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Sunday, December 26, 2010

अलविदा 2010......स्‍वागत 2011....!!!

किससे गिला...किससे और कैसी उम्‍मीदें

तो सन २०१० हमसे हाथ छुड़ा कर विदाई मांग रहा है। जब आया था तो कोई बहुत बड़ी उम्मीदें नहीं बांधी थी हमने इससे। हां, मन में इच्छा जरूर थी कि काश यह साल पिछले गुजरे सालों से बेहतर साबित हो। घृणा, नफरत,हिंसा-प्रतिहिंसा, आतंकवाद, अलगाववाद से कुछ तो मुक्ति मिले हमें। वैमनस्य की काली आंधी कहीं तो जाकर रुके। तरक्की की होड़ में शामिल होकर कहीं भी, कुछ भी करने को आतुर इंसान एक क्षण रुक कर कुछ तो सुस्ताये, कुछ तो सोचे। एक-दूसरे को खूब दुआएं-शुभ कामनाएं दीं। एस.एम.एस किए, कार्ड भी भेजे लेकिन जैसी औपचारिकताएं , वैसे ही परिणाम भी मिले। कुल मिला कर किसी तरह यूं ही गुजर सा गया यह साल।
हां! थोड़ी और तरक्की कर ली हमने। भ्रष्टाचार के मामलों में नए मानदंड स्थापित किए। लूट, हत्या, बलात्कार के मामलों में भी नए नए रिकॉर्ड बनाए। निरीह औरत की हत्या कर उसकी लाश के टुकडो को तंदूर से डीप फ्रीजर तक पंहुचा दिया; और इसमें न हमारे हाथ कांपे न ही आत्मा। राजनेताओं ने घृणा की खाईयों को पाटने की जगह और चौड़ा करने का अपना दायित्व बखूबी निभाया। मंहगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर राजनीतिक विचारहीनता और संवेदनशून्यता में और बढ़ोतरी की । अमीर और अमीर हुए; गरीब और गरीब। स्विस बैंकों में हम भारतियों का काला धन कुछ और बढ़ गया। साथ ही हर भारतीयों पर विदेशी कर्ज की मात्रा भी और बढ़ गई। दुनिया की तीसरी बड़ी महाशक्ति के रूप में उभर रहा भारत भुखमरी से लड़ने के मामले में ८४ देशों की सूची में ६७वें स्थान पर आ गया। बाल मृत्‍यु दर के मामले में हम पहले से ही सबसे ऊंची पायदान पर हैं, निरक्षता के मामले में दुनिया के ३५% हो गए। ग्लोबल पीस इंडेक्स में छह और पायदान फिसलकर १२८वे स्थान पर आ गए। यह तरक्की थोड़ी है क्या खुश होने के लिए! यूं खुश होने के लिए कुछ बातें और भी हैं। शायद इसलिए कुछ और भी ज्यादा क्योंकि ये हमारे खंडित अभिमान को सहलाने का थोडा बहुत माद्दा भी रखती है। मसलन - विश्‍वमहाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा। उल्लेखनीय है कि जहां पहले अमेरिका की छवि 'दाता' की रही थी वहीं ओबामा की यात्रा के समय भारत और अमेरिका के सम्बन्ध बराबरी के स्तर पर प्रगाढ़ होते दिखे। भारत के अपने स्वार्थ हैं तो अमेरिका भी अपनी अर्थव्यवस्था में आए ठहराव को तोड़ने के लिए भारतीय बाजार में अपनी पहचान बढ़ाने को लालायित है और अपने यहां भारत के निवेश की आवश्यकता अनुभव कर रहा है। इसके अतिरिक्त विश्व और एशिया की अन्य महाशक्तियों जैसे - ब्रिटेन, जर्मनी ,पोंलेंड, रूस और अभी हाल ही में चीन के राष्ट्राध्यक्षों की भारत यात्रा को इसी कड़ी में जोड़कर देखा जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई एम ऍफ़) में भारत १० सदस्य देशो में सम्मिलित हो गया है। जिस भारत को अभी कुछ वर्ष पहले देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए अपने सोने का रिजर्व भंडार विदेशों को गिरवी रखना पड़ा था, आज उसके पास अपना स्वयं का १८००० टन सोना है जो संपूर्ण विश्व का ११% से अधिक है। है न खुश होने की बात! भारत गरीबों का देश है मगर यहां दुनिया के सबसे बड़े और ज्यादा अमीर बसते हैं। स्विस बैंक एसोसिएशन ने खुलासा किया है कि उसके बैंकों में भारतियों के कुल ६५,२२३ अरब रूपये जमा हैं और इस मामले में हम भारतीय अव्वल हैं। स्विटजरलैंड तो केवल एक देश है, इसके अतिरिक्त भी कई देशों में भारतियों का काला धन जमा है। ये देश वे देश हैं जहां की सरकारें इस तरह की कमाई जमा करने के लिए प्रोत्साहन देती हैं। जाहिर है यह काला धन भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, आई ए एस , आई पी एस जैसे अन्य प्रशासनिक अधिकारियों और उद्योगपतियों का ही होगा। यहां यह बताना तर्कसंगत होगा कि स्विस बैंको में जमा यह धन हमारे जी डी पी का ६ गुना है। अगर यह धन देशमें वापिस आ जाए तो देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की बल्ले-बल्ले हो जाएगी। प्राप्त आंकड़ो के अनुसार भारत को अपने लोगों का पेट भरने और देश को चलाने के लिए ३ लाख करोड़ रूपये का कर्ज लेना पड़ता है। यही कारण है कि जहाँ एक ओर प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है वहीं प्रति भारतीय पर कर्ज की मात्रा भी बढती जा रही है । एक अरब से अधिक आबादी और ३७% गरीबी के बीच भारत के हर नागरिक पर लगभग ८५००/- रूपये का विदेशी कर्ज है। जी हां! भारत में अगर बच्चा जन्म लेता है तो वह ८५०० रूपये के विदेशी कर्ज से दबा होता है। यदि स्विस बैंको में जमा धन का ३०-३५ प्रतिशत भी देश में आ गया तो हमें आई एम एफ़ या विश्व बैंक के सामने कर्ज के लिए हाथ नहीं फ़ैलाने पड़ेंगे। यदि यह सारा धन भारत को मिल जाता है तो देश को चलाने के लिए बनाया जाने वाला बज़ट बिना टैक्स के ३० साल के लिए बनाया जा सकता है। स्विस बैंको में जमा धन का २५-३०% भी अगर देश को मिल जाए तो २० करोड़ नई नौकरियां पैदा की जा सकती हैं। यानी बहार ही बहार। पल भर में देश से गरीबी दूर।
बात तरक्की की रफ़्तार पर गर्वित होने की हो रही है तो यह भी जानते चलें कि अमेरिकी बिजनेस पत्रिका फ़ोर्ब्स के अनुसार २०० एशियाई कम्पनियों में ३९ भारतीय कंपनियों ने जगह बनाई है। इस सूची में सबसे ज्यादा ७१ कंपनियां चीन व हांगकांग की हैं। भारत दूसरे स्थान पर है। इसी क्रम में फोर्चून-५०० की सूची में भी ८ भारतीय कम्पनियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। भारतीय उद्योगपति धड़ाधड़ विदेशी कंपनियों को खरीद रहे हैं और दुनिया को बता रहे हैं की हम किसी से कम नहीं। अब कंपनियां और उद्योगपति कमा रहे हैं तो सरकार भी क्यों पीछे रहे। सरकार को जहाँ 3 जी स्पेक्ट्रम सेल से ६७,७१९ करोड़ की राशि मिली है तो ब्रॉड बैंड नीलामी से ३८००० करोड़ की कमाई हुई है। साथ में सरकार के मंत्रियों-संतरियों के हाथ भी तर हो गए वह अलग। और शराब से जो कमाई सरकार को होती है, उसे कौन नहीं जानता। उसको छोड़ा भी नहीं जा सकता। चाहे एक पूरी की पूरी पीढ़ी ही उसमे क्यों न डूब कर बर्बाद हो जाए।
