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Friday, September 19, 2008

इश्‍क-ए-बुतां!

हमारे एक मित्र हैं। आला अफसर। उल्‍टा पुल्‍टा......न न बाबा, ऐसा नहीं कहते। इसलिए आप चाहें तो उत्‍तम प्रदेश कह सकते हैं।....मैं तो फिलहाल यूपी कहकर ही काम चला लेता हूं। आप कुछ भी ! ...क्षमा कीजिएगा, मैं अपने मित्र की चर्चा करते हुए भटक गया था। मेरे मित्र यूपी से ही हैं। कथाकार-व्‍यंग्‍यकार हैं। सीधी-सपाट बात करते हैं और धारदार लिखते हैं लेकिन शायद इन दिनों थोड़े सहमे हैं। इसलिए, पहली बार वह अपनी पहचान छिपा रहे हैं लेकिन ये उनकी कलम से उनकी अपुन कहिन है।


आई, चली गई। आजकल सरकारें आती ही जाने के लिए हैं। सरकार बहादुर ने सिर्फ दो काम किए थे। वसूली-लक्ष्‍य पूरा किया था.....कर व‍सूली का नहीं, सुविधा-शुल्‍क वसूली का। दूसरा कार्य था राजधानी में विभिन्‍न स्‍थानों में बुत खड़े करने का। इसके अलावा सरकार ने कुछ नहीं किया। विकास कार्य एकदम ठहर गए, समस्‍याएं सुरसा हो गईं, गरीब ज्‍यादा गरीब हो गए।

अगली सरकार आई। उसके संकल्‍प .....पिछली सरकार से दोगुनी कमाई करना और दोगुने बुत बनबाना। प्रतियोगिता प्रदेश के विकास को लेकर नहीं, घूस और बुत को लेकर। सरकार ने चौराहों पर, पार्को में, फुटपाथों पर, ओनों-कोनो में, सार्वजनिक भवनों के सामने और भीतर भी इतने बुत बनवा डाले कि महापुरुषों की किल्‍लत पड़ गई। तब उसने मृत छुटभईयों के बुत खड़े करने शुरू कर दिए। बुत टन-दो टन हैसियत वालों के नहीं किलो-दो किलो हैसियत वाले अनजाने, अनचीन्‍हे, अबूझ, अनाम भूतों ......!

तीसरी सरकार आई। उसका संकल्‍प पिछली सरकार से तिगुनी कमाई करना और तिगुने बुत बनवाना था। सरकार जितनी ऊपरी कमाई करती थी उसी अनुपात से बुत बनवाती थी यानी बुत की गणना कर ऊपरी कमाई का अंदाज लगाया जा सकता था या यूं कहें कि ऊपरी कमाई की जानकारी होने पर बुतों का अंदाजा लगाया जा सकता था। अंकगणित बहुत !

सरकार का चाल-चरित्र-चिंतन ऐसा कि लोगों में भय व्‍याप्‍त हो गया। जाने कब गोली मारकर कह दिया जाए कि 'अमुक जी' ने देश-समाज के लिए शहादत दी है और जीता-जागता व्‍यक्ति किसी चौराहे, पार्क, ओने-कोने या सार्वजनिक भवन में बुत में तब्‍दील हो जाए। लोग अंधेरे-उजेले निकलने में घबराने लगे। बुत देखकर कांप जाते...........कल मेरा भी यही हश्र न हो।

कुछ बात तो है मोमिन जो छा गई खामोशी,
किसी बुत को दे दिया दिल जो बुत बन गए।

सरकार जीवित व्‍यक्तियों के लिए कुछ न करती, पर मृत व्‍यक्तियों की प्रतीक-पूजा के लिए सदैव तत्‍पर रहती। वह लोगों से कहती, ''बुतों को देखो, इनसे प्रेरणा ग्रहण करो।''

लोग कहते, ''हमें बुत के भूत नहीं, रोटी चाहिए। हमारी खुद की जिंदगी बुत शरीकी हो गई है।''

सरकार कहती, ''रोटी? यह तो बहुत सामान्‍य चीज है। उससे कहीं ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण मरे लोगों के बुत हैं जिनमें भावना का मौन दर्शन होता है। इन्‍हें नमन करो, चरण वंदन करो, फूलमाला अर्पित करो। इनसे प्रेरणा ग्रहण करो, प्रेरणा से चेतना जाग्रत होगी, चेतना से सामाजिक न्‍याय मिलेगा, सामाजिक न्‍याय से.......!''

सरकारें आती रहीं, जाती रहीं। लोग भूख से, गरीबी से त्रस्‍त होते रहे। सरकार लोगों को हुतात्‍मा बनाते हुए बुत खड़ी करती रही ........'' एक बुत बनाउंगा और तेरी पूजा करूंगा।'' सारा शहर बुतों से पट गया। सड़क हो या फुटपाथ, चलना मुश्किल। पार्कों में चहलकदमी भी कठिन। कौन-सी जगह जहां जलवा-ए-माशूक नहीं।

लोग दहशत के कारण शहर छोड़कर भागने लगे। शहर में सिर्फ बुत बचे या सरकारी भूत। बुत-लक्ष्‍य पूरा नहीं हो रहा था। सरकार ने तय किया कि वह अन्‍य बस्तियों के लोगों को शहीद कर बुत खड़े होने का लक्ष्‍य पूरा करेगी। ऐसे में आपको सतर्क करना मेरा परम पुनीत कर्तव्‍य है। सरकार के बुत- अभियान में कहीं आपका सिर न आ जाए ........! एवमस्‍तु न !

