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Tuesday, January 13, 2009

उपन्‍यास अंश : धुंआ और चीखें

कथाकार-व्‍यंग्‍यकार दामोदर दत्‍त दीक्षित को उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान ने 'प्रेमचंद सम्‍मान' प्रदान करने की घोषणा की है। ये सम्‍मान उन्‍हें भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनके उपन्‍यास धुंआ और चीखें के लिए दिया जा रहा है जिसमें उन्‍हें उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान की तरफ से बीस हजार रूपये की पुरस्‍कार राशि दी जाएगी। इससे पूर्व उनके इसी उपन्‍यास के लिए राजस्‍थान का प्रतिष्ठित आचार्य निरंजननाथ सम्‍मान प्रदान किया जा चुका है। दामोदर दत्‍त दीक्षित इन दिनों मेरठ में उप चीनी आयुक्‍त के पद पर कार्यरत हैं। इर्द-गिर्द की तरफ से दामोदर जी को शुभकामनाएं। हम यहां उनके पुरस्‍कृत उपन्‍यास का एक अंश प्रस्‍तुत कर रहें हैं-



बन्‍नू पर नए-नए दौर तारी। पहले हिंसा-घृणा का दौर, फिर लिप्‍सा-लोभ का दौर और अब आया मुहाजिरों (शरणार्थियों) का दौर! सरहद पार हिंदुस्‍तान से थके मांदे, लुटे-पिटे, उजड़े-बिखरे मुहाजिरों के झुण्‍ड-के-झुण्‍ड आ रहे थे और नवोदित पाकिस्‍तान में यत्र-तत्र-सर्वत्र बसाए जा रहे थे। चर्चा के केंद्र में अब मुहाजि़र थे।
जुमे के रोज मीर आलम खां जुहर (दोपहर) की नमाज पढ़कर घर आ रहे थे कि ढपकती चाल में अलादाद खां दिखे। धाराप्रवाह गालियां चाल पर पुख्‍तगी से हावी।
'सलाम आले कुम' का जवाब 'वाले कुम सलाम' में पा चुकने के बाद मीर आलम खां ने हंसते हुए कहा, ''अरे म्‍यां, नमाज से फुर्सत मिलते ही किसकी मां-बहिन न्‍योतना शुरू कर दिया। अल्‍लाह के नाम पर मल्‍लाही ठीक नहीं।''
अलादाद खां रास्‍ता छेंककर खड़े हो गए।
''क्‍या बताउं मीर भाई! ये जो बहन.... मुहाजिर आए हैं, उन्‍होंने नकदम कर रखा है। ये समझो बिस्मिल्‍लाह ही गलत हो गया।''
''आलू भाई कुछ बताओगे भी या पहेली ही बुझाते रहोगे?" वह थोड़ा पिछड़कर खड़े हो गए जिससे अलादाद खां की बदबुदार सांस से निजात मिल सके।
''मेरे बगल में जगदीश फलवाला रहता था- अरे वही मोटी तोंद वाला हंसोड़ गंजा जिसका चेहरा फिल्‍मी कलाकार गोप से मिलता था। उसका पांच कमरों का घर था जिसे बने हुए पूरे तीन साल भी नहीं हुए होंगे। जगदीश के भागने के बाद मैने दोनों घरों के बीच दरवाजा फोड़ लिया और मय बीबी-बच्‍चों के उसके घर चला गया। अपने घर में कारखाना फैला लिया। पहले उसी मकान में घर, उसी में कारखाना था। जगह की बहुत तंगी हुआ करती थी।'' उसने मुंह ऐसे सिकोड़ा जैसे जगह की तंगी चेहरे पर उतर आई हो।
''.....और हुकूमत नें जगदीश का घर तुमसे खाली कराकर किसी मुहाजिर को दे दिया है। यही समस्‍या है न तुम्‍हारी?'' उसने अलादाद खां के बाएं कंधे पर दायां हाथ रखकर हौले से हिला दिया। ओठों पर मुस्‍कराहट, भवों पर तंज तैर रहा था।
कंधे पर हाथ रखने को सहानुभूतिक आयाम मानकर वह उत्‍साहित स्‍वर में बोले, '' सही फरमाया आपने। पर केवल यही दाद नहीं, खाज भी है। केले के पत्‍ते की तरह तकलीफ से तकलीफ निकल रही है। शुरू में तो जगदीश का मकान खाली करने से साफ इंकार कर दिया मैने। एक दिन सुबह दारोगा चंद सिपाहियों के साथ आ धमका। बेंत से पीटने लगा मुझे, जनानियों को भद्दी-भद्दी गालियां दीं, उनके साथ धक्‍कामुक्‍की की और हमारा सामान बाहर फिंकवाने लगा। बदन पोर-पोर दुख रहा था। हल्‍दी-चूना मलने के बावजूद कमर की सूजन आज तक नहीं गई।''
उन्‍होंने दाएं हाथ की तर्जनी कमर में चुभाई और प्रमाणस्‍वरूप कराह उठे।
''खां साहब, आपकी धुनाई भी तो कहीं इतिहास का हिस्‍सा नहीं बन गई।''
''आपको हंसी-ठट्ठा सूझ रहा है, यहां जान पर बन आई है। पहले पूरी बात तो सुनिए। हरामी मादर.... पुलिस वालों ने शरीर पर ही नहीं गांठ पर भी चोट की। दोनों घरों के बीच जो दरवाजा फोड़ा था, उस जगह को चिनवाने के नाम पर पैसे भी वसूले- इतने कि उतने में पूरी दीवार बनकर खड़ी हो जाए।'' उंची आवाज में कराहते हुए उसने अपनी नन्‍हीं आंखों को दूना विस्‍तार दिया।
''बड़े पाजी निकले पुलिसवाले। टूटी कमर पर और बोझ डाल दिया। चच्‍च....च्‍चच्‍च....''
''उधर जो मुहाजिर पड़ोसी मिले, वे बड़े ही शातिर और जालिम निकले।''
''क्‍या उनसे भी टण्‍टा हुआ?"
"उनका लौंडा है- गबरू जवान। पचीस के आस-पास होगा। एक दिन छत से झांक रहा था। मना किया कि मत झांका करो, जनानियां रहती हैं मेरे घर में। उसने आव देखा न ताव, मुक्‍का तानकर धमकाने लगा, ''ए मियां, ज्‍यादा टिपिर-टिपिर मत कर। जान हथेली पर लेकर यहां तक आया हूं। मुझे अपनी जान की रोएं भर भी परवाह नहीं। ज्‍यादा टोका-टाकी की तो तरबूज की तरह पेट चीर दूंगा। छह खून के तोहफे हिंदुस्‍तान को दिए तो एक पाकिस्‍तान को भी। मैं लल्‍लू-पंजू मुहाजिर नहीं कि धौंस बर्दाश्‍त करूं। समझे? नहीं समझे? उसकी फारसी सुनकर मुझे तो गश आ गया।''