कुछ महान व्यक्ति भी इस वर्ष में जोर-शोर से उभरे। भ्रष्टाचार में रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन के लिए सबसे ऊपर रहे दूरसंचार मंत्री ए.राजा। २ जी स्पेक्ट्रम घोटाला (१.७६ लाख करोड़ रूपये) , सुरेश कलमाड़ी(कोमन वैल्थ गेम घोटाला) ,अशोक चौहान (मुख्य मंत्री -महाराष्ट्र, आदर्श सोसाइटी घोटाला) , एस येदुरप्पा (मुख्यमंत्री, कर्नाटक), सौमित्र सेन(पूर्व न्यायाधीश , कोलकोता हाईकोर्ट), ललित मोदी (पूर्व अध्यक्ष-आई पी एल ) शशि थरूर आदि-आदि। इन सभी महान आत्माओं को एक अरब से अधिक भारतीयों का कोटि-कोटि नमन। लेकिन कुछ ऐसे भी नाम रहे जिन्होंने विश्व मानचित्र पर अपने नाम के साथ-साथ अपने देश का नाम भी अंकित किया। इनमे प्रसिद्ध बांसुरी वादक श्री हरी प्रसाद चौरसिया (संगीत में योगदान के लिए फ़्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'शेवेलियर डेंस ला आर्दरी देस आर्ट्स एंड देस लेटर्स') , मुकेश अंबानी 'एशिया सोसाइटी का ग्लोबल विजनअवार्ड', नंदन नीलेकनी-येल विश्वविद्यालय का सर्वोच्च सम्मान 'लीजेंड इन लीडरशिप', और नि:संदेह कॉमंवेल्थ और एशियन गेम्स में अपने बलबूते पर विजयी हुए। कुछ खिलाडी जिन्होंने हमें गर्वित होने का कुछ अवसर प्रदान किया। २०१० के जाते-जाते सचिन तेंदुलकर ने टेस्ट मैचों में अपना ५० वा शतक ठोक कर दुनिया के नक़्शे पर नए चिन्ह अंकित कर दिए। लेकिन उनका महत्व इन ५० टेस्ट शतको से अधिक इसलिए है कि उन्होंने इससे पहले करोड़ो का ऑफर ठुकरा कर शराब के विज्ञापन में काम करने से इंकार कर दिया था। और इस लिए भी कि उनको संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कार्यक्रम का नया सदभावना राजदूत बनाया गया है। इसके अतिरिक्त डॉक्टर तथागत तुलसी जिन्होंने महज २२ साल की उम्र में ही आई आई टी मुंबई में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने का सबसे कम उम्र का रिकॉर्ड बनाया। डॉक्टर तुलसी ने पिछले दिनों इंडियन इंस्‍टीटयूट ऑफ़ साइंस, बेंगलुरु से पी.एच.डी.कर भारत का सबसे युवा पी एच डी होल्डर होने का रिकॉर्ड बनाया था। साथ ही उल्लेख किया जाना चाहिए प्रसिद्ध गणितज्ञ आंनंद का जिनके द्वारा स्थापित कोचिंग संस्थान सुपर-३० को अमेरिका की प्रतिष्ठित टाइम मैग्‍जीन ने एशिया का सर्वोत्तम स्कूल माना है। बीते वर्ष यहाँ के सभी ३० विद्यार्थी आई आई टी प्रवेश परीक्षा में सफल रहे थे। कभी पैसे की कमी के कारण उच्च शिक्षा के लिए निमंत्रण के बावजूद कैम्ब्रिज विश्वविधालय नहीं जा सके आनंद ने १९८६ में रामानुजम स्कूल ऑफ़ मैथ्स की स्थापना की, जहां निर्धन मेधावी बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है। यहीं एक और नाम जो उम्मीद की कई अजीम किरणे एक साथ जगाता है , वह है विप्रो के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी का। कार्पोरेट जगत के इस महारथी ने एक बार फिर दो अरब डॉलर मूल्य के शेयर अपने एक धर्मार्थ ट्रस्ट को दान कर दिए। इस धन से यह ट्रस्ट शिक्षा सेवाओं का विस्तार करेगा। क्या मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, लक्ष्मी मित्तल, रूइया भाई , के पी सिंह और सुनील मित्तल तक यह समाचार नहीं पहुंचा होगा। ये लोग भी इस तरह का कुछ सोचेंगे या सिर्फ अपने साम्राज्‍य को अपने लिए ही बढ़ाने में लगे रहेंगे।
लौटकर एक बार फिर रुखसत होने को आतुर 2010 पर आते हैं। बढ़ते हुए लूट, हत्या , बलात्कार, हिंसा-प्रतिहिंसा, आतंकवाद और अलगाववाद की और लौटते हैं। क्या कुसूर है 2010 का! बोते क्या आ रहे है हम! फिर अच्‍छा काटने का सोचे भी किस उम्‍मीद से। स्वतंत्रता के बाद से ही निरंतर गिरने का सिलसिला जारी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, नैतिकता, देश प्रेम ,संस्कृति , मर्यादा, संवेदना और करुणा आदि सारे मानवी मूल्य भूल गए हैं हम। हर मोर्चे पर विफल। जरा अपने बच्चों से पूछ कर देखें कि कितना जानते हैं वे महात्मा गाँधी, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, सुभाष चंद बोस, गोपाल कृष्ण गोखले और लाला लाजपत राय के बारे में। महाराणा प्रताप, शिवाजी और रानी लक्ष्मी बाई तो इतिहास की परतों में कहीं बहुत दूर गुम हो गए हैं उनके लिए। राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान में अंतर पता है उन्हें। अंतर नहीं पता, अर्थ ही पता है क्या। भौतिकवाद और आर्थिक समृद्धि की अंधी दौड़ में शामिल हम लोग आखिर क्या उदाहारण स्थापित कर रहें हैं नई पीढ़ी के सामने। रोल मॉडल कौन हैं उनके आज । 'आदर्श' शब्द अपना अर्थ तो खो ही चुका है, अब अपना अस्तित्व ही न खो बैठे। क्योंकि आज की पीढ़ी अपने रोल मॉडल इतिहास से नहीं वर्तमान से उठा रही है। ये वे चेहरे होते हैं जो आज तो चमकते दिखाई देते हैं लेकिन अगले ही पल उन्हें दरकते भी देर नहीं लगती। अपने बच्चों के लिए समय नहीं है आज हमारे पास। हां, सुख सुविधा के नाम पर सब कुछ देने को तैयार हैं हम उन्हें। कंप्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से यह सब कुछ हासिल भी हो रहा है उन्हें,शायद कुछ ज्यादा ही; वह भी समय से पहले। यही कारण है कि अब न उनके पास धैर्य है, न संयम, और न ही सोचने समझने का समय। जो भी हासिल करना है, अभी हासिल करना है, एकदम, बिना समय गंवाए। और इस हासिल करने के बीच में जो भी आएगा, उसे हटा दिया जाएगा या मिटा दिया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय, सामाजिक और पारिवारिक स्तर तक एक अजीब सी आपाधापी मची हुई है और हम सब शामिल हैं इसमें। बड़े राष्ट्र अपने स्वार्थों के लिए छोटे राष्ट्रों को मोहरा बना रहे हैं तो देश में राजनितिक पार्टियां एक दूसरे की टांगे खींच रही हैं। सरकार संवेदनाशून्य और दायित्वहीन है तो विपक्ष दिग्भ्रमित। जनता इनके लिए खिलौने से बढ़कर कुछ नहीं। आज हम खेल रहे हैं कल तुम खेल सको तो खेल लेना। अपना स्वार्थ पहले है देश, समाज कहीं पीछे छूट गए हैं। अपने गिरेबान में झांकने की न जरूरत हैं, न फुर्सत है किसी को। हम से बड़ा संत कोई नहीं है और तुम से बड़ा भ्रष्टाचारी कोई नहीं, यही सिद्ध करने में लगे हैं सब। दामन दागदार हैं, चेहरे कालिख पुते, पर मान कैसे लें। तुम कौन से दूध के धुले हो जो मेरे दामन के दाग दिखा रहे हो। सब कुछ सामने है, स्पष्ट है पर स्वीकार कैसे कर लें। और यही सब आगामी पीढियां देख रही हैं, समझ रही हैं, सीख रही हैं। हम खुश हैं तरक्की कर रहे हैं न। विकासशील से विकसित देश में तब्दील होते जा रहे हैं। इतना कुछ दे कर जा रहा है तू हमें २०१०। शुक्रिया ....
शुभकामनाएं २०११ के लिए भी देना चाहता हूं , पिछले वर्षों की तरह इस बार भी। कुछ नैतिक मूल्य स्थापित हों, कुछ संवेदनाएं जागें। अन्याय, अनाचार पर कुछ अंकुश लगे, महंगाई कुछ कम हो। और इन दुआओं में कुछ असर है , थोड़ा सा यकीन भी आ जाए।

