍त्री और उन बच्‍चों का क्‍या कुसूर था। क्‍या ये उस स्‍त्री और बच्‍चों के प्रति एक तरह की हिंसा नहीं थी। क्‍या धर्म परिवर्तन कर दूसरा विवाह इतना आसान है। क्‍या सामाजिक सुरक्षा के ताने-बाने को इस तरह तार-तार किया जा सकता है। क्‍या धर्म परिवर्तन कर लेने से एक व्‍यक्ति अपनी पत्‍नी से मुक्‍त हो सकता है। अगर नहीं तो चांद पर कानूनी शिकंजा क्‍यों नहीं कसा गया?
लेकिन ये कहानी यहीं पर खत्‍म नहीं हुई। चांद फिर गायब हो गया। चांद की फितरत है घटना, बढ़ना और छिप जाना। चंद्रमोहन जिस तरह अपनी पहली बीबी और बच्‍चों को छोड़ कर गायब हुआ था; उसी तरह फिजा को छोड़कर गायब हो गया। अपनी पत्‍नी और बच्‍चों को छोड़कर गायब होने के बाद चंद्रमोहन जब सदेह सामने आया तो चांद बना हुआ था। यानी उसने इस्‍लाम ग्रहण कर लिया था। तब वापस आया चांद अपने साथ फिजा को लेकर अवतरित हुआ था। ये ऐलान करता हुआ कि उसे अनुराधा से बेपनाह मुहब्‍बत है। इतनी मुहब्‍बत कि वह एक-दूसरे के बगैर जिंदा नहीं रह सकते। फिजा को अपना चांद हीरा लग रहा था। ऐसा चांद जिसमें उसे कोई धब्‍बा भी नहीं दिखाई दे रहा था। लेकिन कुछ दिनों बाद ही कृष्‍ण पक्ष आया और चांद एक बार फिर छिप गया। इस बार फिजा बन चुकी अनुराधा की जिंदगी में अमावस्‍या आई।
वजह कुछ भी हो। चाहे लोग ये माने कि उन्‍होंने प्‍यार को बदनाम किया है। बदनाम हुई है तो सिर्फ मौहब्‍बत। या ये माने कि चंद्रमोहन और अनुराधा दोनो ही दोषी हैं। लेकिन कड़वा सच यही है कि दोनों ही परिस्थितियों में अगर कोई ठगा गया है तो वह है औरत। हर हाल में अगर किसी का कुछ छिना है तो वह है स्‍त्रीत्‍व। चंद्रमोहन के गायब होने पर उसकी पत्‍नी और बच्‍चे ठगे गए और चांद मौहम्‍मद के गायब होने पर फिजा। यानी लुटी तो सिर्फ और सिर्फ औरत ही। हो सकता है कि आप कहें या तर्क दें कि अनुराधा वाली तो पढ़ी-लिखी कानून की जानकार औरत थी; ये भी मानें कि उसी की वजह से चंद्रमोहन ने अपनी पत्‍नी को छोड़ा लेकिन सच तो यही है कि एक औरत की आबरू लूट कर उसने दूसरी औरत की आबरू को भी तार-तार किया।
अब मजहब की भी सुनिए। हिंदु मैरिज एक्‍ट के मुताबिक चंद्रमोहन एक पत्‍नी के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकते थे; इसलिए वह मुसलमान हो गए और अब इस्‍लाम के विद्वान कह रहे हैं कि अगर चांद मौहम्‍मद सार्वजनिक तौर पर यह कह दे कि वह इस्‍लाम धर्म छोड़कर फिर से हिंदु हो गए हैं तो उनका फिजा से निकाह अपने आप टूट जाएगा। और फिजा को इस्‍लाम धर्म में रहते हुए इद्दत करनी पड़ेगी। यानी हर हाल में एक औरत ही ठगी गई और यही सदियों से होता चला आ रहा है लेकिन सवाल उठता है कि आखिर कब तक? कब तक हम कबीलाई समाज की मानसिकता का दामन थामे बैठे रहेंगे? आखिर कब ऐसा होगा जब औरत को इंसाफ के लिए गुहार नहीं लगानी पड़ेगी? क्‍या लगाम सिर्फ औरत के लिए है? आपकी प्रतिक्रियाओं और विचारों का इंतजार रहेगा!