''तौबा-तौबा....।''
''मुझे टिकाकर कमरे में ले जाया गया। मुंह पर छींटे मारे गए, तब कहीं जाकर होश आया। तब से सारा परिवार सहमा हुआ है। दिन-रात यही चिंता कि शैतान इब्‍लीस जाने कब छत से कूद पड़े और चाकू पेल दे।''
धंधा भले ही असलहों का हो, पर कंधा अलादाद खां का कमजोर था। हां, दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने का उन्‍हें अच्‍छा अभ्‍यास था। वह थे भी वजीर कबीले के जिसके लिए कहा जाता है कि वह सामने से नहीं, पीछे से वार करता है।
मीर आलम खां को पुराने दिन याद आ गए, ''खां साहब, आप दुहाई देते फिरते थे कि खतरा काफिर हिंदुओं की ओर से है, यह मुसलमान से खतरा किस रास्‍ते से आ टपका? मेरे भाई, सच तो यह है कि खुदा सब कुछ देखता है। सब कुछ सुनता भी है। वह करनी का फल भी देता है- भले ही देर हो जाए। आपको अपने पापों का फल मिल रहा है- अपने नामाराशी की तरह।''
''नामाराशी? मेरा नामाराशी? कौन मेरा नामाराशी?''
''वही मशहूर डिप्‍टी कमिश्‍नर निकल्‍सन के समय का अलादाद खां। उसका किस्‍सा पता नहीं?"
"नहीं पता मुझे।"
''क्‍यों पता हो? इतिहास तुम्‍हारे लिए बादशाहों, महाराजों और नवाबों की लड़ाइयों और रंगरेलियों तक ही सीमित है। पर अपने नामाराशी का किस्‍सा सुन लो। उस अलादाद खां ने अपने भतीजे की भूमि हड़प ली थी। भतीजे ने डिप्‍टी कमिश्‍नर मेजर जॉन निकल्‍सन की अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। एक सुबह लोग क्‍या देखते हैं कि निकल्‍सन साहब एक पेड़ से बधे हैं। लोग दौड़ पड़े। अलादाद खां भी। निकल्‍सन साहब ने तुर्शी से सवाल किया, ''ये जमीन किसकी है?" अलादाद खां ने यह सोचते हुए कि जिसकी जमीन है, उसे द‍ंडित किया जाएगा, कहा, '' हुजूर-ए-आला यह जमीन मेरी नहीं है। मेरे भतीजे की है।'' निकल्‍सन साहब को बांछित साक्ष्‍य मिल गया था। अगली सुनवाई की तिथि में उन्‍होंने भतीजे के पक्ष में निर्णय दे दिया और लोभी अलादाद खां को दंडित किया। उस लोभी की तरह तुम्‍हें भी सबक मिल रहा है।''
जॉन निकल्‍सन सत्रह साल की उम्र में ईस्‍ट इंडिया कंपनी की बंगाल नैटिव इन्‍फैंट्री में कैडेट के रूप में भरती हुए थे, पर अपने परिश्रम के बल पर फौज के उच्‍च पद तक पहुंचे। सख्‍त प्रशासक के रूप में ख्‍याति थी उनकी। यहां तक कि माएं अपने बच्‍चों को यह कहकर डराती थीं, ''चुप हो जा वरना 'निक्‍कल सेन साहब' पकड़ कर ले जाएंगे।''
एक बार उन्‍हें पता चला कि फौजी अफसरों के भोजन में रसोइयों ने जहर मिला दिया है। उन्‍होंने तब तक भोजन नहीं किया जब तक कि रसोइयों को फांसी नहीं दे दी गई। 1857 की क्रांति के दौरान वह पंजाब से फौज लेकर दिल्‍ली पहुंचे। युद्ध में घायल होने के फलस्‍वरूप सितंबर, 1857 में दिल्‍ली में आर्मी कैंप में ही उनकी मृत्‍यु हुई।
अलादाद ने चिंतित स्‍वर में कहा, ''निक्‍कल सेन साहब अठारह सौ सत्‍तावन की गदर में मर-खप गए, पर मैं तो जिंदा हूं। सलाह दो कि क्‍या करूं। चुगद मुहाजिर मेरी ऐसी-तैसी करने में लगा हुआ है। बीबी की आबरू, बच्‍चों की जान खतरे में है। जगदीश को छत पर आना होता तो खांस-खंखार कर आने का संकेत दे देता। जनानियां परदे में हो जाया करतीं। आदमी हीरा था--हीरा!"
"...जो आप जैसे कच्‍चे कोयले की संगत में पड़ गया।''
''क्‍या बताएं, भाई!"
"बताओ नहीं, भुगतो। भूल गए वे दिन जब गुण्‍डों की सलवार में घुसकर कहते थे कि सारे हिंदुओं का सफाया हो रहा है, पर मेरे जगदीश को कोई क्‍यों हाथ नहीं लगाता? अब उस पर प्‍यार उमड़ रहा है। ये कहो मैं न निकालता तो तुम उसे इस दीन-जहान से उठा चुके होते। सच तो यह है कि तुम निहायत खुदगर्ज, तंगदिल और टुच्‍चे हो-- इंसानियत के नाम पर स्‍याह धब्‍बा। मुहाजिर तुम्‍हारे साथ जैसा सुलूक कर रहे हैं, तु उसी के लायक हो?"
मीर आलम खां ने अलादाद खां को तीखी नजरों से घूरा और चल दिए। पीछे-पीछे जावेद भी।
अलादाद खां कुछ क्षणों तक ठगे से उन्‍हें जाते देखते रहे, फिर निगाह उपर उठाई। मस्जिद की मीनारों पर धूप अब भी चमक रही थी।
बात अलादाद खां की ही नहीं थी। इकराम, मुहम्‍मद ईसा, मुहम्‍मद अमीन, जियाउद्दीन जैसे बहुत से लोग थे जिन्‍हें हथियाये गए मकानों से बेदखल होना पड़ा था और 'लौट के बुद्धु घर को आए' जैसी स्थिति हो गई थी। पर बहुत से प्रभावशाली व्‍यक्तियों ने यहां भी नियम-कानून को धता बता दिया था और हुक्‍काम की हथेली गरम कर हड़पी संपत्ति बचा ले गए थे।