Saturday, August 23, 2008

कान्हा, चीन ते आए ओ!

कहीं कृष्ण लीला चल रहीं हैं...कहीं माखनचोर की झांकियां सजी हैं। जन्माष्टमी का मौका है। हर बार ऐसा ही होता है लेकिन इस बार कुछ खास बात है।

इस बार कृष्ण जी चाइना से आए हैं। लगता है वो दिन लद गये जब भगवान कृष्ण कुम्हार के चाक और सांचे से निकलकर सज-संवकर आया करते थे..इस बार तो लीलाधर हिमालय के उस पार चीन से आये हैं। यानी बाज़ार की क्या कहें इस बार भगवान श्रीकृष्ण पर भी परदेस की मुहर लग गई। मथुरा के लड्डू गोपाल वाया चीन आ रहे हैं। होली के चमकीले खतरनाक रंगों-पिचकारियों, दीपावली की लड़ियों-पटाखों और गणेश पूजा के गणपति के बाद चीन ने जन्माष्टमी के बाजार पर भी हल्ला बोला है। कल्लू कुम्हार से कहीं ज्यादा बेहतर फिनिशिंग के साथ बारह से बारह सौ रूपये तक के लार्ड कृष्णा अलग-अलग लीलाओं में हमारे एक्सक्लूसिव भक्तों के लिए आर्चीज से लेकर मॉल्स तक में सज गए हैं, जहां अपमार्केट या अपमार्केट दिखने वाली भीड़ अपने-अपने बांके पैक करा रही है। अगर आप इस भीड़ में घुसकर अपमार्केट ज्ञान लेना चाहेंगे, तो आपको कुछ ऐसा सुनाई देगा- "ये माखन चोर बड़े क्यूट हैं....देखो कितने शरारती लग रहे हैं...हमारे मंदिर में बहुत सुंदर लगेगें....चाइनीज हैं न....पैक कर दीजिए"
बात बहुत पुरानी नहीं है...एक समय था जब कुम्हार छह महीने पहले से जन्माष्टमी के लिये मूर्तियां गढ़ना शुरू कर देते थे। मिट्टी को गूंथकर हाथों से या सांचे में डालकर आकार देते...भट्टियों में पकाते और फिर रंग भरकर, कभी-कभी असली नकली मोरपंख लगाकर भक्ति भावना से अपने-अपने गोपालों को सजाते-संवारते थे। लेकिन वक्त का फेर देखिये पहले जहां कुम्हारों के चाल लगते थे वहां अट्टालिकायें खड़ी हो गई हैं। जबसे त्वचा से उम्र का पता ना लगने देने की जिद सामने आई है काय चिक्तिसा के लिये मिट्टी भी पैकेट में मिल रही है। अब ना मिट्टी है, ना कुम्हार हैं और न ही परंपरागत बाजार। जब हमारे कर्णधारों को सामाजिक सुरक्षा की सुध ही न रही तो हमारे कुम्हार कलाकारों की कला और बाजार कैसे बचता। आज हम ग्लोवल बिलेज में जीते हैं। हमें बेहतर क्वालिटी और क्यूट दिखने वाले गोपाल चाहिएं। लेकिन सोचिए कि हमारी सरकार अगर हमारे भगवान को आयात करने का अधिकार ही न दे तो क्या हमारे परंपरागत कलाकारों का रोजगार छिनने से नहीं बच जाएगा। क्या ऐसे क्षेत्रों में आयात की अनुमति देने और हमारे मूर्तिशिल्पियों को सल्फास की गोली खिलाने में कोई फर्क है। क्या हम केवल ग्रोथ रेट और सेंसेक्स को ही प्रगति का पैमाना मानकर ढोल पीटते रहेंगे। सामाजिक सुरक्षा के लिए क्या हम सिर्फ चुनावी कार्यक्रम चलाकर अपना उल्लू सीधा करते रहेंगे। ऐसे अनगिनत सवाल हैं जिसका जबाव हमें सामूहिक रूप से मांगना और खोजना होगा।
लेकिन घबराने की बात नहीं ये चीन वाले कान्हा को सजा तो खूब देंगे लेकिन उस मूर्ति में मिट्टी की वो सोंधी खुशबू कहां से लाएंगे जिसे दूर से ही सूंघकर दादी कहती थी बेटा, इस बार बड़ी जल्दी आ गये लड्डू गोपाल। वो खुशबू वो मुंह पर लगा माखन..गो ना मिले चीन में गो तो नंदलाला ये हीं मिलेगो जमुना किनारे गंगा किनारे। और सुनी गे प्लास्टिक के रसिया आंखन में तो उतर सकें हैं दिल में कैसे उतरेंगे। छोड़ों रसियाए या चक्कर में मत फंसाओ चीनेऊ कछु खानपीन देओ ओलिंपिक में बलाय पैसा खर्च करो है भैया।

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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