Monday, January 26, 2009

गणतंत्र : घूंघट से निकले एक चेहरे के बहाने

मुझे इस गणतंत्र दिवस पर कई चेहरे याद आ रहे हैं। मेरे मन मस्तिष्‍क में उमड़-घुमड़ रहे हैं। इनमें से कुछ चेहरे देश के हैं, कुछ विदेश के और कुछ मेरे अपने शहर के। इनमें से कुछ आकृतियां मेरी मां जैसी हैं, कुछ बहिनों जैसी, कुछ सखियों जैसी और कुछ अंजान। ये तस्‍वीरें तो अलग-अलग हैं लेकिन इन उमड़ते-घुमड़ते चेहरों को मिलाकर जो आकृति बन रही है, उससे ठिठुरन और सिहरन बढ़ जाती है। मैने गणतंत्र के उनसठ साल तो अपनी आंखों से नहीं देखे लेकिन होशो-हवाश में पच्‍चीस सालों के बीच देखे गए कई चेहरे हैं। इनमें से मैं अपने ही शहर मेरठ के एक चेहरे का जिक्र कर रही हूं जो मेरे दिमाग को सबसे ज्‍यादा झकझोरता है।
ये चेहरा उस युवती का है जिसे मैने करीब बीस साल पहले गज भर घूंघट में चूल्‍हे पर रोटियां सेकते देखा था। टोकरा भर रोटियां सेकती, मुंह में फूंकनी लगाकर चूल्‍हे को हवा देती, चूल्‍हे से निकल रहे धुंए को अपनी आंखों में समाती यह युवती आज खुली हवा में उड़ान भर रही है। उत्‍तर प्रदेशीय महिला मंच के एक कार्यक्रम के सिलसिले में मैने जब पहली बार संगीता राहुल (या कहिए कि उनके पति जगदीश, जो उस समय सभासद थे।) के घर दस्‍तक दी तब संगीता का यही रूप था। मेरे निमंत्रण पर उनके पति ने संगीता को मंच के कार्यक्रम में शामिल होने की अनुमति दी और धीरे-धीरे उसका घूंघट उठता चला गया। बाद में अपने वार्ड से संगीता सभासद चुनी गई और फिर उसने विधायक का चुनाव भी लड़ा। संगीता एक ऐसा चेहरा है जिसने हमारे साथ अपना सफर शून्‍य से शुरू किया और फिर आगे की गिनतियां गिनने का सिलसिला अनवरत जारी रखा। भले ही संगीता ने अपनी दिशा को राजनीतिक दिशा दे दी हो। महत्‍वाकांक्षाओं के पंख लग गए हों लेकिन फिर भी वह हमारे गणतंत्र का एक ऐसा चेहरा है जिसने परिस्थितियों की चाहरदीवारी लांघकर उड़ना सीखा, सपने देखे और खुली हवा में सांस ली। मैं सोचती हूं कि आज भी हमारे इर्द-गिर्द की कितनी ऐसी महिलाएं हैं जिनके पति उन्‍हें गज भर घूंघट से निकलने की इजाजत देते हैं। अगर हम मुट्ठी भर शिक्षित परिवारों को छोड़ दें तो आज भी बहुतायत में ऐसी महिलाओं की ही संख्‍या ज्‍यादा है जिन्‍होंने अपने हौंसलों और अरमानों को चाहरदीवारी में कैद कर लिया है या वे इसके लिए अभिशप्‍त हैं। आजाद भारत में आज भी अधिकांश स्त्रियां दासी हैं। सामाजिक ढांचे में उनकी जुबान बंद रहती है और देह व मस्तिष्‍क हमेशा उत्‍पीड़ने के लिए तैयार।