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शाम होते ही शहर अंगड़ाइयों लेकर जमुहाई लेने लगा। जैसे वायु निर्वात की ओर बगटुट भागती है, वैसे ही सर्दी शरीर को रोम-रोम वेधने की फिराक में थी। घिरते अंधेरे ने सर्दी में भयावहता घोल दी थी। सड़क के किनारे गठरी दिखाई दी जिसे कुत्‍ता सूंघ रहा था। करीब आने पर पता चला कि यह गठरी न होकर सिमटा-सिकुड़ा आदमी है। कुत्‍ते को उसके कपड़ों में रोटी की तलाश थी या वह उसकी दुर्दशा पर सहानुभूति प्रकट कर रहा था, कहना कठिन था।
धुंधली आकृति उभरी-- आधा गंजा सिर, बढ़ी हुई दाढ़ी, छोटी-छोटी आंखें गड्डे में धंसी हुईं। नीचे का शरीर फटे कंबल से ढका हुआ। अरे, यह तो अब्‍दुल गनी हैं--शेरू के पिता।
मीर आलम खां ने आवाज दी, ''गनी भाई!"
कोई उत्‍तर नहीं। अपना कान उनके मुंह तक ले गयाफ श्‍वसनक्रिया चालू, पर घरघराहट के साथ। जैसे गले में कुछ फंस रहा हो। मिरगी का दौरा है या किसी अन्‍य व्‍याधि के साथ आई अचेतावस्‍‍था।
इकलौता बेटा शेरू जीवित था, तो अब्‍दुल गनी को किसी चीज की कमी न थी। वह गुण्‍डागर्दी से काफी कमा लेता था। अगर जेल चला जाता, तो भी पिता अर्जित संपत्ति को धीरे-धीर कुतरते रहते। पर शेरू की हत्‍या के बाद स्थिति दयनीय होती चली गई। जीविका का एकमात्र साधन घर के अगले हिस्‍से में स्थित दुकान थी जिसके देर-सबेर मिलने वाले आधे-धोधे किराए से बमुश्किल गुजर-बसर होती थी। आंखों की कमजोर रोशनी के कारण वह कोई काम करने की स्थिति में न थे।
मुहाजिरों की चीटिंयों जैसी अटूट पांत बन्‍नू आई। एक मुहाजिर परिवार अब्‍दुल गनी के बगल वाले घर में बसाया गया। मुहाजिर ने कुछ समय बाद अपने भाई को अब्‍दुल गनी के घर में बसा दिया। अब्‍दुल गनी घर के बाहरी बरामदे में सिमटकर रह गए। बन्‍नू के जेहाद के हीरो शेरू के अब्‍बा हुजूर के साथ एक हममजहब द्वारा की गई ज्‍या‍दती के खिलाफ किसी हममजहब ने आवाज नहीं उठाई।
जेहाद का मतलब किसी के लिए कुछ भी रहा हो, अब्‍दुल गनी के लिए यह था कि इकलौते बेटे को एकमात्र सहारा भी जाता रहा था और स्‍वयं घर से बेघर होकर भिखमंगे की परिधि में आ गए थे। इन जुड़वां सौगातों को अपनी नीमअंधी आंखों के साथ अकेला ही ढोना था। न तो नवाब साहब आगे आए, न ही जियाउद्दीन और अलादाद खां जैसे जेहादी जिन्‍होंने शेरू को भड़काया था और भरपूर इस्‍तेमाल किया था। अब्‍दुल गनी शेरू की शहादत का हवाला देकर फरियाद करते, पर लोगों के पास उनका दुखड़ा सुनने का, सहायता करने का अथवा सहानुभूति के दो शब्‍द उचारने का भी वक्‍त न था।
मीर आलम खां का शेरू के प्रति घृणाभाव रहा था, पर उसके कुकृत्‍यों का दंड बाप को देना एक दूसरा कुकृत्‍य लगा। दो दोस्‍तों और जावेद की सहायता से अब्‍दुल नी को चारपाई पर लिटाकर अपने घर ले आए। आग जलाकर उनके शरीर में हरारत और जुम्बिश पैदा की। चम्‍मच से चाय पिलाते समय वह ऐसे लग रहे थे जैसे अबोध, निश्‍छल शिशु।
अगली सुबह डाक्‍टर को दिखाया गया। डाक्‍टर ने दवा दी। नीमबेहोशी दूर हुई, बलगम में कमी आई, बुखार भी कम हुआ। पर तीसरे दिन तबियत बिगड़ गई। डाक्‍टर की दवा और मीर आलम खां की दुआ के बावजूद वह बच नहीं सके।
दफनाने के समय भी शेरू का इस्‍तेमाल करने वाले नहीं पंहुचे।