ये मंजिलों का सफ़र है यकीन तो आए
हंसी ख़ुशी की डगर है यकीन तो आए
मैं आज करता हूं तेरे लिए दुआ लेकिन
मेरी दुआ में असर है यकीन तो आए

और अंत में बकौल शाहिद मीर उस ऊपर वाले से सिर्फ इतनी चाह है २०११ में आपके और अपने लिए -

ऐ खुदा रेत के सहरा को समंदर कर दे
या छलकती हुई आंखों को ही पत्थर कर दे
और कुछ तो मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पाँवों के बराबर कर दे

Tuesday, October 21, 2008

लोगों का काम है कहना




शिक्षाविद और साहित्‍यकार राधा दीक्षित ने लोक साहित्‍य पर काफी काम किया है। हिंदी और अवधी के लोकगीतों और लोकमुहावरों पर उनकी शोधपरक पुस्‍तकें काफी चर्चित रहीं हैं। भारी-भरकम शब्‍दों से भरा एक संस्‍मरण उन्‍होंने बड़े स्‍नेह से इर्द-गिर्द के लिए भेजा है। पढिए, संस्‍मरण में छिपी वेदना को समझिए।






ऊंच चबूतरा तुलसी का बिरवा
तुलसी का बिरवा
तुलसा जमीं घनघोरे न.....