ऐसा नहीं कि महिलाओं के उन्‍नयन के लिए हमारे देश की संसद ने कानून न बनाए हों। कुप्रथाओं व उत्‍पीड़न रोकने के लिए कागजों और किताबों में स्‍त्री सुरक्षा का चेहरा चाक-चौबंद है; पर हकीकत में तमाम कानूनों के बावजूद स्त्रियों को अपने वजूद की लड़ाई लड़नी पड़ती है। वास्‍तविकता तो ये है कि स्‍त्री सबसे पहले अपने गर्भ में लड़की के लिए जगह ढूंढती है। सामान्‍यत: सब पहले लड़का ही चाहते हैं। अधिकांश घरों में भी तो लड़कों को ही वरीयता मिलती है। मुद्दा चाहे खानपान का हो, रहन-सहन का या शिक्षा का; परिवारों में इस तरह का भेद लड़कियों को मन ही मन छोटा कर देता है। यह विडम्‍बना ही है कि वैज्ञानिकों द्वारा यह स्‍थापित किए जाने के बाद भी लड़का या लड़की होना पुरूष के योगदान पर निर्भर करता है, बेटिया पैदा करने के लिए स्‍त्री ही प्रताडि़त होती है। किसी ने ठीक ही लिखा है कि दुनियां में अगर न्‍याय का कोई एक विश्‍वव्‍यापी संघर्ष है तो वह नारी के लिए न्‍याय का संघर्ष है। अगर किसी एक मुद्दे पर हर सभ्‍यता, हर परंपरा का दामन दागों से भरा है तो वह स्‍त्री की अस्मिता का मुद्दा है। इस न्‍यूनता का एहसास भी हर समाज के अवचेतन में मौजूद है। पुरूष विधुर हो या तलाकशुदा, कोई अंतर नहीं पड़ता। उसे दूसरी शादी करने में समस्‍या का सामना नहीं करना पड़ता जबकि स्‍त्री की परिस्थितियां विपरीत होती हैं।
यदि शास्‍त्रार्थ में न जाएं तो इतना बताना जरूरी है कि किसी भी स्‍त्री के व्‍यक्तित्‍व का अधिकार किसी भी धर्म, सभ्‍यता या समाज-व्‍यवस्‍था की कृपा का परिणाम नहीं हैं। उल्‍टे स्‍त्री के स्‍नेहमयी और ममतामयी व्‍यक्तित्‍व का हनन हर सभ्‍यता का सबसे बड़ा खोखलापन है। हर देशकाल में स्‍त्री को नए सिरे से अपने लिए जगह बनानी पड़ती है। स्‍त्री के पास निर्णय लेने की क्षमता न होने की वजह से परिवारों में सारे फैंसले पुरूष ही करते हैं।
स्‍त्री की रक्षा के लिए कानूनों का जो कवच दिया गया है वह नई चुनौतियों के आगे अपने को लाचार पा रहा है। सिर्फ कानूनों के भरोसे निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता। वे कानून ठीक तरह से लागू हों; इसके लिए सजग रहने की जरूरत सबसे ज्‍यादा है।
मेरा यह लेख दैनिक आई नेक्‍स्‍ट में प्रकाशित हुआ है।