Thursday, October 2, 2008

बटला हाउस के बहाने उठे कुछ सवाल

दिल्‍ली में हुए धमाकों और उसके बाद बटला हाउस में हुई मुठभेड़ के बाद लगातार सवाल उठ रहे हैं। इस तरह के सवाल देश में शायद ही कभी इतने बड़े पैमाने पर उठे हों। आखिर क्‍यों उठ रहें हैं सवाल? क्‍या लोकतंत्र में सवाल उठाना भी गुनाह है? क्‍या कुछ लोग एक अलग तरह का आतंक फैलाकर अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता भी छीन लेना चाहते हैं? अगर सवाल उठ रहें हैं तो हमें जबाव भी खोजने होंगे। अगर बहस हो रहीं हैं तो ये इस बात का सुबूत है कि हम एक आजाद मुल्‍क में सांस ले रहें हैं। लोकतंत्र की जड़ें अभी दीमक से बची हुई हैं। मेरी पिछली पोस्‍ट बटला हाउस के बहाने में मैने अपने विचार रखे थे। कुछ मुद्दे उठाए थे। मुझे खुशी है कि साथियों ने रियेक्‍ट किया। तर्कों के साथ। निहायत ही सौम्‍य तरीके से। लेकिन मैने चिट्ठाजगत में देखा कि शाब्दिक हिंसा की होड़ लगी है। मैं शुक्रगुजार हूं आपका कि आपने न मुझे संघी कहा और न सिमी का एजेंट। लेकिन यदि आप कह भी देते तो क्‍या मुद्दे नेपथ्‍य में चले जाते। सवाल उठना बंद हो जाते। सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