भोपाल में अवधी का ये लोकगीत सुनकर पुलकित हुई ही थी कि कानों में सीसा उड़ेलती कर्कश ध्‍वनि टकराई, ' आजकल के फैशन की बलिहारी। सुखी-सुहागिन हैं, पर हाथों में देखो तो क्‍या लटकाएं हैं, कांच की चूडियों से जैसे वैर है वैर।'

फुसफुसाहट से आहट होकर उनकीं निगाहों का अनुगमन करती हुई मेरी दृष्टि बाईं और बैठी, अनुपम सौंदर्य की स्‍वामिनी भद्र महिला पर पड़ी। निगाहें थमीं की थमी रह गईं। बैठने की मुद्रा कितनी प्रभावशाली है। मृदु, मधुर स्‍वर, एक-एक शब्‍द मोती जैसा झरता हुआ! उनके बारे में जानने की इच्‍छा बलवती हो उठी।

हां मैं भोपाल से आई थी अपने एक पारिवारिक मित्र के समारोह में। महिला-संगीत का कार्यक्रम चल रहा था। जलपान के बाद मैनें उनसे मिलने का बहाना ढूंढ ही लिया। उनके हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘ कितनी प्‍यारी हैं आप और कितने प्‍यारे हैं कंगन हैं आपके।‘ उन्‍होंने मेरे कंधे थपथपाते हुए कहा, ‘अक्‍सर तो इनके लिए आलोचना ही सुननी पड़ती है। अच्‍छा लगा तुमसे मिलकर।‘ मन में कौंधा, अच्‍छा तो ये अपनी आलोचना से बेखबर नहीं हैं। बातें शुरू हुईं तो रवर की के मानिंद खिंचती चली गईं। उन्‍होंने बताया, मेरे भैय्या की नियक्ति फिरोजाबाद में हुई। मन में सतरंगी सपने जाग उठे। चूडियों का शहर फिरोजाबाद। ढेर सारी चूडियां लाउंगी। रंग-बिरंगी, हर साड़ी, हर सूट से मेल खाती। एक दिन मैं फिरोजाबाद पंहुच गई। भईया उच्‍चाधिकारी हैं। मेरे उगमते उत्‍साह को देखकर उन्‍होंने चूड़ी कारखाने को देखने का भी प्रबंध करवा दिया। मैं उत्‍साह से भरपूर एक-एक चीज को देख रही थी, कैसे वे कांच को पिघलाते हैं, कैसे कांच की लंबी-लंबी लटें बनाते हैं, कैसे उन्‍हें काटकर विभिन्‍न रंग-रूप देते हें। मैं शिशुवत उत्‍साह से सब देखती रही। जब उन्‍होंने मेरी उंगलियों की नाप के कांच के बने छल्‍ले दिए तो उन्‍हें पहनकर कांच की उष्‍मा देर तक महसूस करती रही। साथ के लोग कारखाने के एक-एक विभाग को दिखलाते रहे और धीरे-धीरे मेरे सामने एक नया रहस्‍य खुला। वहां बच्‍चे, बूढ़े, हर आयु वर्ग के लोग काम कर रहे थे। पता चला कि यहां के मजदूर असमय ही बुढ़ा जाते हैं और काल के ग्रास बन जाते हैं। कांच से चूडियां बनाने की प्रक्रिया में उत्‍सर्जित गैसों से उन्‍हें यक्ष्‍मा यानी टीवी जैसे राजरोग हो जाते हैं। यह देख-सुनकर मेरा मन वितृष्‍णा से भर उठा। पहले चूडियों भरे हाथों पर मैं इतराती घूमती थी। अब वही हाथ नौ-नौ मन के भारी लगने लगे थे।

उसी समय निर्णय ले‍ लिया, अब कांच की चूडियां नहीं पहनूंगी। पर निर्णय क्‍या इतना सरल था। सासू-मां चाहती थीं कि उनकी इकलौती बहु भर-भर हाथ चूडियां खनकाती और पायल बजाती घर-आंगन में दौड़ती फिरे। मन कचौट रहा था। हिम्‍मत करके मैने पतिश्री से पूरी बात बताते हुए कहा, ‘तुमहीं बताओ, मैं क्‍या करूं?’ पतिश्री ने मेरा हमेशा मान रखा है, साथ दिया है। बोले, ‘रंजना, तुम्‍हारा जो मन हो करो। अम्‍मा जी को मैं समझा लूंगा।‘ मैं अपनी सासू-मां की आजीवन ऋणी रहूंगी कि उन्‍होंने इस विषय को कभी उठाया नहीं। तब से आज तक मैंने कांच की चूडियां नहीं पहनीं।

बड़ा सा टीका लगाए उस अपूर्व सौंदर्य की स्‍वामिनी को मैं निहारती रहो। कितनी करूणा छिपी है इस छरहरी काया में। लोगों का क्‍या! लोगों का काम है कहना!

Saturday, October 11, 2008

जुग –जुग जियो समाजवाद !