Tuesday, November 4, 2008

फौज, फेयर सेक्‍स और उम्‍मीदें!

दिबेन देश के लब्‍धप्रतिष्ठित कथाकार हैं। अब तक उनके तीन कहानी संग्रह 'कांटे में फंसी मछली', 'आधा सच' और 'वो एक दिन' प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलाव उनके दो उपन्‍यास 'चिदम्‍बरा' और 'नदी बीमार है' खासे चर्चित रहे हैं। 'कांच के ताजमहल' उनका कविता संग्रह है लेकिन दिबेन का एक रूप और है। वह समय-समय पर सामयिक मुद्दों पर अपनी कलम चलाते रहे हैं। उन्‍होंने इर्द-गिर्द के लिए अपना एक विचारोत्‍तेजक लेख भेजा है जो फौज में महिलाओं की स्थिति को तार-तार करता है।



बीते एक अक्‍तूबर को दुर्गानवमी थी। समूचे देश में मां दुर्गा के नवम् सिद्धिदात्री स्‍वरूप की पूजा की जा रही थी। इसी दिन वायुसेना अध्‍यक्ष एयरमार्शल होमी मेजर सा‍हब का बयान आया कि महिलाओं के लिए वायुसेना में भी कुछ कर दिखाने के बहुत से अवसर हैं। हांलाकि वायुसेना में महिलाओं को काफी पहले ही अवसर मिलने शुरू हो गए थे। पंजाब की एक वीरांगना को वायुसेना (नाम जानबूझकर नहीं दिया जा रहा है।) पहली फाईटर बनने का अवसर मिला था लेकिन दुर्भाग्‍य से वह वीर नायिका अपने हुनर दिखाने से पहले ही एक असमायिक दुर्घटना का शिकार होकर इस संसार को अलविदा कह गई थी। अभी तक महिलाएं रक्षा सेनाओं में शार्ट सर्विस कमिश्‍न्‍ड अफसर के रूप में ही अपनी सेवाएं दे पा रहीं थीं। यानी कि चौदह साल की सेवा के बाद बिना किसी पेंशन सुविधा के सेना से उनकी छट्टी कर दी जाती थी। अभी तक ऐसा हो भी रहा है।
इस बात को कुछ महिला अधिकारियों ने कुछ इस तरह भी कहा है कि अपने युवा जीवन के अमूल्‍य चौदह वर्ष देश के हित में सेना को समर्पित करने के बाद जब हम सेवा से विदा लेती हैं तो स्‍वयं को ठगा हुआ सा महसूस करती हैं।

इकत्‍तीस मई को खड़कवासला की राष्‍ट्रीय रक्षा अकादमी के कमांडेंट एयरमार्शल टी एस रणधावा ने अकादमी के एक सौ चौदह वेच के केडेट्स की पासिंग परेड के समापन के अवसर पर पत्रकारों को बताया कि अकादमी महिलाओं को सेना अधिकारियों के रूप में प्रशिक्षित किए जाने को पूरी तरह तैयार है। उन्‍होंने कहा कि सेना में महिलाओं को स्‍थायी कमीशन्ड अफसर के रूप में जज एडवोकेट जनरल (जे ए जी विभाग) और एजूकेशन कोर में भर्ती किए जाने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। एयरमार्शल रणधावा ने जो बात कही उसकी पुष्‍टि भारत के रक्षामंत्री श्री ए के एंटनी ने इस प्रस्‍ताव पर अपनी सहमति जता कर कर दी। फिलवक्‍त रक्षा सेनाओं में पांच हजार एक सौ सैंतीस महिला सेना अधिकारी अपनी सेवाएं दे रहीं हैं। इनमें से सर्वाधिक चार हजार एक सौ एक थल सेना में, सात सो चौरासी वायुसेना में और दो सौ बावन नौसेना में पदस्‍थ हैं।
इस मुद्दे पर ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत (वीएसएम) का स्‍पष्‍ट मत है कि एक समय था जब सेना में किसी महिला का नाम भी नहीं सुना जाता था। रक्षा सेना के आफिसर्स मेस के बार रूम अथवा भोजनालय में महिलाओं का प्रवेश तक वर्जित था। सैनिक अधिकारियों के मैस में महिलाओं के लिए लेडीज रूम बनाए जाते थे लेकिन वहां सेना अधिकारियों के परिवार की महिला सदस्‍य ही पंहुच सकती थीं।

जिस देश में नारी की पूजा किए जाने की बात की गई है उस देश की सैनिक इकाइयों में महिलाओं के साथ अछूतों जैसा बर्ताव करना हैरत में डालने वाला है। अगर हम अपने पौराणिक ग्रंथों से ही उदाहरण ढूंढे तो महारानी कैकेयी के बारे में कहा जाता है कि वह अपने पति महाराज दशरथ के साथ युद्ध के मैदान में जाती थीं और सहयोगी के रूप में युद्ध में भाग लेती थीं।