Ratan Singh ने अफसोस जताया कि हमारे यहाँ कुछ ऐसे नेता और लोग है जो ख़बरों में बने रहने के लिए उलजलूल बयानबाजी करते रहतें है। मिहिरभोज का गुस्‍सा कुछ यूं था-‘हर मुसलमान आतंकवादी होता है ,देशद्रोही होता है ये साबित करने मैं लगे है ऐसे लोग....आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है मित्र ....पर जब जब किसी आतंकवादी का बाल भी बांका होता है तो ये मीडिया वाले ये मानवाधिकार वादी उसे आतंकवादी न कहकर मुसलमान कहने लगते हैं....मुसलमान हो या हिंदू हर देशभक्त नागरिक इस देश मैं बराबर हक और कर्तव्य का निर्वाह कर रहै हैं और करना चाहते हैं। ओमकार चौधरी के विचार थे कि आतंकवाद विश्वव्यापी समस्या बन चुका है लेकिन लगता है कि अभी दुनिया के बहुत से देश इस महादैत्य से निपटने के लिए मानसिक और रननीतिक तौर पर तैयार ही नहीं हुए हैं. भारत भी उनमे से एक है. भारतीय नेताओं, मानवाधिकारवादियों, मीडिया और आम जन को ये सीखना होगा कि इस से कैसे निपटना है. राज भाटिय़ा और सचिन मिश्रा ने अच्‍छा लेख और धन्‍यवाद देकर रस्‍मअदायगी की। लेकिन गुफरान ( gufran) की प्रतिक्रिया जरा गौर से पढिए- जोशी जी आप ने जो लिखा वो हर नज़रिए से तारीफ के काबिल है ! लेकिन क्या ऐसा इससे पहले भी कभी हुवा है इस तरह से क्या कभ और किसी ने ऊँगली उठाई है ! क्या इससे पहले मुडभेड नहीं हुई हो सकता है की उसपर ऊँगली उठी हो पर ऐसा आरोप आज तक नहीं लगा! वैसे क्या मुसलमान को टारगेट करने से पहले मीडिया या नेताओं को ये नहीं सोचना चाहिए की अभी कानपूर में जो हुवा वो क्या था किस संगठन के लोग थे और बम क्यूँ बना रहे थे आखिर इससे फायदा किसको है! मै आपके लेख के लिए आपको धन्यवाद् देता हूँ ! लेकिन मीडिया और आज की राजनीती पर भी कुछ बेबाक राय दीजिये......!आपका हिन्दुस्तानी भाई गुफरान (ghufran.j@gmail.com)मेरा मानना है कि गुफरान की सोच को हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। हो सकता है कि कुछ लोग गुफरान को मुसलमान/पाकिस्‍तानपरस्‍त या आतंकी सोच वाला व्‍यक्ति मानकर मुद्दे को भटकाने की कोशिश करें लेकिन गुफरान आज जो पूछ रहा है वह इस देश के कम से कम अठारह करोड़ नागरिकों का सवाल है। गुफरान का सीधा सवाल है कि आखिर इससे फायदा किसको है। गुफरान के मन में मीडिया और वर्तमान दौर की राजनीति को लेकर भी पीड़ा है। मैं गुफरान को नहीं जानता लेकिन गुफरान के मन में जो सोच पल रही है उससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। दरअसल कुछ ऐसी ताकते हैं जिनकी राजनीतिक रोटियां तभी सिकती हैं जब मुसलमान और हिंदू एक दूसरे को देखते ही अपनी-अपनी आसतीनें चढ़ा लें। यही ताकतें न केवल धर्म और जाति के आधार पर हमें बांट रहीं हैं बल्कि ऐसा बीज बो रहीं हैं जो जिन्‍ना से भी ज्‍यादा खतरनाक है। मैं फिर कहता हूं कि गोली का जबाव फूलों से नहीं दिया जा सकता लेकिन आप उस पुलिस को छुट्टा कैसे छोड़ सकते हैं जिसके आचार-व्‍यवहार से औसत आदमी थाने में शिकायत लेकर जाने से भी डरता है। जो दबंगों की शह पर या रिश्‍वत लेकर किसी को भी अपराधी बना देती दरअसल हमारे दो चेहरे हैं। जब हम परेशानी में होते हैं तो हमारा सोच कुछ और होता है और जब दूसरा परेशानी में होता है तो हम धर्म देखते हैं। जाति देखते हैं। सामने वाले की औकात को देखकर व्‍यवहार करते हैं। बिल्‍कुल उसी तरह जैसे हम अपने घर आने वाले मेहमान की अहमियत देखकर ही आवभगत करते हैं।आज समाज के हर वर्ग में गिरावट है। मीडिया भी उससे अछूता नहीं है लेकिन फिर भी मीडिया के खाते में अच्‍छे कामों की फेहरिस्‍त बहुत लंबी है। लेकिन एक फैशन है कि मीडिया को गाली दो। अगर मीडिया आपका माउथ आर्गन नहीं बनता तो आप उसे कोसने लगते हो। अगर वह बटला हाउस की घटना पर सवाल उठाता है तो आप उसे कोसने लगते हो। डॉ .अनुराग का मैं दिल से मुरीद हूं। बहुत सेंटी ब्‍लागर हैं। बहुत भावुक हैं और बहुत सारे चिंतकों से बेहतर सोच के साथ लिखते हैं। अभी उनकी पोस्‍ट थी एफआईआर। पुलिस थाने और गिरते मूल्‍यों का सटीक चित्रण किया था डाक्‍टर साहब ने। डाक्‍टर साहब ने अपना अमूल्‍य समय निकाल कर मेरा चिट्ठा पढ़ा और तर्कसंगत प्रतिक्रिया दी- ‘एक तरीका तो ये था की मै आपका लेख पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त किए बिना समझदारी भरी चुप्पी ओड लूँ ताकि मुझे कल को किसी विवाद में न पड़ना पड़े ...पर मन खिन्न हो जाता है कई बार .....
शुक्र है आप छदम धर्म-निरपेक्ष का रूप धारण करके कागजो में नही आये ,हमारे देश को एक स्वस्थ बहस ओर आत्म चिंतन की जरुरत है ,बाटला हाउस की मुठभेड़ ओर मुसलमानों को सताया जाना ?इन दोनों का क्या सम्बन्ध है मुझे समझ नही आता है .इस देश में राज ठाकरे अगर कुछ कहते है तो देश की ८० प्रतिशत जनता उनका विरोध करती है ,तोगडिया ओर दूसरे हिंदू कट्टरपंथी के समर्थक गिने चुने लोग है ,उनके विरोध में हजारो लोग खड़े हो उठते है ...ऐसी ही अपेक्षा मुस्लिम बुद्धिजीवियों से होती है पर वे अक्सर चुप्पी ओडे रहते है .क्या किसी घायल इंसपेक्टर को पहले अपने घाव मीडिया को दिखाने होगे इलाज में जाने से पहले ?क्या अब किसी इंसान को पकड़ने से पहले उसके घरवालो ,मोहल्लेवालो ओर पूछना पड़ेगा ?क्या आतंकवाद हमारे देश की समस्या नही है ?पर सच कहूँ मीडिया भी अपनी जिम्मेदारी नही समझ रहा है ?इस सवेदनशील मुद्दे पर जहाँ किसी भी ख़बर को दिखाने से ..उनकी पुष्टि की जरुरत है ?कही न कही उसे भी बाईट का लालच छोड़ना होगा ......कोई भी ख़बर ,कोई भी धर्म इस देश से ऊपर नही है...’डाक्‍टर साहब जहां आप जैसे प्रतिष्ठित व्‍यक्ति को ऍफ़ .आई .