रामेश्‍वर काम्‍बोज 'हिमांशु' ने हमें बत्‍तीस साल पहले लिखी गई एक कविता भेजी है। लघुकथा लेखन में सक्रिय रामेश्‍वर की ये कविता आज और अधिक प्रासंगिक है। उन्‍होंने ये कविता तब लिखी थी जब वह उत्‍तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के एक हाई स्‍कूल में शिक्षक थे। देश की तत्‍कालीन परिस्थितियां डरा रहीं थीं लेकिन तब से अब तक लंबी यात्रा तय कर चुके रामेश्‍वर काम्‍बोज 'हिमांशु' मानत हैं-- "आज से 32 साल पहले बेईमान आदमी सबकी आँखों में खटकता था; आज ईमानदार आदमी सबकी आँखों का काँटा बन जाता है ।"
 
 
भ्रष्टाचार, ब्लैक मार्केट ,गुण्डागर्दी जिन्दाबद !
जुग–जुग जियो समाजवाद !
कालूराम जी ने एक दिन ,बहुत मुझे ये समझाया ।
काले धन और काले तन की बहुत पूछ ये बतलाया।।
काले थे कृष्ण जी देखो दुनिया में पूजे जाते ।
काला धन कमाने वाले ईश्वर से न घबराते ॥
भेंट और पूजा लिए बिना,
अफ़सर भी सुनता नहीं फ़रियाद।
जुग–जुग जियो समाजवाद !
पुलिस डकैती में शामिल है ,नेता जी ऐसा हथियार।
सत्य और न्याय की हत्या करने में हरदम तैयार ॥
खाने –पीने की चीज़ों में भी मिलावट का है राज ।
धन कमाना सेवा करना एक पंथ और दो-दो- काज ।।
घूम रहे सड़कों पर नंगे
रिश्वत रानी और अपराध
जुग–जुग जियो समाजवाद !
बिना सहारा लिये चमचों का हो नहीं पाता कोई काम।
स्वर्गलोक की बात दूर है,सिफ़ारिश से मिलता नरकधाम ॥
दफ़्तर में जाकरके देखो-बड़े बाबू जी ऊँघ रहे ।
उनके गुर्ग़े हर असामी की जेबों को सूँघ रहे ॥
जो हो रहा सो ठीक हो रहा,
क्योंकि अब भारत आज़ाद ।
जुग–जुग जियो समाजवाद !
(रचनाकाल :29 जून 1974)

Sunday, October 5, 2008

कहां तक जाएंगे हम

ये कविता मैने करीब बीस साल पहले तब लिखी थी जब मेरठ दंगों की आग में झुलस रहा था। तब से अब तक मैने कई मेरठ झुलसते देखे हैं। गोलियां और मारक हुई हैं और बमों के फटने का सिलसिला थम नहीं रहा है। इस कविता में मैने जो सवाल बीस साल पहले उठाए थे वह आज और भयावह हो गए हैं। उम्‍मीद है आप इस कविता को गुनेंगे और मेरे दुख में शरीक होंगे।


कर्फ्यू, गोलियां बम
कहां तक जाएंगे हम
आंचल में खून मां के
अश्‍कों से आंख है नम
कहां तक पाएंगे गम
कहां तक जाएंगे हम

कर्फ्यू गोलियां बम
कहां तक जाएंगे हम

ये किताबें, ये धर्मस्‍थल
सब हो रहें हैं मक़त़ल
लिखें आदमी की किस्‍मत
कानून और राइफल
सबकी निगाह में दौलत
और बारूद पे कदम

कर्फ्यू गोलियां बम
कहां तक जाएंगे हम

खेतों और खलिहानों में
सुरक्षा नहीं मकानों में
देश कहां है, पता नहीं
सब कुछ बंद बयानों में
रोजी रोटी सुख और गम
राजा रानी आप और हम

कर्फ्यू गोलियां बम
कहां तक जाएंगे हम

Thursday, August 28, 2008

वोट और सत्ता के चक्रव्यूह में फँसी हिंदी

हिंदी दिवस के कार्यक्रमों के शुरु होने से पहले डा0 मान्धाता सिंह ने हिंदी को लेकर कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं। पेशे से पत्रकार मान्धाता ने सवाल उठाया है कि आंकड़ों में हिंदी कब तक पूरी दुनिया में दूसरे नंबर की सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा बनी रहेगी? क्या रोजी रोटी भी दे सकेगी हिंदी? सरकारी ठेके पर कब तलक चलेगी हिंदी? देश की अनिवार्य संपर्क व शिक्षा की भाषा कब बन पाएगी हिंदी। आ रहा है चौदह सितंबर को हिंदी दिवस मनाने का दिन। आप भी हिंदी के इन ठेकेदारों से यही सवाल पूछिए। हो सकता है कि हम और आप सभी तर्कों से सहमत न हों लेकिन यह सही है कि आज जरूरत है हिंदी को लेकर सही दिशा में एक स्वस्थ परिचर्चा की। आप भी इसमें शरीक होकर अपना मत देंगे। इसी विश्वास के साथ ये आलेख पोस्ट कर रहा हूं।

