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Monday, January 26, 2009

गणतंत्र : घूंघट से निकले एक चेहरे के बहाने

मुझे इस गणतंत्र दिवस पर कई चेहरे याद आ रहे हैं। मेरे मन मस्तिष्‍क में उमड़-घुमड़ रहे हैं। इनमें से कुछ चेहरे देश के हैं, कुछ विदेश के और कुछ मेरे अपने शहर के। इनमें से कुछ आकृतियां मेरी मां जैसी हैं, कुछ बहिनों जैसी, कुछ सखियों जैसी और कुछ अंजान। ये तस्‍वीरें तो अलग-अलग हैं लेकिन इन उमड़ते-घुमड़ते चेहरों को मिलाकर जो आकृति बन रही है, उससे ठिठुरन और सिहरन बढ़ जाती है। मैने गणतंत्र के उनसठ साल तो अपनी आंखों से नहीं देखे लेकिन होशो-हवाश में पच्‍चीस सालों के बीच देखे गए कई चेहरे हैं। इनमें से मैं अपने ही शहर मेरठ के एक चेहरे का जिक्र कर रही हूं जो मेरे दिमाग को सबसे ज्‍यादा झकझोरता है।
ये चेहरा उस युवती का है जिसे मैने करीब बीस साल पहले गज भर घूंघट में चूल्‍हे पर रोटियां सेकते देखा था। टोकरा भर रोटियां सेकती, मुंह में फूंकनी लगाकर चूल्‍हे को हवा देती, चूल्‍हे से निकल रहे धुंए को अपनी आंखों में समाती यह युवती आज खुली हवा में उड़ान भर रही है। उत्‍तर प्रदेशीय महिला मंच के एक कार्यक्रम के सिलसिले में मैने जब पहली बार संगीता राहुल (या कहिए कि उनके पति जगदीश, जो उस समय सभासद थे।) के घर दस्‍तक दी तब संगीता का यही रूप था। मेरे निमंत्रण पर उनके पति ने संगीता को मंच के कार्यक्रम में शामिल होने की अनुमति दी और धीरे-धीरे उसका घूंघट उठता चला गया। बाद में अपने वार्ड से संगीता सभासद चुनी गई और फिर उसने विधायक का चुनाव भी लड़ा। संगीता एक ऐसा चेहरा है जिसने हमारे साथ अपना सफर शून्‍य से शुरू किया और फिर आगे की गिनतियां गिनने का सिलसिला अनवरत जारी रखा। भले ही संगीता ने अपनी दिशा को राजनीतिक दिशा दे दी हो। महत्‍वाकांक्षाओं के पंख लग गए हों लेकिन फिर भी वह हमारे गणतंत्र का एक ऐसा चेहरा है जिसने परिस्थितियों की चाहरदीवारी लांघकर उड़ना सीखा, सपने देखे और खुली हवा में सांस ली। मैं सोचती हूं कि आज भी हमारे इर्द-गिर्द की कितनी ऐसी महिलाएं हैं जिनके पति उन्‍हें गज भर घूंघट से निकलने की इजाजत देते हैं। अगर हम मुट्ठी भर शिक्षित परिवारों को छोड़ दें तो आज भी बहुतायत में ऐसी महिलाओं की ही संख्‍या ज्‍यादा है जिन्‍होंने अपने हौंसलों और अरमानों को चाहरदीवारी में कैद कर लिया है या वे इसके लिए अभिशप्‍त हैं। आजाद भारत में आज भी अधिकांश स्त्रियां दासी हैं। सामाजिक ढांचे में उनकी जुबान बंद रहती है और देह व मस्तिष्‍क हमेशा उत्‍पीड़ने के लिए तैयार।
ऐसा नहीं कि महिलाओं के उन्‍नयन के लिए हमारे देश की संसद ने कानून न बनाए हों। कुप्रथाओं व उत्‍पीड़न रोकने के लिए कागजों और किताबों में स्‍त्री सुरक्षा का चेहरा चाक-चौबंद है; पर हकीकत में तमाम कानूनों के बावजूद स्त्रियों को अपने वजूद की लड़ाई लड़नी पड़ती है। वास्‍तविकता तो ये है कि स्‍त्री सबसे पहले अपने गर्भ में लड़की के लिए जगह ढूंढती है। सामान्‍यत: सब पहले लड़का ही चाहते हैं। अधिकांश घरों में भी तो लड़कों को ही वरीयता मिलती है। मुद्दा चाहे खानपान का हो, रहन-सहन का या शिक्षा का; परिवारों में इस तरह का भेद लड़कियों को मन ही मन छोटा कर देता है। यह विडम्‍बना ही है कि वैज्ञानिकों द्वारा यह स्‍थापित किए जाने के बाद भी लड़का या लड़की होना पुरूष के योगदान पर निर्भर करता है, बेटिया पैदा करने के लिए स्‍त्री ही प्रताडि़त होती है। किसी ने ठीक ही लिखा है कि दुनियां में अगर न्‍याय का कोई एक विश्‍वव्‍यापी संघर्ष है तो वह नारी के लिए न्‍याय का संघर्ष है। अगर किसी एक मुद्दे पर हर सभ्‍यता, हर परंपरा का दामन दागों से भरा है तो वह स्‍त्री की अस्मिता का मुद्दा है। इस न्‍यूनता का एहसास भी हर समाज के अवचेतन में मौजूद है। पुरूष विधुर हो या तलाकशुदा, कोई अंतर नहीं पड़ता। उसे दूसरी शादी करने में समस्‍या का सामना नहीं करना पड़ता जबकि स्‍त्री की परिस्थितियां विपरीत होती हैं।
यदि शास्‍त्रार्थ में न जाएं तो इतना बताना जरूरी है कि किसी भी स्‍त्री के व्‍यक्तित्‍व का अधिकार किसी भी धर्म, सभ्‍यता या समाज-व्‍यवस्‍था की कृपा का परिणाम नहीं हैं। उल्‍टे स्‍त्री के स्‍नेहमयी और ममतामयी व्‍यक्तित्‍व का हनन हर सभ्‍यता का सबसे बड़ा खोखलापन है। हर देशकाल में स्‍त्री को नए सिरे से अपने लिए जगह बनानी पड़ती है। स्‍त्री के पास निर्णय लेने की क्षमता न होने की वजह से परिवारों में सारे फैंसले पुरूष ही करते हैं।
स्‍त्री की रक्षा के लिए कानूनों का जो कवच दिया गया है वह नई चुनौतियों के आगे अपने को लाचार पा रहा है। सिर्फ कानूनों के भरोसे निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता। वे कानून ठीक तरह से लागू हों; इसके लिए सजग रहने की जरूरत सबसे ज्‍यादा है।
मेरा यह लेख दैनिक आई नेक्‍स्‍ट में प्रकाशित हुआ है।

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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