आर जैसी पोस्‍ट लिखनी पड़ती हो वहां पुलिस पर सवाल तो उठेंगे ही। मैं फिर कहता हूं कि जब बटला हाउस के अंदर बैठे बदमाश या आतंकी गोलियां चलाएंगे तो उसका जबाव फूलों से नहीं दिया जा सकता। लेकिन अगर मीडिया ये सवाल उठाता है कि तीन दिन से उस फ्लैट पर पुलिस की निगाहें गढ़ी हुईं थीं। उनके मोबाइल सर्विलांस पर थे तब पुलिस ये अंदाजा क्‍यों नहीं लगा पाई कि अंदर बैठे आतंकवादी कितने हथियारों से लैस होंगे। जिन लोगों पर देश के कई हिस्‍सों में ब्‍लास्‍ट करने का आरोप है वह भजन-कीर्तन तो करने से रहे। क्‍यों हमारे बहादुर इंस्पेक्‍टर ने बुलेट प्रूफ जैकेट पहनने में लापरवाही की ? ऐसे सवाल तो उठेंगे ही और इनसे मुंह मोड़ना एक दूसरे खतरे को खड़ा करेगा। डाक्‍टर साहब मेरी आपसे गुजारिश है कि अगर मेरी कोई बात गलत लगे तो कहिएगा जरूर क्‍योंकि तार्किक मंथन से ही अमृत निकलेगा। मैं फिर कहता हूं कि बहुत सारे मामलों में मीडिया की भूमिका अच्‍छी नहीं रही लेकिन बहूतायत में मीडिया ने अपनी जिम्‍मेदारी बखूबी निभाई है। बटला के बहाने रौशन जी ने भी इर्द-गिर्द पर शिरकत की है। वह कहते हैं कि ‘अगर किसी सिलसिले में पुलिस किसी को गिरफ्तार करे तो उसका विरोध करने की जगह सच्चाई खोजने की कोशिश की चाहिए जरूरी नही है की जो पकड़े गए हैं सभी दोषी हों और यह भी जरूरी नही है की सभी निर्दोष ही हों। हम नागरिक समाज के लोगो को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी के साथ अन्याय न हो न्याय सबसे बड़ा मरहम होता है और न्याय ऐसा हो जिसके निष्पक्ष होने में किसी को संदेह न होने पाये।कोई मुठभेड़ होते ही उसे सही या गलत ठहराने कि परम्परा बंद होनी चाहिए और किसी के पकड़े जाने पर उसको दोषी या निर्दोष बनाया जाना बंद किया जाना चाहिए। कानून की प्रक्रियाओं का निष्पक्ष पालन जरुरी है।……॥और अंत में मैं उस अनामी की टिप्‍पढ़ीं को जस का तस प्रस्‍तुत कर रहा हूं। इस आशय के साथ कि आप इसे एक पोस्‍ट समझकर चर्चा को आगे बढ़ाएं। वैसे मैं इन अनामी भाई के बारे में आपको इतना बताना चाहूंगा कि ये मेरे अजीज हैं। देश के सबसे बड़े चैनल में विशेष संवाददाता हैं। इनकी गिनती उन चंद मूल्‍यवान पत्रकारों में हैं जिन्‍होंने न कभी समझौता किया और न किसी दबाव में आए। कई सत्‍ताधारी माफियाओं और दबंगों की असलियत उजागर कर चुके मेरे इस भाई की प्रतिक्रिया पढ़कर आप चर्चा को आगे बढ़ाएं।Anonymous हरि भाई, मैं आपकी बातों से कई बार असहमत होता हूं। लेकिन अपनी बात रखना चाहता हूं। पहली बात कि हमें बहस करने पर कभी शर्म नहीं करनी चाहिये। यदि सवालों की हद तय होने लगेगी और बहस करने में शर्म आने लगेंगी तो हरि भाई जल्द ही आप को खुद का नाम बताने के लिये किसी की मुहर चाहिये होगी। साथ ही हरि भाई क्या आपको लगता है कि पुलिस अधिकारी माला ही पहनने वहां गया था। यदि उनका अधिकारी रेकी कर चुका था और पिछले चार दिनों से वो आतिफ के फोन और मूवमेंट को ट्रेक कर रहे थे तो फिर क्या वो माला ही पहनने उस जीने से से चौथी मंजिल चढ़ रहे थे जिससे एक वक्त में एक ही आदमी बाहर आता है। मैं एक बात से मुतमईन हूं कि आप भी बटला हाऊस के एल 18 में नहीं घुसे होंगे लेकिन आप उन आदमियों की निंदा मुक्त हस्त से कर रहे है जो वहां रिपोर्ट कर आ चुके है। क्या आपकों लगता है कि सवाल खड़े करने वाले पत्रकारों का कोई रिश्ता लश्कर ए तोईबा या फिर इंडियन मुजाहिदीन से है। जिस बहस में जिस बात की आप को सबसे ज्यादा चिंता है उसी के ऐवज में ये सवाल किये जा रहे है। क्या आपने एक भी बाईट किसी पुलिस अधिकारी की ऐसी सुनी है जो ये कह रहा हो कि मोहन चंद शर्मा ने अपनी पहचान छुपाने के लिये ही बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहनी थी। या फिर पैतींस किलों की जैकेट पहनना मुश्किल था इसीलिये उसने जैकेट नहीं पहनी। जैकेट उनका पीएसओ लिये गाड़ी में था। लेकिन जिस इंसपेक्टर ने पैतीस से ज्यादा एनकाउंटर किये हो उस अधिकारी को चार दिन की सर्विलांस के बाद भी ये अंदाज नहीं हुआ कि वहां आतंकवादी मय हथियार हो सकते है।एक बात और हरि भाई जब आप पर जिम्मेदारी बड़ी होती है तो सवाल भी आप से ही किये जाते है। मैंने आज तक एक भी न्यूज एडीटर ऐसा नहीं देखा जो ब्रेकिंग न्यूज में पिछडने पर चपरासी को गरियाता हो। सवाल तो और भी हरि भाई दुनिया में लापरवाही के लिये जो भी सजा हो हमारे लिये मैडल है। मैं जानता हूं कि मैंने कभी चलती हुयी गोलियों के बीच पीस टू कैमरा नहीं किया है। मैंने कभी किसी फायरिंग के बीच किसी की जान नहीं बचायी है लेकिन मेरे भाई मैंने अपने माईक पर कभी अपने ड्राईवर से लाईव नहीं कराया। देश में इतने गहरे होते जा रहे डिवीजन पर आप के तीखे सवाल ज्यादा उन लोगों को चुभ रहे है जो झूठ के लिये ज्यादा लड़ते है और सच का आवरण खड़ा किये रहते है। मैं एक बात जानता हूं कि इस देश में करप्ट नेता चलेगा करप्ट ब्यूरोक्रेट चलेंगे लेकिन एक बात साफ है कि करप्ट या दिशाहीन पत्रकार देश को डूबो देंगे। आप सवाल खड़े करने में हिचक रहे है लेकिन आप ही लिख रहे है कि देश में नियानवे फीसदी एनकाउंटर फर्जी होते है क्या इस बात का मतलब है मैं नहीं समझा। क्या आप अपने स्टाफ को तो छोडिये उस करीबी दोस्त के सौवें वादे पर आंख मूंद कर ऐतबार करते है जिसने निन्यानवे बार झूठ बोला हो। मैं एक कहावत लिख रहा हूं आपके ही इलाके में बोली जाती है ...मरे हुये बाबा की बड़ी-बड़ी आंख भले ही बाबा अंधा क्यों न हो। एक बात जान लीजिये हरि भाई जमीन गर्म है अगर उसका मिजाज नहीं भांप पाये तो बेटे के सामने पछताना पडेगा। आपका छोटा भाई.......डीपी मैं उन सभी साथियों का आभारी हूं जिन्‍होंने इर्द-गिर्द पर आकर विचारों को पढ़ा। चर्चा की। हमारे विचारों से सहमति या असहमति जताई लेकिन मेरी गुजारिश है कि ये कारवां, ये तार्किक मंथन जारी रहना चाहिए। शायद किसी बिंदु पर जाकर हम सभी की सहमति बने। कोई रास्‍ता निकले। इसलिए अपने दिल की बात को दबाईए नहीं। खुल कर विचार प्रकट कीजिए। एक बार फिर मैं सभी से क्षमायाचना करता हूं। शायद जाने-अनजाने मुझसे कुछ गुस्‍ताखी हो गई हो।