अभी कुछ दिन पहले बनारस के पास अपने गांव मैं गया था। पता चला कि वहां तमाम कानवेंट स्कूल खुल गए हैं। गांव का सरकारी प्राइमरी स्कूल, जिसमें खांटी हिंदी में पढ़ाई होती, अब वीरान सा दिखता है। लोगों का तर्क है कि आगे जाकर नौकरी तो अंग्रेजी पढ़नेवालों को मिलती है तो फिर हम हिंदी में ही पढ़कर क्या करेंगे। यह चिंताजनक है और देश की शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामी भी है।
जब रोजगार हासिल करने की बुनियादी जरूरतों में परिवर्तन हो रहा है तो बेसिक शिक्षा प्रणाली में भी वही परिवर्तन कब लाए जाएंगे। सही यह है कि वोट के चक्रव्यूह में फंसी भारतीय राजनीति हिंदी को न तो छोड़ पा रही है नही पूरी तरह से आत्मसात ही कर पा रही है। इसी राजनीतिक पैंतरेबाजी के कारण तो हिंदी पूरी तरह से अभी भी पूरे देश की संपर्क भाषा नहीं बन पाई है। अब वैश्वीकरण की आंधी में अंग्रेजी ही शिक्षा व बोलचाल का भाषा बन गई है। हिदी जैसा संकट दूसरी हिंदी भाषाओं के सामने भी मुंह बाए खड़ा है मगर अहिंदी क्षेत्रों में अपनी भाषा के प्रति क्षेत्रीय राजनीति के कारण थोड़ी जागरूकता है। तभी तो पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में अंग्रेजी को प्राथमिक शिक्षा में तरजीह दी जाने लगी है। दक्षिण के राज्य तो इसमें सबसे आगे हैं। कुल मिलाकर हिंदी हासिए पर जा रही है।
अब तो हिंदी की और भी शामत आने वाली है। नामवर सिंह जैसे हिंदी के नामचीन साहित्यकार तक स्थानीय बोलियों में शिक्षा की वकालत करने लगे हैं। (देखिए संलग्न JPEG फाइल- रजनी सिसोदिया का २७ जुलाई को जनसत्ता में छपा लेख -- जब माझी नाव डुबोए) अगर सचमुच ऐसा हो जाता है तो सोचिये कि जिन राज्यों में अब तक हिंदी ही प्रमुख भाषा थी वहीं से भी उसे बेदखल होना पड़ेगा। यह हिंदी का उज्ज्वल भविष्य देखने वालों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। अगर यही हाल रहा तो आंकड़ों में हिंदी कब तक पूरी दुनिया में दूलरे नंबर की सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा रह जाएगी। क्या रोजी रोटी भी दे सकेगी हिंदी ? सरकारी ठेके पर कब तलक चलेगी हिंदी ? देश की अनिवार्य संपर्क व शिक्षा की भाषा कब बनपाएगी हिंदी। आ रहा है हिंदी दिवस मनाने का दिन। आप भी हिंदी के इन ठेकेदारों से यही सवाल पूछिए।

विश्व की दस प्रमुख भाषाएं
१- चीनी लोगों की भाषा मंदरीन को बोलने वाले एक बिलियन लोग हैं। मंदरीन बहुत कठिन भाषा है। किसी शब्द का उच्चारण चार तरह से किया जाता है। शुरू में एक से दूसरे उच्चारण में विभेद करना मुश्किल होता है। मगर एक बिलियन लोग आसानी से मंदरीन का उपयोग करते हैं। मंदरीन में हलो को नि हाओ कहा जाता है। यह शब्द आसानी से लिख दिया मगर उच्चारण तो सीखना पड़ेगा।
२-अंग्रेजी बोलने वाले पूरी दुनिया में ५०८ मिलियन हैं और यह विश्व की दूसरे नंबर की भाषा है। दुनिया की सबसे लोकप्रिय भाषा भी अंग्रेजी ही है। मूलतः यह अमेरिका आस्ट्रेलिया, इग्लैंड, जिम्बाब्वे, कैरेबियन, हांगकांग, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा में बोली जाती है। हलो अंग्रेजी का ही शब्द है।
३- भारत की राजभाषा हिंदी को बोलने वाले पूरी दुनियां में ४९७ मिलियन हैं। इनमें कई बोलियां भी हैं जो हिंदी ही हैं। ऐसा माना जा रहा है कि बढ़ती आबादी के हिसाब से भारत कभी चीन को पछाड़ सकता है। इस हालत में नंबर एक पर काबिज चीनी भाषा मंदरीन को हिंदी पीछे छोड़ देगी। फिलहाल हिंदी अभी विश्व की तीसरे नंबर की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी में हलो को नमस्ते कहते है।
४- स्पेनी भाषा बोलने वालों की तादाद ३९२ मिलियन है। यह दक्षिणी अमेरिकी और मध्य अमेरिकी देशों के अलावा स्पेन और क्यूबा वगैरह में बोली जाती है। अंग्रेजी के तमाम शब्द मसलन टारनाडो, बोनान्जा वगैरह स्पेनी भाषा ले लिए गए हैं। स्पेनी में हलो को होला कहते हैं।
५- रूसी बोलने वाले दुनियाभर में २७७ मिलियन हैं। और यह दुनियां की पांचवें नंबर की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। संयुक्तराष्ट्र की मान्यता प्राप्त छह भाषाओं में से एक है। यह रूस के अलावा बेलारूस, कजाकस्तान वगैरह में बोली जाती है। रूसी में हलो को जेद्रावस्तूवूइते कहा जाता है।
६-दुनिया की पुरानी भाषाओं में से एक अरबी भाषा बोलने वाले २४६ मिलियन लोग हैं। सऊदू अरब, कुवैत, इराक, सीरिया, जार्डन, लेबनान, मिस्र में इसके बोलने वाले हैं। इसके अलावा मुसलमानों के धार्मिक ग्रन्थ कुरान की भाणा होने के कारण दूसरे देशों में भी अरबी बोली और समझी जाती है। १९७४ में संयुक्त राष्ट्र ने भी अरबी को मान्यता प्रदान कर दी। अरबी में हलो को अलसलामवालेकुम कहा जाता है।
७- पूरी दुनिया में २११ मिलियन लोग बांग्ला भाषा बोलते हैं। यह दुनिया की सातवें नंबर की भाषा है। इनमें से १२० मिलियन लोग तो बांग्लादेश में ही रहते है। चारो तरफ से भारत से घिरा हुआ है बांग्लादेश । बांग्ला बोलने वालों की बाकी जमात भारत के पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा व पूर्वी भारत के असम वगैरह में भी है। बांग्ला में हलो को एईजे कहा जाता है।
८- १२वीं शताब्दी बहुत कम लोगों के बीच बोली जानेवाली भाषा पुर्तगीज आज १९१ मिलियन लोगों की दुनिया का आठवें नंबर की भाषा है। स्पेन से आजाद होने के बाद पुर्तगाल ने पूरी दुनिया में अपने उपनिवेशों का विस्तार किया। वास्कोडिगामा से आप भी परिचित होंगे जिसने भारत की खोज की। फिलहाल ब्राजील, मकाउ, अंगोला, वेनेजुएला और मोजांबिक में इस भाषा के बोलने वाले ज्यादा है। पुर्तगीज में हलो को बोमदिया कहते हैं।
९- मलय-इंडोनेशियन दुनिया की नौंवें नंबर की भाषा है। दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी के लिहाज से मलेशिया का छठां नंबर है। मलय-इंडोनेशियिन मलेशिया और इंडोनेशिया दोनों में बोली जाती है। १३००० द्वीपों में अवस्थित मलेशिया और इन्डोनेशिया की भाषा एक ही मूल भाषा से विकसित हुई है। इंडोनेशियन में हलो को सेलामतपागी कहा जाता है।
१०- फ्रेंच यानी फ्रांसीसी १२९ मिलियन लोग बोलते हैं। इस लिहाज से यह दुनियां में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में दसवें नंबर पर है। यह फ्रांस के अलावा बेल्जियम, कनाडा, रवांडा, कैमरून और हैती में बोली जाती है। फ्रेंच में हलो को बोनजूर कहते हैं।