उन्‍नीसवी सदी में महारानी लक्ष्‍मीबाई ने ब्रिटिश सेनाओं के विरूद्ध युद्ध में भारतीय सेनाओं का नेतृत्‍व करते हुए देश के लिए अपना बलिदान दे दिया था। इसी प्रकार दक्षिण भारत में किट्टर की रानी चेनम्‍मा ने देश की स्‍वतंत्रता की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहूति दी थी। द्वितीय विश्‍व युद्ध में नेताजी सुभाष चंद बोस के नेतृत्‍व में गठित की गई आजाद हिंद फौज में एक अलग महिला रेजिमेंट का गठन किया गया था जिसकी कमान सुश्री लक्ष्‍मी सहगल को सौंपी गई थी। इसके बावजूद आजादी के बाद भी भारतीय रक्षा सेनाओं में वही सामंती नियम कायदे कायम हैं जो अंग्रेजी सेनिक नेतृत्‍व से विरासत में मिले थे।
राष्‍ट्रीय रक्षा अकादमी खड़कवासला के कमांडेंट एयर मार्शल टीएस रणधावा का कहना है कि एन डी ए में पुरूष कैडेट्स को ही प्रशिक्षण दिया जाता है इसलिए महिला कैडेट्स के प्रशिक्षण के लिए चैन्‍नई की सैन्‍य अकादमी में व्‍यवस्‍था की जाएगी। श्री रणधावा ने कहा कि सेना की महिला रक्षा अधिकारी सीधे युद्ध में भाग नहीं लेंगी। सेना के केवल उन्‍हीं अंगों में उन्‍हें स्‍थान दिया जाएगा जहां उन्‍हें शत्रु के साथ युद्ध में सीधे-सीधे भाग न लेना पड़े।

वास्‍तव में 1990 में ही भारतीय नौ सेना और वायुसेना में महिला अधिकारियों के लिए अवसरों के द्वार खोल दिए गए थे। इन महिला अधिकारियों को शार्ट सर्विस कमिशन्‍ड अधिकारी का दर्जा दिया गया था परन्‍तु इन महिला अधिकारियों को पुरूष अधिकारियों के समान कठोर प्रशिक्षण दिए जाने के बाद भी बहुत साधारण से कार्यों पर नियुक्‍त किया गया। इस सारी प्रक्रिया में लिंग भेद का अहसास सीधे-सीधे होता था। हांलाकि बिट्रेन की शाही सेना में महिला अधिकारियों को पुरूषों के समान ही सम्‍मान और अधिकार प्राप्‍त होते हैं लेकिन भारतीय सेना के उच्‍च अधिकारी अपनी सामन्‍ती सोच से उबर न पाने के कारण महिला अधिकारियों को अभी तक भी उनके पुरूष सहयोगियों के बराबर सम्‍मान के योग्‍य नहीं समझते।
भारतीय सेना के उपसेनाध्‍यक्ष लेफ्टीनेंट जनरल पट्टाभिरमन का स्‍पष्‍ट रूप से कहना है कि हमें यूनिट स्‍टर पर लेडी आफिसर्स की नहीं युवा जेंटलमेन आफिसर्स की भागीदारी की आवश्‍यकता है। वास्‍तव में खेलने की गुडि़याओं (बार्बी डाल्‍स) का युद्ध मैदान के बंकर्स में कोई स्‍थान नहीं होता है। उच्‍च सेना अधिकारियों की इसी मानसिकता के कारण सेना में कार्य कर रही महिला अधिकारियों के यौन उत्‍पीड़न और यौन शोषण की घटनाएं भी सामने आने लगीं।