Monday, September 29, 2008

बटला हाउस के बहाने

बटला हाउस कई दिनों से अखबारों और चैनलों की ही नहीं बल्कि ब्‍लाग जगत की भी सुर्खियों में रहा है। दिल्‍ली में हुए सीरियल ब्‍लास्‍ट के बाद पुलिस ने बटला हाउस में एक मुठभेड़ के बाद दो आतंकवादियों को मार गिराया था़ और एक गिरफ्तार किया था। इसी मुठभेड़ में दिल्‍ली पुलिस का एक इंस्‍पेक्‍टर मोहन चंद शर्मा शहीद हो गया था। ये ब्‍यौरा पुलिस के हवाले से है लेकिन कुछ खबरनवीसों और मानवतावादियों ने पुलिस मुठभेड़ पर कुछ सवाल खड़े किए थे। और ठीक वैसा ही हुआ था जैसे किसी मुठभेड़ के बाद होता है। कुछ दल और राजनेता वोटों के गणित का हिसाब-किताब लगाकर बोलते हैं तो कुछ छुटभैय्ये अपना चेहरा चमकाने के लिए ऐसा कुछ बोलते हैं जिससे उन्‍हें कवरेज मिल जाए। हकीकत ये है कि इन लोगों को न मरने वालों से मतलब होता है और न मारने वालों से। किसी को अपनी खबर बनानी होती है तो किसी को खबरों में रहना होता है।

हर बार चंद चेहरे आतंकी वारदात के बाद चमकते हुए दिखाई देते हैं तो कुछ चेहरे किसी मुठभेड़ के बाद मानव अधिकारों का अलाप या रूदन करते दिखाई देते हैं। हकीकत में ये दिल से कुछ नहीं करते बल्कि ये इनका एक तरह का रोजगार है। शगल है। चमकने की आकांक्षा है। ये कोई नहीं सोचता कि हम अपने मुल्‍क के पढ़े-लिखे नौजवानों को भटकने से कैसे रोकें। क्‍यों ये हथियार उठा रहें हैं। कौन लोग मदारी है जिनके हाथों में ये नौजवान कठपुतलियां बने नाच रहे हैं। सृजन के लिए बने हाथ विध्‍वंस की तरफ कैसे मुड़ रहे हैं। ऐसी हमारे सिस्‍टम में क्‍या खामी है जो इन्‍हें पनपने से रोक नहीं पाती।

दरअसल ये सिर्फ हमारे यहां नहीं है बल्कि पूरी दूनिया ही इस वक्‍त आतंकवाद के महादैत्‍य से जूझ रही है। वह मुल्‍क भी अब इसकी तपिश से झुलस रहें हैं जहां आतकंवाद की पौध तैय्यार हूई। उन महाशक्तियों ने भी इस आग में अपने को झुलसाया है जिन्‍होंने आतंकवाद को अपने हितों के लिए पाला-पोसा। कौन नहीं जानता है कि लादेन को जिसने पाला उसी को लादेन ने अपना सबसे बड़ा निशाना बनाया। अपने हितों के लिए जिन मुल्‍कों ने आतंकवाद की नर्सरी खोली उसी को शिकार बनना पड़ा। लिट्टे भी उन्‍हीं में से एक है। आज अगर दिल्‍ली धमाकों से झुलस रही है तो इस्‍लामाबाद भी लपटों के आगोश में आने से नहीं बच पा रहा। लेकिन हमारा दुर्भाग्‍य ये है कि हम छोटे-छोटे स्‍वार्थों से ऊपर उठकर नहीं देख पा रहे हैं।
हमें शर्म आनी चाहिए। हम बहस कर रहें हैं कि बटला हाउस में इंस्‍पेक्‍टर को गोली दिल्‍ली पुलिस के ही किसी कर्मी ने मारी। गोली कमर में लगी। अंदर से गोली नहीं चली। पुलिस ने आतंक बरपा दिया बटला हाउस में। मैं मानता हूं कि पुलिस की निनायनवे प्रतिशत मुठभेड़ की कहानियां फर्जी होती हैं। लेकिन क्‍या ये संभव है कि पुलिस के वहां पंहुचते ही बटला हाउस के उस कमरे से गोलियां नहीं चलीं बल्कि फूल बरसे होंगे। और ऐसे मौके पर गोली का जबाव सिर्फ और सिर्फ गोली ही होता है। ये किस किताब में लिखा है कि कोई छात्र या कोई वकील, डाक्‍टर या इंजीनियर आतंकवादी नहीं हो सकता।

सोचिए। ये सब करके हम क्‍या वही नहीं कर रहे जो अलगाववादी चाहते हैं। आतंकवादियों के मंसूबे यही तो हैं कि हम धर्म के नाम पर बंट जाएं। विखंडित हो जाएं। कबीलाई युग की तरफ मोड़ने का ये मंसूबा क्‍या हम जाने-अनजाने वोटों की राजनीति के लिए परवान नहीं चढ़ा रहे हैं। ये सही है कि अपराधियों को सजा देने का काम कानून का है। अदालतों का है। लेकिन ये भी सही है कि हम आज तक संसद पर हमला करने वालों को भी सजा नहीं दे पाए हैं। चर्चा में मेरे बहुत से मित्र कहते हैं कि पुलिस बदमाशों को निहत्‍था पकड़ने के बाद मारती है और अपनी बहादुरी दिखाने के लिए मुठभेड़ की फर्जी कहानी गढ़ती है। ये सही है कि पुलिस को मुठभेड़ के नाम पर फर्जी एनकाउंटर की छूट नहीं होनी चाहिए लेकिन क्‍या ये छूट होनी चाहिए कि कोई भी हमारे एक शहीद इंस्‍पेक्‍टर के कर्म पर उंगलियां उठाए। ये कहे कि बटला हाउस के उस फ्लेट में भजन-कीर्तन चल रहा था और पुलिस धमाके कर रही थी और अपनी बात जायज करार देने के लिए ही इंस्‍पेक्‍टर को दिल्‍ली पुलिस ने ही गोली मारी। अगर बटला हाउस में पुलिस चैकिंग करे या किसी संदिग्‍ध की तलाशी ले तो इसमें हाय-तौबा क्‍यों हो रही है। ये देश भर में तमाम जगहों पर होता है। आखिर इससे किसको फायदा हो रहा है।