वादा आज तक पूरा नहीं हो पाया "संविधान के अनुसार २६ जनवरी १९६५ से भारतीय संघ की राजभाषा देव नागरी लिपि में हिन्दी हो गई है और सरकारी कामकाज के लिए हिन्दी अंतरराष्टीय अंकों का प्रयोग होगा " इस देश के संविधान ने इस देश की आत्मा अर्थात "हिन्दी" से एक वादा किया था और वह आज तक पूरा नहीं हो पाया और हिन्दी अपने इस अधिकार के लिए आज तक संविधान के सामने अपने हाथ फैला ये आंसू बहा रही है
क्या वास्तव में हिन्दी इतनी बुरी है कि हम उसे अपनाना नहीं चाहते? (विजयराज चौहान (गजब) के प्रकाशित उपन्यास "भारत/INDIA" के पेज १५६-१५८ पर उपन्यास के पात्र इसी तरह से चिंता जाहिर करते हैं। मुख्य पात्र भारत द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर स्कूल समारोह में हिंदी के संदर्भ में ये बातें कही जातीं है। आगे इस उपन्यास के पात्र यह भी कहते हैं कि- नहीं वह इतनी बुरी चीज नहीं है वह इस दुनिया कि सबसे अधिक बोलीजाने वाली तीसरे नम्बर कि भाषा है।
इसकी महत्ता को भारत के अनेक महापुरुषों ने भी स्वीकार किया है। इसकी इस महत्ता को देखकर ही एक ऐसे व्यक्ति "अमीर खुसरो" जिसकी मूल भाषा अरबी ,फारसी और उर्दू थी उसने कहा था- "मैं हिन्दुस्तान कि तूती हूँ ,यदि तुम वास्तव में मुझे जानना चाहते हो हिन्दवी(हिन्दी) में पूछो में तुम्हें अनुपम बातें बता सकता हूँ" हिन्दी का महत्व समझते हुए ही उर्दू के एक शायर मुहम्मद इकबाल ने बड़े गर्व से कहा था कि --"हिन्दी है हम वतन है हिन्दोंस्ता हमारा" हिन्दी के इसी महत्व को जान कर भारत के एक युगपुरूष महर्षि दया-नंद सरस्वती जिनकी मूल भाषा गुजराती थी, ने कहा था- "हिन्दी के द्वारा ही भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।" लौह पुरुष सरदार वल्बभाई पटेल ने और आजादी के बाद कहा था-"हिन्दी अब सारे राष्ट्र की भाषा बन गई है इसके अध्ययन एवं इसे सर्वोतम बनाने में हमें गर्व होना चाहिए" गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर ने जिनकी मूल भाषा बांग्ला थी उन्होंने कहा था कि- "यदि हम प्रत्येक भारतीय नैसर्गिक अधिकारों के सिद्धांत को स्वीकार करते है तो हमें राष्ट्र भाषा के रूप में उस भाषा को स्वीकार करना चाहिए जो देश में सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और वों भाषा हिन्दी है" नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने और कहा था कि- हिन्दी के विरोध का कोई भी आन्दोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है

तस्वीर का दूसरा पहलू
आज हिंदी देश को जोड़ने की बजाए विरोध की भाषा बन गई है। राजनीति ने इसे उस मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां अहिंदी क्षेत्रों में हिंदी विरोध पर ही पूरी राजनीति टिक रई है। पूरे भारत को एक भाषा से जोड़ने की आजाद भारत की कोशिश अब राजनीतिक विरोध के कारण कहने को त्रिभाषा फार्मूले में तब्दील हो गई है मगर अप्रत्क्ष तौर पर सभी जगह हिंदी का विरोध ही दिखता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है कि हिंदी राज्य स्तर पर हिंदी को सर्वमान्य का सम्मान नहीं मिल पाया है। जिस देश में प्राथमिक शिक्षा तक का भी राष्ट्रीयकरण सिर्फ हिंदी को अपनाने के विरोध के कारण नहीं हो पाया तो उस देश की एकता का सूत्र कैसे बन सकती है हिंदी।
अब वैश्वीकरण के दौर में कम से कम शिक्षा के स्तर पर अंग्रेजी ज्यादा कामयाब होती दिख रही है। कानून हिंदी को सब दर्जा हासिल है मगर व्यवहारिक स्तर पर सिर्फ उपेक्षा ही हिंदी के हाथ लगी है। क्षेत्रीय राजनीति का बोलबाला होने के बाद से तो बोलचाल व शिक्षा सभी के स्तर पर क्षेत्रीय भाषाओं को मिली तरजीह ने एक राष्ट्र-एक भाषा की योजना को धूल में मिला दिया है। अगर हिंदी को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में अपनाया नहीं गया तो निश्चित तौर पर इसकी जगह अंग्रेजी ले लेगी और तब क्षेत्रीय भाषाओँ के भी वजूद का संकट खड़ा हो जाएगा। अगर हिंदी बचती है तो क्षेत्रीय भाषाओं का भी वजूद बच पाएगा अन्यथा अंग्रेजी इन सभी को निगल जाएगी। और अंग्रेजी ने तो अब शिक्षा और रोजगार के जरिए यह करना शुरू भी कर दिया है।