महिलाओं को मामूली सी घटना पर भी चार्जशीट किया गया जबकि उनके पुरूष सहयोगी बड़ा अपराध करने पर भी छुट्टे छोड़ दिए गए। सेना के दस्‍तावेजों के अनुसार पिछले चौदह वर्षों में कम से कम सात महिला अधिकारियों का कोर्टमार्शल किया गया। इनमें से अधिकांश महिलाएं अपने शै‍क्षणिक जीवनकाल में ही अपनी विलक्षण प्रतिभाओं का प्रदर्शन कर चुकीं थीं। यदि वे चाहती तो सिविल सेवाओं में भी अपना कैरियर चुन सकती थीं लेकिन स्‍वदेश प्रेम का जज्‍बा ही उन्‍हें रक्षा सेना मे खींच कर लाया था। पर इसका परिणाम क्‍या निकला। यही कि रक्षा सेना में उन्‍हें तरह-तरह से अपमानित किया गया। इसका विरोध करने पर मामूली से मामूली (पेटी मेटर्स) बातों पर उन्‍हें चार्जशीट थमाई गई। उनका कोर्ट मार्शल किया गया और अपमानित करके रक्षा सेवा से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया। अफसोस की बात तो यह है कि एक मामले में तो एक महिला अधिकारी पर मात्र दस रूपये के गबन का चार्ज लगा कर उसे सेना से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया।

बातें बड़ी-बड़ी हैं पर सेना में कार्यरत महिला अधिकारियों की वा‍स्‍तविक हालत क्‍या है, इस बात का अनुमान लेफ्टीनेंट जनरल पद्मनाभन की टिप्‍पणीं से तो लगता ही है। एक सेना अधिकारी द्वारा अपने पिता को लिखे पत्रों से भी लगता है। 27 मार्च 98 को लिखे एक ऐसे ही पत्र में उसने लिखा था - पापा आपने हमेशा इतनी खुशियां दी हैं कि पता ही नहीं चला कि दुख क्‍या है। यहां आई एन एस हमला और कोची ने बहुत कुछ सिखा दिया। लेकिन यह सब सहन करना आसान भी तो नहीं है। मेरे पास परिवार का कोई ऐसा व्‍यक्ति भी नहीं है जिससे अपनी चिंताएं और पीड़ा बांट सकूं। घर फोन करके कुछ शांति मिलती है पर बारह दिनों में चार हजार रूपये फोन पर खर्च हो चुके हैं फिर भी सुकून नहीं है।

कभी कोई सीनियर अफसर बुलाता है तो उनके व्‍यवहार पर इतना गुस्‍सा आता है कि दुनिया पलटने को मन करता है। पापा! असल बात यह है कि फौज में लड़कियों को कोई इंसान नहीं समझता। आदर, सम्‍मान केवल दिखाने को है पर असल जिंदगी में ऐसा नहीं होता। कुछ दिनों के लिए इस एनवायरमेंट से भाग जाने को दिल करता है। हरिद्वार, देहरादून जाने को मन कर रहा है। अपने भाई-बहिनों के पास, आपके पास आने का मन है। यहां से उड़ जाने का मन कर रहा है। पापा! डिफेंस लड़कियों के लिए कितना गंदा है, यह बात सब को पता लगनी चाहिए। फौज में इतने लोग आत्‍महत्‍या क्‍यों करते हैं यह बात सब को पता लगनी चाहिए। हम सोचते हैं डिफेंस और ज्‍यूडिसियरी यही दो अच्‍छी जगह बची हुईं हैं जबकि ऐसा नहीं है।
...फिर लगता है कि ये बा‍तें बाहर गईं तो देश की अस्मिता को भी खतरा हो सकता है। बात उछली तो इंटरनेशनल लेवल तक खिंच सकती है। खैर छोड़ो यहां पीडि़त व्‍यक्ति का ही कोर्ट मार्शल होता है। ... इस कोर्ट मार्शल ने मुझे इन उच्‍च अधिकारियों का असली चेहरा तो दिखा ही दिया। वास्‍तव में इन लोगों को बेनकाब किया जाना चाहिए पर ऐसा हो नहीं सकता। ये सो काल्‍ड सीनियर आफिसर तो फिर भी बचे ही रहेंगे। क्‍योंकि न्‍याय तो इन्‍हें ही करना है। ... यहां फौज में अपराधियों को ही न्‍याय करने की पावर दी जाती है।
पत्र का मजबून तो दहलाने वाला है। ऐसे में फौज में महिलाओं को स्‍थाई कमीशन दिए जाने की बात बहुत ज्‍यादा उम्‍मीदें नहीं जगाती।

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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