हमें सोचना होगा कि क्‍या वोटों की राजनीति के साथ क्‍या आतंकवाद से लड़ा जा सकता है।

Saturday, August 16, 2008

भोले के नाम एक पाती

शिव जी के बारे में कहा जाता है जितने गरम उतने ही नरम। सीधे इतने कि नाम के साथ ही भोले जुड़ा है। कल्याण के देवता हैं, दूसरों के हिस्से का हलाहल पीकर भी मस्त रहते हैं। दुनिया के मालिक हैं, लेकिन कुछ लोगों ने उनका नाम कुछ एकड़ ज़मीन की लड़ाई में फंसा लिया है। मेरे जैसे भक्त उनके नाम पर चल रहे तांडव को पचा नहीं पा रहे हैं। उनके कलयुगी गण तो मेरी क्या सुनेंगे, सोचता हूं सीधे भोले से ही बात कर लूं।

भगवन नीचे झांककर तो देखिये

भगवान भोले शंकर कैलाशपति
सादर चरण स्पर्श

आशा है आप कैलाश पर्वत पर या जहां भी कहीं इस वक्त होंगे मां पार्वती, श्री गणेश जी और कार्तिकेय जी के साथ आनंद से होंगे और हम जैसे भक्तों के लिये आनंदमय भविष्य का ग्राफ बना रहे होंगे। लेकिन भगवन मैं आनंद से नहीं हूं। इस बार सावन का मेह ज्येष्ठ-आषाढ से ही बरस रहा है लेकिन मेरा मन रो रहा है। मैंने क्या मेरे जैसे आपके किसी अन्य घनघोर भक्त ने भी आपका तांडव ना कभी देखा है, ना देखना चाहते हैं और ना ही कभी उसके बारे में सोचा है। कल तक तो हम घर के ड्राइंग रुम में रखी नटराज की मूर्ति की भावभंगिमा से ही तांडव का अंदाज़ लगा पाते थे, जिसमें आपके तांडव की महज़ एक अदा नज़र आती है। लेकिन पहले जम्मू और बाद में यानी दो-तीन दिन पहले देश के कई शहरों की सड़कों पर जो कुछ देखा उससे सहज़ अंदाज़ हो गया कि असली तांडव कैसा होता होगा।
भगवान ज़रा नीचे झांककर तो देखिये ज़रा सी ज़मीन के लिये आपके नाम पर आपके कलयुगी गण क्या तांडव मचा रहे हैं। आपने जिन लोगों के लिये दुनिया जहान का ज़हर पी लिया वो आपके नाम पर किस तरह से ज़हर फैला रहे हैं। आप तो कल्याण के देवता हैं लेकिन आपके कलयुगी गण तो उस दिन मरीज़ों को अस्पताल तक जाने से रोक रहे थे। भगवन, उस दिन अंबाला और कानपुर में दो लोग इसलिये यमराज के पास चले गये कि उनको समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने दिया गया। आप तो जीवन देते हैं और आपके कलयुगी गण आपके नाम पर मौत।
भगवान आप तो समंदर से लेकर हिमालय तक सबके मालिक हैं। सौ-पचास एकड़ ज़मीन में तो आपके नादिया के चरने लायक घास भी नहीं उग पायेगी। इतनी सी जगह तो श्री गणेश जी के चूहे के बिल के लिये भी पूरी नहीं होगी। लेकिन ज़रा नीचे झांककर देखिये आपके कलयुगी गण तो उसके लिये कोहराम मचाये हुए हैं। आप वहां नंगे बदन इतनी सर्दी, गरमी, बारिश में हमारे लिये तप करते हैं और आपके कलयुगी गण आपके मंदिर तक की यात्रा को पिकनिक की तरह मौजमस्ती वाली बनाना चाहते हैं। अमरनाथ से भी आजकल जल्द ही रवाना हो जाते हैं, मुझे पता है धर्म और आस्था के नाम पर धंधे की गरमी आपसे बर्दाश्त नहीं होती। आप नाराज़ हैं क्योंकि आपके मंदिर के पास भट्टियां जलाकर छोले भटूरे तले जा रहे हैं, डोसा और चीले बन रहे हैं, पकौड़ियां छानी जा रही हैं, पित्ज़ा बन रहे हैं और दूध फेंटा जा रहा है। और अब खा-पीकर रास्ते में आराम करने के लिये भी तो जगह चाहिये। उस जगह पर बनेगा क्या, ठंडे-गरम पानी के हमाम, शौचालय? यानी दर्शन से पहले और बाद में आराम के लिये आपके नाम पर सब कुछ होगा।
भगवन, ज़रा सी ज़मीन के लिये कोहराम मचाने वाले और उस ज़मीन पर आरामतलबी करने वाले भक्त भी आपके दर पर आयेंगे तो आप उनको भगा तो नहीं देंगे लेकिन कुछ ऐसा चक्कर तो चला सकते हैं कि वो इंसानियत सीख कर लौटें। किसी को जन्म देना तो उनके बस में नहीं होगा लेकिन मौत के हरकारे तो ना बनें।
भगवन, ध्यान रखना। देश का एक हिस्सा जल रहा है। अब कान्हा की तरह लीला करना छोड़िये और अपने कलयुगी गणों की मति फेरिये। बरसों बाद अमन का मौका आया है देश में, उसे बना रहने दीजिये। अगले सोमवार को जब आपके दर्शन करने आउंगा तब आपसे पूछूंगा इस बारे में। इतने सारे लोगों के सामने आप बोलेंगे नहीं मुझे पता है लेकिन मैं तो आपके मन की और मौन की भाषा भी जानता हूं। कलयुग में पैदा हुआ हूं लेकिन कलयुगी नहीं हूं।

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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