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Sunday, August 10, 2008

काहे बसे उत्तर परदेस

हमारे एक दोस्त हैं दिल्ली के एक बड़े और इलीट टीवी चैनल में बड़े पद पर हैं। जब से दिल्ली आये हैं तबसे ही वापस अपने मध्य प्रदेश लौटने की बात करते रहे हैं। लेकिन सात-आठ साल पहले बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिये जब दिल्ली में ही बसने का इरादा बनाया तो पता चला कि बात हाथ से निकल चुकी है और अब दिल्ली में मकान खरीदना बूते से बाहर है। थक-हारकर बाकी हिंदी पत्रकारों की तरह उनको भी दिल्ली से लगती गाज़ियाबाद की कॉलोनियों में सहारा मिला। आजकल वैशाली के एक बहुमंज़िला अपार्टमेंट में रहते हैं और हर छोटे बड़े काम के लिये दिल्ली आते-जाते रोज़ किलसते हैं। हालांकि उनके रोज़ के सफर में उत्तर प्रदेश की सड़के और आबोहवा महज़ दो किलोमीटर की होती हैं लेकिन ये दो किलोमीटर ही उन्हें खून के आंसू रुला देता है। घर लौटते समय २० किलोमीटर दिल्ली में सफऱ के बाद वैशाली यानी उत्तर प्रदेश यानी यूपी आ गया ये पता करने के उनके पास कई तरीके हैं।

समझ लो यूपी आ गया

दिल्ली से उत्तर प्रदेश सीमा में आम तौर पर दो रास्तों से घुसता हूं, एक गाज़ीपुर से सीधे दिल्ली गेट (एईज़ेड के पास) होकर और दूसरा आनंद विहार बस अड्डे से होकर मोहननगर रोड पर।
(१).दिल्ली में कदम-कदम पर रास्ता दिखाने वाले हरे बोर्ड जब नीले दिखने लगें यानी उन पर बहुजन समाज पार्टी के छुटभैये नेताओं के बड़े-बड़े पोस्टर नज़र आने लगें तो समझ लो यूपी आ गया।
(२). सड़क आधी तो टूटी हो और आधी पर ठेले खड़े हों या फटफट वाले बीचे में धुंआ उड़ाते हुए सवारियां खींच रहे हों तो समझ लो यूपी आ गया।
(३). सड़क के बीचोंबीच पुलिस चौकी बनी हो उसकी खुली खिड़की से गंदी बनियान पहने तीन-तार तोंद वाले पुलिसिये बीड़ी फूंकते दिखें तो समझ लो यूपी आ गया।
(४). बॉर्डर पर बनी पुलिस चौकी के सामने नीला झंडा लगी कोई आलीशान गाड़ी खड़ी हो और सफेद लकदक कपड़े पहने नेता चौकी में बैठा कोक पी रहा तो तो समझ लो यूपी आ गया।
(५). सीमा पर कदम-कदम पर ५-६ तरह के चेक पोस्ट बने हों और हरेक के सामने गाड़ियों की वजह से जाम लगा हो तो समझ लो यूपी आ गया।
(६). चेक पोस्ट पर तैनात लंबे-लंबे डंडे लिये बदमाश नुमा युवक हर आती-जाती गाडी के पीछे भागते दिखें तो समझ लो यूपी आ गया।
(७). लालबत्ती के सामने विज्ञापन बोर्ड लगे हों और बत्ती को देखे बिना गाड़ी आ जा रही हों और ट्रैफिक वाला पास ही ठेले पर खड़ा पराठे डकार रहा हो और आती–जाती गाड़ियों को नाटक की तरह देख रहा हो तो समझ लो यूपी आ गया।
(८). लाल बत्ती की गाड़ी देखते ही ट्रैफिक पुलिस वाला बे वजह सीटी बजाने लगे और एक्टिव नज़र आये तो समझ लो यूपी आ गया।
(९) आने वाली सड़क पर जाती गाड़ियां दिखें और जाने वाली पर आती तो समझ लो यूपी आ गया।
(१०). हमेशा ही उल्टी दिशा से बिना हेलमेट लगाये और तीन लोगों को स्कूटर-मोटरसाइकिल पर बिठाये कोई पुलिस वाला दिखे तो समझ लो यूपी आ गया।
(११). सड़क किनारे हेलमेट की दुकान तो खूब दिखें लेकिन कोई हेलमेट लगाये नज़र ना आये तो समझ लो यूपी आ गया।
(१२). दो गाड़ियां आपस में टकरा गईं हों और दोनों के मालिक सड़क पर ही भिड़ गये हों और आते-जाते लोग हॉर्न पर हॉर्न मारे जा रहे हों तो समझ लो यूपी आ गया।
(१३). कोई बुजुर्ग, महिला या बीमार मुसाफिर से रिक्शा वाला सामान्य से दो गुना किराया मांग रहा हो और सवारी गिड़गिड़ा रही हो तो समझ लो यूपी आ गया।
(१४). बीच सड़क पर ऑटो खड़ा हो उसमें बैठी दो महिलायें झुंझला रही हों और ऑटो वाला सड़क किनारे खुले आम नंबर एक में व्यस्त हो तो समझ लो यूपी आ गया।
(१५). अच्छे से अच्छे शॉक एब्ज़ार्बर वाली गाड़ी चलती हुई कम और उछलती हुई ज्यादा नज़र आये तो समझ लो यूपी आ गया।
(१६). एक तरफ जनरेटर से चमकते भीमकाय मॉल्स दिखें और दूसरी तरफ बदबू मारते कचरे के पहाड़ तो समझ लो यूपी आ गया।
(दुख-दर्द की अगली किस्त भी जल्द ही)

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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